सरपंच पर भाई-भतीजावाद की पुष्टि, नियमों की अनदेखी कर किया गया आवंटन रद्द; कोर्ट बोला— कानून से ऊपर कोई नहीं
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट, जोधपुर मुख्यपीठ ने ग्राम पंचायत भूमि आवंटन से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि भूमि का आवंटन नियमों के विपरीत किया गया है, तो केवल कब्जा, निर्माण या बिजली कनेक्शन होने मात्र से उसे वैध नहीं ठहराया जा सकता।
हाईकोर्ट ने इस मामले में सरपंच द्वारा अपने ही रिश्तेदारों को जमीन का आवंटन करने पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि यह मामला केवल तकनीकी त्रुटियों का नहीं, बल्कि नेपोटिज्म (भाई-भतीजावाद) और फेवरिटिज्म (पक्षपात) का स्पष्ट उदाहरण है।
कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक पद का उपयोग कर परिवार के सदस्य को लाभ पहुंचाना कानून और प्रशासनिक पारदर्शिता के खिलाफ है।
जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस सुनील बेनीवाल की खंडपीठ ने पाली जिला कलेक्टर के आदेश को सही ठहराते हुए देसूरी तहसील के दायलाना कलां गांव में याचिकाकर्ता को आवंटित भूमि को रद्द कर दिया है।
‘रिश्तेदारी में बांटी गई जमीन’
पाली जिले के दायलाना कलां गांव में वर्ष 2018 में ग्राम पंचायत ने याचिकाकर्ता महिपाल को एक आबादी भूमि का पट्टा जारी किया।
महिपाल का दावा था कि वह वर्षों से जमीन पर काबिज है और उसने ₹54,556 जमा कर पट्टा लिया है। इसके साथ ही जमीन पर निर्माण और बिजली कनेक्शन भी ले लिया।
गांव के अन्य लोगों ने इस पट्टे को चुनौती दी और आरोप लगाया कि पट्टा नियमों के खिलाफ और पक्षपात से दिया गया है।
जांच में खुला बड़ा खेल— ‘सरपंच ने रिश्तेदार को पहुंचाया फायदा’
शिकायत पर जिला कलेक्टर द्वारा कराई गई जांच में सामने आया कि पट्टा सरपंच के करीबी रिश्तेदार को दिया गया और नियमों को दरकिनार कर फैसला लिया गया था।
जांच में यह भी सामने आया कि पट्टा जारी करने की पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव था।
जांच के आधार पर जिला कलेक्टर ने 29 नवंबर 2022 को याचिकाकर्ता के पट्टे को रद्द कर दिया।
जिस पर याचिकाकर्ता ने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कलेक्टर के आदेश को चुनौती दी।
हाईकोर्ट की एकलपीठ ने याचिका को खारिज करते हुए कलेक्टर के आदेश पर मुहर लगा दी, जिसे बाद में खंडपीठ में चुनौती दी गई।
अपील में दलीलें
खंडपीठ में दायर अपील में अधिवक्ता की ओर से कहा गया कि ग्राम पंचायत द्वारा जारी किया गया पट्टा पूरी तरह वैध और नियमों के अनुरूप था।
अधिवक्ता ने कहा कि याचिकाकर्ता और उसका परिवार लंबे समय से उक्त भूमि पर काबिज था और यह भूमि आबादी क्षेत्र (Abadi Land) का हिस्सा है।
अधिवक्ता ने दलील दी कि पूर्वजों के समय से कब्जा होने के कारण अपीलकर्ता का वैध अधिकार बनता है।
यह भी कहा गया कि ग्राम पंचायत ने विधिवत प्रक्रिया अपनाकर 20.04.2018 को पट्टा जारी किया और याचिकाकर्ता ने ₹54,556 की राशि DLC दरों के अनुसार जमा की।
यह भी दलील दी गई कि अन्य ग्रामीणों को भी इसी प्रकार पट्टे दिए गए थे और ग्राम विकास अधिकारी व विकास अधिकारी, पंचायत समिति की रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया कि भूमि आबादी क्षेत्र में आती है।
अधिवक्ता ने कहा कि अपीलकर्ता का कब्जा लंबे समय से है, जिसे कलेक्टर और सिंगल बेंच ने नजरअंदाज किया, जबकि पट्टा मिलने के बाद निर्माण और बिजली कनेक्शन भी लिया गया।
राज्य सरकार का पक्ष
राज्य सरकार तथा अन्य प्रतिवादियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. सचिन आचार्य सहित अन्य अधिवक्ताओं ने याचिकाकर्ता के दावों का कड़ा विरोध किया और कहा कि पूरा पट्टा अवैध तरीके से जारी किया गया था।
उन्होंने कहा कि राजस्थान पंचायती राज अधिनियम और संबंधित नियमों का उल्लंघन किया गया।
Rule 157(1) का गलत उपयोग करते हुए खाली भूमि पर लागू किया गया, जबकि यह पुराने मकानों के नियमितीकरण के लिए था।
अधिवक्ता ने कहा कि पट्टा सरपंच के करीबी रिश्तेदार को दिया गया और सरपंच ने अपने ही हित वाले मामले में निर्णय प्रक्रिया में भाग लिया, जो Rule 47 का स्पष्ट उल्लंघन है।
जांच में आवेदन बिना तारीख का पाया गया, फाइलों में विरोधाभासी नोटिंग थी और निरीक्षण रिपोर्ट भी संदिग्ध थी।
यह भी सामने आया कि 30 दिन की अनिवार्य आपत्ति अवधि को घटाकर 7 दिन किया गया और ₹50,000 से अधिक के मामले में सक्षम प्राधिकारी से अनुमति नहीं ली गई, जिससे स्पष्ट है कि Rules 145 से 155 का पालन नहीं किया गया।
कोर्ट की कड़ी टिप्पणी— “कानून से ऊपर कोई नहीं”
राजस्थान हाईकोर्ट ने ग्राम पंचायत द्वारा जारी पट्टे को गंभीर अनियमितताओं के चलते अवैध ठहराते हुए अपील खारिज कर दी।
कोर्ट ने पाया कि भूमि आवंटन में नियम 145 से 155 का पालन नहीं किया गया, आपत्ति अवधि 30 दिन के बजाय मात्र 7 दिन रखी गई और ₹50,000 से अधिक राशि होने के बावजूद सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति नहीं ली गई।
कोर्ट ने यह भी माना कि याचिकाकर्ता और तत्कालीन सरपंच के बीच पारिवारिक संबंध था, जो स्पष्ट रूप से हितों के टकराव और भाई-भतीजावाद का मामला बनता है।
हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा-
“सिर्फ कब्जा या निर्माण, अवैध आवंटन को वैध नहीं बना सकता।”
सिंगल बेंच के आदेश से सहमति जताते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि कलेक्टर को ऐसे पट्टों की वैधता जांचने और उन्हें रद्द करने का अधिकार है।