सास, ससुर व देवर को अग्रिम जमानत के साथ कड़ी शर्तें, नाबालिग बच्ची के भविष्य के लिए FDR और नियमित भरण-पोषण सुनिश्चित
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक बेहद संवेदनशील वैवाहिक विवाद मामले में संतुलित, मानवीय और कड़ा रुख अपनाते हुए ऐसा फैसला सुनाया है, जिसने न्याय और संवेदना के बीच एक मजबूत संतुलन स्थापित किया है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने प्रताड़ना के मामले में जहां सास, ससुर और देवर को अग्रिम जमानत प्रदान की, वहीं दूसरी ओर पीड़ित पत्नी और उसकी दो वर्षीय नाबालिग बच्ची के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए हर माह ₹30,000 भरण-पोषण देने का आदेश दिया है।
इसके साथ ही नाबालिग बच्ची के नाम पर ₹10 लाख की एफडीआर कराने का आदेश दिया हैं जो बिना कोर्ट आदेश के तोड़ी नही जा सकेगी.
भारत छोड़ पति ने अमेरिका में रचाई दूसरी शादी
यह मामला खैरथल-तिजारा जिले के महिला थाना में दर्ज एक गंभीर शिकायत से जुड़ा है। पीड़ित महिला ने अपने पति और ससुराल पक्ष पर मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न के गंभीर आरोप लगाए थे।
महिला के अनुसार, उसकी शादी 17 जनवरी 2022 को हुई थी और उसके एक दो वर्षीय बच्ची है।
शादी के कुछ समय बाद ही उसका पति उसे छोड़कर अमेरिका चला गया। आरोप है कि वहां जाकर उसने दूसरी शादी कर ली और भारत लौटने से भी इनकार कर दिया।
पीड़िता का कहना है कि पति ने न केवल उसे बल्कि अपनी मासूम बच्ची को भी पूरी तरह छोड़ दिया, जिससे उनका जीवन संकट में आ गया।
ससुराल पक्ष पर गंभीर आरोप
महिला ने अपने सास, ससुर और देवर पर भी उत्पीड़न के आरोप लगाए। शिकायत के आधार पर पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज किया।
गिरफ्तारी की आशंका को देखते हुए ससुराल पक्ष ने राजस्थान हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और अग्रिम जमानत की मांग की।
“संपत्ति बेचकर विदेश भागने की साजिश”
मामले ने तब और गंभीर मोड़ लिया जब पत्नी ने कोर्ट में आरोप लगाया कि पति के बाद अब ससुराल पक्ष भी अपनी संपत्तियां बेचकर अमेरिका भागने की तैयारी में है।
उसने अदालत को बताया कि यदि ऐसा होता है, तो उसके और उसकी बच्ची के लिए जीवन यापन असंभव हो जाएगा।
इन दलीलों को गंभीरता से लेते हुए हाईकोर्ट ने ससुराल पक्ष के विदेश जाने पर सख्त रोक लगा दी।
जस्टिस समीर जैन की एकलपीठ का मानवीय दृष्टिकोण
इस मामले की सुनवाई जस्टिस समीर जैन की एकलपीठ ने की।
सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट कहा कि ऐसे मामलों में केवल कानून की धाराओं को देखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि पीड़ित पक्ष के भविष्य और मानवीय पहलुओं को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
कोर्ट ने कहा कि जब मामला एक मासूम बच्चे के भविष्य से जुड़ा हो, तब न्याय को और अधिक संवेदनशील होना चाहिए।
मध्यस्थता (मेडिएशन) का दिखाया रास्ता
अदालत ने इस विवाद को सुलझाने के लिए दोनों पक्षों को मध्यस्थता के लिए भेजा।
कोर्ट का मानना था कि पारिवारिक मामलों में टकराव बढ़ाने के बजाय संवाद और समझौते के माध्यम से समाधान निकालना ज्यादा प्रभावी होता है।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि पति, पत्नी और ससुराल पक्ष आपसी सहमति से ऐसा समाधान निकालें जिससे महिला और बच्ची का भविष्य सुरक्षित हो सके।
हर माह ₹30,000 भरण-पोषण
सुनवाई के दौरान कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद ससुराल पक्ष ने एक अहम प्रस्ताव रखा। उन्होंने स्वेच्छा से यह आश्वासन दिया कि वे पीड़िता और उसकी बच्ची के भरण-पोषण के लिए हर माह ₹30,000 देंगे।
अदालत ने इस प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए आदेश दिया कि यह राशि हर महीने की 2 तारीख तक सीधे पीड़िता के बैंक खाते में जमा कराई जाए।
बच्ची के नाम ₹10 लाख की एफडीआर
इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू नाबालिग बच्ची के भविष्य को लेकर दिया गया आदेश है।
जस्टिस समीर जैन ने आदेश दिया कि बच्ची के नाम ₹10 लाख की एफडीआर बनाई जाए, जिसे बिना अदालत की अनुमति न तो तोड़ा जा सकेगा और न ही उसमें कोई बदलाव किया जा सकेगा।
कोर्ट ने कहा कि यह कदम बच्चे के दीर्घकालिक भविष्य को सुरक्षित करने की दिशा में हैं.
अग्रिम जमानत पर सख्त शर्तें
हालांकि अदालत ने सास, ससुर और देवर को अग्रिम जमानत दे दी, लेकिन इसके साथ कड़ी शर्तें भी लागू कीं.
हाईकोर्ट ने आरोपी सास ससुर और देवर पर प्रत्येक आरोपी को ₹50,000 का निजी मुचलका देने ओर ₹25,000 के दो जमानती प्रस्तुत करने, पुलिस जांच में पूरा सहयोग करने और किसी भी गवाह को प्रभावित करने की कोशिश नहीं करने की शर्तो पर जमानत दी.
हाईकोर्ट ने इस मामले में सास, ससुर और देवर को बिना अदालत की अनुमति देश छोड़कर जाने पर रोक लगा दी हैं.
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
“इस स्तर पर मामले के गुण-दोष पर अंतिम टिप्पणी करना उचित नहीं है, लेकिन महिला और उसके बच्चे के हितों की सुरक्षा सर्वोपरि है। जब पक्षकार समझौते के लिए तैयार हैं, तो उसे प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।”
– जस्टिस समीर जैन