जोधपुर। जोधपुर एनडीपीएस मामलों की अदालत ने एक अहम फैसला सुनाते हुए आठ वर्ष पुराने अवैध अफीम तस्करी के मामले में तीन आरोपियों को दोषी ठहराते हुए प्रत्येक को 15-15 वर्ष का कठोर कारावास तथा 2-2 लाख रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई है।
जोधपुर की अदालत का यह फैसला समाज में नशे के बढ़ते खतरे के विरुद्ध एक मजबूत संदेश माना जा रहा है। यह फैसला Narcotics Control Bureau, जोधपुर यूनिट द्वारा की गई जांच और मजबूत अभियोजन के आधार पर आया है।
एनडीपीएस मामलों के विशिष्ट न्यायाधीश मधुसूदन मिश्रा ने साक्ष्यों, गवाहों के बयानों और दस्तावेजी प्रमाणों के आधार पर फैसला सुनाते हुए कहा कि—
अवैध मादक पदार्थों का व्यापार समाज के लिए अत्यंत घातक और विनाशकारी अपराध है, जो न केवल युवाओं के भविष्य को अंधकार में धकेलता है बल्कि सामाजिक व्यवस्था को भी गंभीर रूप से प्रभावित करता है।
“मादक पदार्थों का अवैध व्यापार केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि समाज की जड़ों को खोखला करने वाला संगठित अपराध है। ऐसे अपराधों के प्रति किसी भी प्रकार की नरमी समाज के लिए घातक सिद्ध हो सकती है।”
विशिष्ट न्यायाधीश मधुसूदन मिश्रा ने यह भी स्पष्ट किया कि—
वर्तमान समय में नशीले पदार्थों के मामलों में निरंतर वृद्धि हो रही है, जो एक गंभीर सामाजिक संकट का संकेत है। इस कारण ऐसे मामलों में निवारक (deterrent) दंड देना अत्यंत आवश्यक है, ताकि समाज में स्पष्ट और कठोर संदेश जाए।
सबूतों पर न्यायालय की टिप्पणी
न्यायाधीश मधुसूदन मिश्रा ने सबूतों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि—
“अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत मौखिक एवं दस्तावेजी साक्ष्य पूर्णतः विश्वसनीय, सुसंगत और संदेह से परे हैं। जब्त की गई अफीम की मात्रा व्यावसायिक श्रेणी में आती है तथा आरोपी बिना किसी वैध लाइसेंस अथवा अनुमति के इसके अवैध परिवहन व कब्जे में संलिप्त पाए गए हैं।”
कोर्ट ने माना कि—
एनसीबी द्वारा की गई तलाशी और जब्ती की कार्रवाई कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप की गई। धारा 42, 50 और 57 एनडीपीएस अधिनियम के सभी आवश्यक प्रावधानों का समुचित पालन किया गया।
सभी गवाहों के बयान एक-दूसरे से पूर्णतः मेल खाते हैं, जिससे अभियोजन की कहानी मजबूत होती है।
नरमी की मांग पर सख्त रुख
अदालत ने बचाव पक्ष द्वारा सजा में नरमी बरतने की मांग को अस्वीकार करते हुए कहा कि—
“व्यावसायिक मात्रा में मादक पदार्थों की तस्करी करने वालों के प्रति सहानुभूति दिखाना न्यायसंगत नहीं होगा, क्योंकि यह अपराध समाज के व्यापक हितों को गंभीर क्षति पहुंचाता है।”
अदालत ने कहा कि ऐसे अपराधों में कठोरतम सजा ही समाजहित में उचित है, ताकि भविष्य में कोई भी व्यक्ति इस प्रकार के अपराध को अंजाम देने से पहले सौ बार सोचने को मजबूर हो।
सामाजिक प्रभाव पर टिप्पणी
विशिष्ट न्यायाधीश ने अपने निर्णय में सामाजिक प्रभाव पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा—
“नशे का बढ़ता जाल युवाओं को बर्बादी की ओर ले जा रहा है। यह अपराध न केवल व्यक्तिगत जीवन को नष्ट करता है, बल्कि परिवार, समाज और राष्ट्र की प्रगति में भी बाधा बनता है।”
उन्होंने कहा कि मादक पदार्थों के विरुद्ध न्यायिक कठोरता समय की आवश्यकता है, ताकि आने वाली पीढ़ियों को इस विनाशकारी प्रवृत्ति से बचाया जा सके।
अंत में अदालत ने स्पष्ट किया कि—
“इस प्रकार के गंभीर अपराधों में सख्त सजा देना न्याय, समाज और कानून—तीनों के हित में आवश्यक है।”
इसी आधार पर तीनों दोषियों को 15-15 वर्ष के कठोर कारावास और 2-2 लाख रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई गई।
ये है मामला
अभियोजन पक्ष के अनुसार, 18 जून 2018 को एनसीबी जोधपुर यूनिट के सूचना अधिकारी रामेश्वर दास को गुप्त सूचना मिली थी कि कुछ व्यक्ति बड़ी मात्रा में अफीम लेकर जोधपुर के चंद्र विलास लॉज, रेलवे स्टेशन के सामने पहुंचने वाले हैं।
सूचना को गंभीरता से लेते हुए एनसीबी ने तत्काल कार्रवाई की और निगरानी दल का गठन किया।
उसी दिन निर्धारित समय के दौरान तीन संदिग्ध व्यक्तियों—राजेश कुमार, योगेंद्र कुमार और अविनाश कुमार—को रोका गया। तलाशी लेने पर उनके पास मौजूद काले बैग से कुल 5.750 किलोग्राम अफीम बरामद की गई।
प्राथमिक परीक्षण में पदार्थ अफीम पाया गया, जिसके बाद सभी कानूनी औपचारिकताएं पूरी करते हुए आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया।
जांच और अभियोजन की प्रक्रिया
गिरफ्तारी के बाद एनसीबी ने विस्तृत जांच करते हुए बरामद अफीम के नमूने विधि विज्ञान प्रयोगशाला भेजे, जहां पुष्टि हुई कि जब्त पदार्थ अवैध मादक पदार्थ अफीम ही है।
इसके बाद आरोपियों के खिलाफ एनडीपीएस अधिनियम, 1985 की धारा 8/18 के तहत न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत किया गया।
विशिष्ट लोक अभियोजक किशन सिंह नाहर ने अदालत के समक्ष मामले का प्रभावी ढंग से पक्ष रखा।
अभियोजन ने कुल 12 गवाह, 82 दस्तावेजी साक्ष्य और 17 आर्टिकल पेश किए। गवाहों में जांच अधिकारी, स्वतंत्र गवाह तथा वैज्ञानिक साक्ष्य से जुड़े अधिकारी शामिल थे।
अभियोजन ने यह भी तर्क दिया कि आरोपी किसी वैध लाइसेंस या अनुमति के बिना इतनी बड़ी मात्रा में अफीम अपने कब्जे में रखे हुए थे, जो कानूनन गंभीर अपराध है।
अभियोजन पक्ष की दलीलें
विशिष्ट लोक अभियोजक ने अदालत से आग्रह किया कि वर्तमान समय में अवैध मादक पदार्थों के मामलों में लगातार वृद्धि हो रही है, जिसका समाज पर अत्यंत नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।
नशे के कारण युवा पीढ़ी विशेष रूप से प्रभावित हो रही है और इससे अपराधों में भी बढ़ोतरी हो रही है। ऐसे में इस प्रकार के अपराधों में कठोरतम सजा देना आवश्यक है, ताकि समाज में निवारक संदेश जाए।
अभियोजन ने यह भी कहा कि आरोपी संगठित तरीके से तस्करी में संलिप्त थे और बरामद मात्रा व्यावसायिक (commercial) श्रेणी में आती है, जिसके लिए कानून में सख्त सजा का प्रावधान है।
बचाव पक्ष की दलील
वहीं, बचाव पक्ष ने आरोपियों के लिए नरमी बरतने की मांग की।
उनका तर्क था कि आरोपियों को झूठा फंसाया गया है और जांच प्रक्रिया में त्रुटियां हैं।
उन्होंने कुछ गवाहों के बयानों पर भी सवाल उठाए। हालांकि, अदालत ने पाया कि अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य मजबूत, विश्वसनीय और कानून के अनुरूप हैं।
अदालत का फैसला
सभी पक्षों की दलीलें सुनने और साक्ष्यों के गहन परीक्षण के बाद विशिष्ट न्यायाधीश मधुसूदन मिश्रा ने तीनों आरोपियों—
राजेश कुमार पुत्र विश्वनाथ प्रसाद, योगेंद्र कुमार पुत्र नरेश प्रसाद और अविनाश कुमार पुत्र राजदेव प्रसाद, निवासी बुनियाद बीघा, जिला गया (बिहार) को अवैध मादक पदार्थ अफीम रखने और तस्करी के अपराध में दोषी ठहराया।
अदालत ने प्रत्येक आरोपी को 15-15 वर्ष का कठोर कारावास तथा 2-2 लाख रुपये का जुर्माना लगाया। जुर्माना अदा नहीं करने की स्थिति में अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा।