जोधपुर, 15 अक्टूबर
Rajasthan Highcourt ने हनुमानगढ़ के डीबी थाना क्षेत्र में 1991 में हुई एक हत्या के मामले में दो दोषी आरोपियों को बरी कर दिया है।
जस्टिस मनोज कुमार गर्ग और जस्टिस रवि चिरानिया की खंडपीठ ने जेमल राम और भगवाना राम की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई के बाद रिपोर्टेबल जजमेंट दिया है।
Rajasthan Highcourt ने पूरे मामले को परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित बताते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी की संलिप्तता साबित करने में विफल रहा है।
बचाव पक्ष की दलील
आरोपियों की ओर से अधिवक्ता RDSS खरलिया और किंजल पुरोहित ने पैरवी करते हुए अदालत को बताया कि इस मामले में शिकायतकर्ता ने FIR खुद दर्ज करवाई, जबकि वह घटना का प्रत्यक्षदर्शी नहीं था।
अधिवक्ता ने कहा कि FIR की सूचना उसके नौकर कुम्भा राम ने सुबह 6 बजे दी थी, जिसे शिकायतकर्ता ने 8 बजे पुलिस तक पहुँचाया।
मामले के मुख्य गवाह राजा राम नायक और भानी राम ने घटना के बारे में पुलिस को सीधे नहीं बताया। अधिवक्ता ने कहा कि शिकायतकर्ता का यह कार्य द्वेष या अन्य उद्देश्य से किया गया।
अधिवक्ता ने दलील दी कि मामले में 5 गवाहों के बयान विरोधाभासी साबित हुए और कई को प्रतिपक्ष ने शत्रुतापूर्ण घोषित कर दिया।
अधिवक्ता ने जांच अधिकारी और अन्य गवाह के बीच कथित साजिश का हवाला देते हुए कहा कि कैमरा और अन्य सबूत planted थे। HMT घड़ी और कैमरा की कथित बरामदगी भी झूठी थी।
अधिवक्ता ने दलील दी कि मामला केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है, प्रत्यक्षदर्शी कोई नहीं है। गवाहों और जांच अधिकारी के बयानों में विरोधाभास और साजिश स्पष्ट है। इसलिए अपीलकर्ताओं का कहना है कि निचली अदालत का निर्णय गलत और कानून के खिलाफ है, इसे खारिज किया जाना चाहिए।
सरकार का पक्ष
राज्य सरकार की ओर से पीपी पवन कुमार भाटी ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि शिकायतकर्ता ने 22 सितंबर 1991 को अपने मौखिक रिपोर्ट में प्रतिवादियों का नाम लिया था, इसलिए उनके मामले में प्रारंभ से ही पुलिस को उनकी संलिप्तता की जानकारी थी।
लोक अभियोजक ने कहा कि कैमरा, HMT घड़ी और अन्य सामान की बरामदगी ने प्रतिवादियों की संलिप्तता को बिना किसी संदेह के प्रमाणित किया।
अभियोजन ने कहा कि धारा 302 आईपीसी जैसी गंभीर अपराध में, जहाँ अभियोजन ने मामले को स्पष्ट रूप से सिद्ध कर दिया है, वहाँ मामूली विरोधाभास या दुर्बलताओं के आधार पर सजा के निर्णय में कोई हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए, जब सबूत पर्याप्त रूप से दर्ज और निचली अदालत द्वारा विचार किए गए हों।
ये हैं मामला
22 सितंबर 1991 को हनुमानगढ़ के डीबी थाने में राजा राम द्वारा मौखिक रिपोर्ट दी गई थी कि खेत में एक व्यक्ति का शव पड़ा है।
इस पर पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू की और दोनों आरोपियों को गिरफ्तार किया। जांच के बाद पुलिस ने दोनों के खिलाफ चालान पेश किया, जिसके आधार पर सेशन अदालत ने वर्ष 1996 में धारा 302/34 व 404 आईपीसी के तहत दोनों को दोषी ठहराया।
हाईकोर्ट की नज़र में
अपील पर सुनवाई के दौरान Rajasthan Highcourt ने पाया कि जिन गवाहों के आधार पर FIR दर्ज हुई, उन्होंने अदालत में घटना देखने से इंकार कर दिया।
साथ ही पुलिस मामले में कैमरा, HMT घड़ी जैसी जब्त वस्तुओं की बरामदगी भी साबित नहीं कर पाई।
Rajasthan Highcourt ने आरोपियों को इन आधारों पर बरी करते हुए कहा कि जांच अधिकारी की भूमिका संदिग्ध रही और गवाहों के बयान परस्पर विरोधी थे।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष द्वारा पेश की गई अतिरिक्त न्यायिक स्वीकृति (Extra Judicial Confession) अविश्वसनीय है, क्योंकि इसे ऐसे व्यक्तियों के आधार पर प्रस्तुत किया गया जिन्होंने स्वयं को “जाति प्रतिनिधि” बताते हुए आरोपियों पर झूठा आरोप लगाने का प्रयास किया।
खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा
“अभियोजन पक्ष अभियुक्तों की उपस्थिति, बरामदगी तथा घटना की श्रृंखला को सिद्ध करने में पूर्णतः विफल रहा। परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ी टूट चुकी है, अतः विरोधाभासी गवाहियों के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। निष्पक्ष जांच ही न्याय का आधार है, और संदेह का लाभ अभियुक्तों को दिया जाना चाहिए।”
Rajasthan Highcourt ने 18 जनवरी 1996 को पारित सेशन न्यायालय के दोषसिद्धि आदेश को रद्द करते हुए अपील स्वीकार की है।