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जोधपुर उपभोक्ता आयोग ने एक ही दिन में दिया 18 मामलों में फैसला, बीमा-बैंकिंग कंपनियों को कड़ी फटकार

Jodhpur Court Acquits Husband and Mother-in-Law in 13-Year Dowry Harassment Case, Calls Allegations Unproven

जोधपुर। जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग (द्वितीय), जोधपुर ने उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा की दिशा में उल्लेखनीय पहल करते हुए मंगलवार 24 फरवरी को एक ही दिन में 18 मामलों का निस्तारण कर ऐतिहासिक मिसाल पेश की है।

आयोग के अध्यक्ष डॉ. यतीश कुमार शर्मा एवं सदस्य डॉ. अनुराधा व्यास की पीठ ने विभिन्न क्षेत्रों—बीमा, बैंकिंग, फाइनेंस, चिकित्सा सेवाएं और विकास कार्य—से जुड़े मामलों में सुनवाई कर विस्तृत आदेश पारित किए।

इन मामलों में आयोग ने साफ संदेश दिया कि उपभोक्ता के साथ सेवा में कमी या अनुचित व्यवहार बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

आयोग ने उसके समक्ष दर्ज परिवाद संख्या 281/2018, 85/2020, 125/2021, 129/2021, 02/2022, 109/2022, 133/2022, 212/2022, 219/2022, 282/2022, 205/2023, 323/2023, 425/2023, 458/2023 और 295/2025 में फैसला सुनाया हैं.

परिवाद संख्या 281/2018

इस प्रकरण में आवासीय योजना के अंतर्गत आवंटित भूखंड/मकान में मूलभूत सुविधाएं समय पर उपलब्ध नहीं कराई गईं। परिवादी ने जल, सड़क और सीवरेज जैसी आवश्यक सुविधाओं के अभाव की शिकायत की। आयोग ने माना कि विकास प्राधिकरण की यह जिम्मेदारी थी कि वह तय समय सीमा में बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराए। आयोग ने इसे सेवा में कमी मानते हुए संबंधित प्राधिकरण को सुविधाएं उपलब्ध कराने तथा परिवादी को मानसिक पीड़ा और विलंब के लिए क्षतिपूर्ति देने का आदेश दिया। आदेश में कहा गया कि उपभोक्ता को अधूरी परियोजना सौंपना अनुचित व्यापार व्यवहार है।

परिवाद संख्या 85/2020

इस मामले में स्वास्थ्य बीमा क्लेम को कंपनी ने तकनीकी आधार पर अस्वीकृत कर दिया था। परिवादी ने अस्पताल में भर्ती होकर उपचार कराया, लेकिन बीमा कंपनी ने पूर्व-रोग का हवाला देकर दावा खारिज कर दिया। आयोग ने दस्तावेजों का परीक्षण कर पाया कि कंपनी ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सकी। आयोग ने कहा कि बीमा अनुबंध की शर्तों की मनमानी व्याख्या कर क्लेम अस्वीकार करना सेवा में कमी है। कंपनी को संपूर्ण वैध चिकित्सा व्यय, ब्याज सहित भुगतान तथा मानसिक कष्ट के लिए मुआवजा देने का निर्देश दिया गया।

परिवाद संख्या 125/2021

वाहन दुर्घटना के बाद बीमा क्लेम लंबे समय तक लंबित रखा गया। परिवादी ने कई बार पत्राचार किया, लेकिन कंपनी ने जांच के नाम पर देरी की। आयोग ने पाया कि सभी आवश्यक दस्तावेज समय पर जमा थे और देरी अनावश्यक थी। आयोग ने इसे सेवा में कमी मानते हुए बीमा कंपनी को निर्धारित अवधि में क्लेम राशि अदा करने का आदेश दिया। साथ ही विलंब के लिए अतिरिक्त ब्याज और वाद व्यय देने के निर्देश भी दिए गए।

परिवाद संख्या 129/2021

इस मामले में मेडिकल क्लेम अस्वीकृति का विवाद था। बीमा कंपनी ने उपचार को पॉलिसी की शर्तों से बाहर बताते हुए भुगतान से इंकार किया। आयोग ने चिकित्सा अभिलेखों और विशेषज्ञ राय का परीक्षण कर पाया कि उपचार आवश्यक और आपातकालीन था। कंपनी का निर्णय अनुचित और उपभोक्ता हितों के विरुद्ध पाया गया। आयोग ने क्लेम स्वीकृत कर भुगतान सुनिश्चित करने तथा उपभोक्ता को मानसिक क्षति के लिए मुआवजा देने का आदेश दिया।

परिवाद संख्या 02/2022

वाहन के तकनीकी दोष से संबंधित इस मामले में परिवादी ने निर्माता और बीमा कंपनी दोनों को जिम्मेदार ठहराया। वाहन में बार-बार खराबी आने के बावजूद समस्या का स्थायी समाधान नहीं किया गया। आयोग ने माना कि निर्माता गुणवत्ता मानकों का पालन करने में विफल रहा। दोनों पक्षों को संयुक्त रूप से जिम्मेदार मानते हुए वाहन की मरम्मत/प्रतिस्थापन या क्षतिपूर्ति का आदेश दिया गया। आयोग ने कहा कि उपभोक्ता को दोषपूर्ण उत्पाद बेचना अनुचित व्यापार व्यवहार है।

परिवाद संख्या 109/2022

क्रेडिट कार्ड से संबंधित इस मामले में बैंक ने गलत शुल्क और ब्याज वसूला। परिवादी ने स्टेटमेंट में अनियमितता दर्शाई, लेकिन बैंक ने संतोषजनक उत्तर नहीं दिया। आयोग ने पाया कि अतिरिक्त शुल्क अनुचित था और बैंक की ओर से पारदर्शिता का अभाव था। इसे सेवा में कमी मानते हुए गलत वसूली वापस करने और उपभोक्ता को मुआवजा देने का आदेश पारित किया गया।

परिवाद संख्या 133/2022

सरकारी स्वास्थ्य योजना के अंतर्गत चिकित्सा प्रतिपूर्ति में देरी का मामला था। परिवादी ने उपचार के बाद समय पर दावा प्रस्तुत किया, लेकिन विभाग ने भुगतान में अनावश्यक विलंब किया। आयोग ने कहा कि सरकारी योजनाओं में लाभार्थियों को समयबद्ध राहत मिलना आवश्यक है। विभाग को निर्धारित अवधि में भुगतान करने तथा विलंब के लिए जिम्मेदारी तय करने के निर्देश दिए गए।

परिवाद संख्या 212/2022

डिजिटल भुगतान में गड़बड़ी के कारण राशि खाते से कट गई, पर सेवा उपलब्ध नहीं हुई। परिवादी ने शिकायत दर्ज कराई, पर समाधान में देरी हुई। आयोग ने बैंक/सेवा प्रदाता को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि डिजिटल युग में त्वरित और सुरक्षित लेनदेन सुनिश्चित करना अनिवार्य है। उपभोक्ता को राशि वापसी और क्षतिपूर्ति देने का आदेश दिया गया।

परिवाद संख्या 219/2022

इस मामले में बैंकिंग लेनदेन में त्रुटि के कारण उपभोक्ता को वित्तीय नुकसान हुआ। आयोग ने पाया कि आंतरिक जांच के बावजूद बैंक ने त्रुटि स्वीकार करने में देरी की। आयोग ने बैंक को राशि समायोजित करने और मानसिक कष्ट के लिए मुआवजा देने का आदेश दिया।

परिवाद संख्या 282/2022

कोविड काल के उपचार खर्च को बीमा कंपनी ने पॉलिसी की शर्तों का हवाला देकर अस्वीकार किया। आयोग ने कहा कि महामारी असाधारण परिस्थिति थी और उपचार आवश्यक था। कंपनी को क्लेम राशि अदा करने तथा विलंब के लिए ब्याज देने का आदेश दिया गया।

परिवाद संख्या 205/2023

दुर्घटना मृत्यु दावा अस्वीकृत करने के मामले में आयोग ने पाया कि कंपनी ने पर्याप्त जांच किए बिना दावा खारिज किया। मृतक के परिजनों को बीमा राशि और मुआवजा देने का आदेश दिया गया।

परिवाद संख्या 458/2023

आधार हाउसिंग फाइनेंस द्वारा ब्याज गणना में त्रुटि पाए जाने पर आयोग ने उपभोक्ता के पक्ष में निर्णय दिया और गलत वसूली समायोजित करने के निर्देश दिए।

परिवाद संख्या 295/2025

निवेश योजना में वादे के अनुरूप लाभ न देने और पारदर्शिता के अभाव का मामला था। आयोग ने कंपनी की लापरवाही को गंभीर मानते हुए उपभोक्ता को निवेश राशि और क्षतिपूर्ति लौटाने का आदेश दिया।

परिवाद संख्या 323/2023

इस मामले में स्वास्थ्य बीमा क्लेम का भुगतान लंबे समय तक लंबित रखा गया। परिवादी ने सभी आवश्यक दस्तावेज समय पर प्रस्तुत किए थे, इसके बावजूद बीमा कंपनी ने तकनीकी आपत्तियां उठाकर दावा टाल दिया। आयोग ने स्पष्ट किया कि बीमा कंपनियां उपभोक्ता के साथ अनुबंधित दायित्वों से बच नहीं सकतीं। आयोग ने बीमा कंपनी को स्वीकृत क्लेम राशि निर्धारित समय सीमा में अदा करने, विलंब अवधि का ब्याज देने तथा मानसिक पीड़ा के लिए अलग से क्षतिपूर्ति राशि प्रदान करने का आदेश दिया। साथ ही वाद व्यय भी देने के निर्देश दिए गए।

परिवाद संख्या 425/2023

पर्सनल लोन से जुड़े इस मामले में फाइनेंस कंपनी द्वारा अतिरिक्त प्रोसेसिंग शुल्क और ब्याज वसूले जाने की शिकायत थी। परिवादी ने अनुबंध की शर्तों का हवाला देते हुए अतिरिक्त वसूली को चुनौती दी। आयोग ने रिकॉर्ड का अवलोकन कर पाया कि वसूली गई राशि अनुबंध की शर्तों के अनुरूप नहीं थी। इसे सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार मानते हुए आयोग ने कंपनी को अतिरिक्त वसूली गई पूरी राशि वापस करने, निर्धारित ब्याज सहित भुगतान करने तथा मानसिक क्षति के लिए मुआवजा देने का आदेश पारित किया।

परिवाद संख्या 295/2025

यह मामला निवेश योजना से जुड़ा था, जिसमें कंपनी द्वारा आकर्षक लाभ का वादा कर निवेश कराया गया, परंतु तय समय पर परिपक्वता राशि का भुगतान नहीं किया गया। परिवादी ने आयोग में परिवाद दायर कर मूल निवेश राशि व प्रतिफल की मांग की। आयोग ने पाया कि कंपनी पारदर्शिता और समयबद्ध भुगतान सुनिश्चित करने में विफल रही। इसे गंभीर सेवा में कमी मानते हुए आयोग ने कंपनी को निवेश की मूल राशि लौटाने, अनुबंधानुसार लाभ/ब्याज देने तथा अतिरिक्त क्षतिपूर्ति और वाद व्यय का भुगतान करने का आदेश दिया।

इन तीनों मामलों सहित कुल 18 प्रकरणों में आयोग ने स्पष्ट संदेश दिया कि उपभोक्ता अधिकारों की अनदेखी करने वाली संस्थाओं के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाएगी। आयोग के इन आदेशों से उपभोक्ताओं में न्याय व्यवस्था के प्रति विश्वास और अधिक मजबूत हुआ है।

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