जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई महिला वैधानिक रूप से मृतक सरकारी कर्मचारी की पत्नी है, भले ही वह दूसरी पत्नी ही क्यों न हो, तो उसे पारिवारिक पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता।
राजस्थान हाईकोर्ट ने यह भी माना कि राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों में प्रचलित नाता विवाह (Nata Vivah) को, यदि वह समुदाय की प्रथाओं के अनुसार संपन्न हुआ हो, तो विवाह के रूप में मान्यता प्राप्त है और ऐसे विवाह से जुड़ी पत्नी को भी सेवा लाभों का अधिकार होगा।
जस्टिस अशोक कुमार जैन की एकलपीठ ने यह ऐतिहासिक फैसला याचिकाकर्ता राम प्यारी सुमन की ओर से दायर याचिका पर दिया है।
नाता विवाह से पत्नी
याचिका में याचिकाकर्ता महिला ने दिवंगत सरकारी कर्मचारी पूरन लाल सैनी की पत्नी होने का दावा करते हुए पारिवारिक पेंशन और उसके बकाया भुगतान की मांग की।
याचिका में कहा गया कि पूरन लाल सैनी राज्य सरकार में पटवारी के पद पर कार्यरत थे और सेवानिवृत्ति के बाद उनका निधन 20 दिसंबर 2020 को हो गया था।
याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि मृतक की पहली पत्नी के निधन के बाद उन्होंने पूरन लाल सैनी से विवाह किया था और इस संबंध से एक पुत्री भी जन्मी।
वैवाहिक विवाद के कारण उन्होंने पारिवारिक न्यायालय में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत भरण-पोषण का मामला दायर किया था, जिसे अदालत ने स्वीकार करते हुए भरण-पोषण का आदेश दिया।
बाद में धारा 127 के तहत भरण-पोषण बढ़ाने के प्रकरण में स्वयं पूरन लाल सैनी ने गवाही दी और याचिकाकर्ता को अपनी पत्नी स्वीकार किया।
सरकार का विरोध
राज्य सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया कि मृतक कर्मचारी के सेवा रिकॉर्ड में याचिकाकर्ता का नाम पारिवारिक सदस्य के रूप में दर्ज नहीं था और उन्होंने स्वयं को “नाता पत्नी” बताया था, जिसे विधिवत विवाह नहीं माना जा सकता।
सरकार ने कहा कि मामले का मुख्य प्रश्न यह है कि क्या याचिकाकर्ता, जो स्वयं को मृतक कर्मचारी की पत्नी बताती हैं, पारिवारिक पेंशन पाने की हकदार हैं या नहीं।
हाईकोर्ट का आदेश
राजस्थान हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों, विशेषकर पारिवारिक न्यायालय के 14 फरवरी 2017 के आदेश, को निर्णायक माना।
हाईकोर्ट ने कहा कि मृतक कर्मचारी द्वारा अदालत में दिया गया बयान, जिसमें उन्होंने याचिकाकर्ता को पत्नी स्वीकार किया, एक महत्वपूर्ण और स्वीकार्य साक्ष्य है।
हाईकोर्ट ने कहा कि मृतक कर्मचारी की यह स्वीकारोक्ति, जो एक न्यायिक आदेश का हिस्सा है, विवाद के निपटारे के लिए निर्णायक साक्ष्य के रूप में मानी जाएगी।
अदालत ने यह भी नोट किया कि मृतक कर्मचारी ने अपनी पुत्री के विवाह तक उसे भरण-पोषण दिया, जिससे पारिवारिक संबंध की पुष्टि होती है।
इसके विपरीत ऐसा कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आया, जिससे याचिकाकर्ता के दावे को खारिज किया जा सके।
नाता विवाह को मान्यता
राजस्थान हाईकोर्ट ने नाता विवाह की प्रथा पर कहा कि राजस्थान के कई ग्रामीण इलाकों में यह एक मान्य सामाजिक प्रथा है।
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 7 के अनुसार, यदि विवाह समुदाय की परंपराओं और रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न हुआ है, तो उसे वैध माना जा सकता है।
इस आधार पर अदालत ने माना कि नाता विवाह भी विवाह का ही एक रूप है।
नियम 66 का हवाला
हाईकोर्ट ने राजस्थान सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1996 के नियम 66 का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि कोई महिला विधिक रूप से मृतक कर्मचारी की पत्नी है और उसका तलाक नहीं हुआ है, तो केवल नामांकन न होने के आधार पर उसे पारिवारिक पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने इस संदर्भ में हाईकोर्ट के पूर्व के निर्णयों का भी हवाला दिया।
अंतिम आदेश
राजस्थान हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की याचिका स्वीकार करते हुए राज्य सरकार और संबंधित अधिकारियों को आदेश दिया कि वे याचिकाकर्ता राम प्यारी सुमन को मृतक सरकारी कर्मचारी की पत्नी और वैध लाभार्थी मानते हुए पारिवारिक पेंशन प्रदान करें।
साथ ही, यदि कोई लंबित औपचारिकताएं हैं तो उन्हें शीघ्र पूरा कर पेंशन भुगतान सुनिश्चित किया जाए।