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13 साल बाद दहेज उत्पीड़न मामले में पति-सास बरी, अदालत बोली-गवाहों के बयान विरोधाभासी, आरोप साबित नहीं

Jodhpur Court Acquits Husband and Mother-in-Law in 13-Year Dowry Harassment Case, Calls Allegations Unproven

कैलाश सारस्वत, जोधपुर। दहेज उत्पीड़न, मारपीट और स्त्रीधन हड़पने के आरोपों से जुड़े करीब 13 साल पुराने मामले में जोधपुर की अदालत ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आरोपी पति और सास को बरी कर दिया।

महानगर न्यायिक मजिस्ट्रेट संख्या-9 चंदन भाटी की अदालत ने कहा कि परिवादिया और उसके परिजनों के बयानों में गंभीर विरोधाभास पाए गए, जिसके कारण अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने में असफल रहा।

अदालत ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि आपराधिक मामलों में आरोप सिद्ध करने की जिम्मेदारी अभियोजन पक्ष की होती है और जब तक आरोप ठोस व विश्वसनीय साक्ष्यों से साबित न हो जाएं, तब तक किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इस मामले में उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के बयानों का परीक्षण करने के बाद अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि आरोप प्रमाणित नहीं होते हैं।

वर्ष 2013 में दर्ज हुआ था मामला

प्रकरण के अनुसार भीनमाल निवासी एक महिला ने वर्ष 2013 में जोधपुर के महिला थाना में अपने पति और सास के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई थी। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया था कि विवाह के बाद से ही ससुराल पक्ष की ओर से उसे लगातार दहेज के लिए प्रताड़ित किया जाता था।

परिवादिया ने अपनी शिकायत में कहा था कि उसके पति और सास कार, 11 लाख रुपये नकद और सोने के आभूषणों की मांग कर रहे थे। मांग पूरी नहीं करने पर उसके साथ मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न किया गया। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया कि उसके स्त्रीधन को हड़प लिया गया और कई बार उसके साथ मारपीट भी की गई।

इन आरोपों के आधार पर पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की और बाद में अदालत में आरोप पत्र पेश किया गया। इसके बाद मामला अदालत में विचाराधीन रहा और गवाहों के बयान दर्ज किए गए।

बचाव पक्ष

मामले में आरोपी पति की ओर से अधिवक्ता हेमन्त बावेजा ने अदालत में पैरवी की।

बचाव पक्ष ने अदालत के समक्ष यह तर्क रखा कि परिवादिया के आरोप तथ्यात्मक रूप से प्रमाणित नहीं हैं और गवाहों के बयानों में कई विरोधाभास हैं।

वाहों के बयानों में सामने आए विरोधाभास

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयान और उपलब्ध साक्ष्यों का विस्तृत परीक्षण किया। सुनवाई के दौरान यह पाया गया कि परिवादिया और उसके परिजनों के बयानों में कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर विरोधाभास मौजूद हैं।

परिवादिया ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट में यह आरोप लगाया था कि विवाह के तुरंत बाद से ही उसे दहेज के लिए प्रताड़ित किया जाने लगा था। लेकिन जिरह के दौरान उसने स्वीकार किया कि बेटी के जन्म तक ससुराल पक्ष का व्यवहार सामान्य था और उस दौरान कोई गंभीर विवाद नहीं हुआ था।

अदालत ने इस तथ्य को महत्वपूर्ण माना और कहा कि इस प्रकार के विरोधाभास अभियोजन पक्ष की कहानी को कमजोर करते हैं। जब मुख्य गवाह के बयान ही स्पष्ट और सुसंगत नहीं हों, तो आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करना कठिन हो जाता है।

अदालत ने दिया संदेह का लाभ

सभी साक्ष्यों और गवाहों के बयानों का परीक्षण करने के बाद अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपों को प्रमाणित करने में असफल रहा है। इसलिए आरोपी पति और सास को भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए (दहेज उत्पीड़न), 406 (आपराधिक न्यास भंग) और 323 (मारपीट) के आरोपों से संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया गया।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि आपराधिक न्याय प्रणाली का मूल सिद्धांत है कि यदि आरोपों को संदेह से परे सिद्ध नहीं किया जा सके तो आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

13 साल बाद आया फैसला

इस मामले की सुनवाई करीब 13 साल तक चली। वर्ष 2013 में दर्ज हुए इस प्रकरण में कई बार सुनवाई टली और गवाहों के बयान दर्ज किए गए। अंततः सभी साक्ष्यों और तथ्यों के आधार पर अदालत ने अपना अंतिम निर्णय सुनाया।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे मामलों में अदालत साक्ष्यों की विश्वसनीयता और गवाहों के बयानों की संगति को बहुत महत्व देती है। यदि बयानों में गंभीर विरोधाभास हो या आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध न हों, तो आरोपी को संदेह का लाभ मिलना स्वाभाविक है।

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