हाईकोर्ट ने कहा- किसी कार्मिक के खिलाफ कार्रवाई से पूर्व आरोपों की जानकारी देना और सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य, ASI अजीत मोगा को बड़ी राहत
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने पुलिस विभाग में अनुशासनात्मक कार्रवाई और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को लेकर महत्वपूर्ण और बड़ा फैसला सुनाया है।
जस्टिस गणेश राम मीणा की एकलपीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि बिना नियमित विभागीय जांच के केवल अखबार में प्रकाशित फोटो या अप्रमाणित सामग्री के आधार पर किसी पुलिस अधिकारी को दोषी ठहराकर सजा नहीं दी जा सकती।
हाईकोर्ट ने कहा कि बिना नियमित विभागीय जांच के किसी पुलिस अधिकारी को दंडित करना संविधान और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।
जस्टिस गणेश राम मीणा की एकलपीठ ने यह महत्वपूर्ण फैसला सहायक उप निरीक्षक (ASI) अजीत मोगा की याचिका पर सुनाया है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने सहायक उप निरीक्षक (ASI) अजीत मोगा को बड़ी राहत देते हुए विभाग द्वारा उन्हें एएसआई से हेड कांस्टेबल पद पर पदावनत करने के आदेश को रद्द करते हुए विभागीय अपीलीय आदेश को भी अवैध ठहराया।
हाईकोर्ट ने कहा कि राजस्थान सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1958 के नियम 19(ii) का प्रयोग असाधारण परिस्थितियों में ही किया जा सकता है, न कि सामान्य प्रशासनिक सुविधा के लिए।
क्या था पूरा मामला
याचिकाकर्ता ASI अजीत मोगा राजस्थान पुलिस में सहायक उप निरीक्षक के पद पर कार्यरत थे।
उन्हें जनवरी 2020 में उस समय निलंबित कर दिया गया, जब एक दैनिक समाचार पत्र में कुछ पुलिस अधिकारियों की कथित रूप से अपराधियों के साथ मौजूदगी दर्शाती तस्वीरें प्रकाशित हुईं।
इन तस्वीरों के आधार पर विभाग ने यह निष्कर्ष निकाला कि अजीत मोगा का आपराधिक तत्वों से संपर्क है और इससे पुलिस विभाग की छवि धूमिल हुई है।
इसके बाद बिना नियमित विभागीय जांच कराए, उन्हें नियम 19(ii) के तहत एएसआई से हेड कांस्टेबल के पद पर पदावनत कर दिया गया।
अजीत मोगा ने इस आदेश के खिलाफ पहले विभागीय अपील और फिर राजस्थान हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
याचिकाकर्ता की दलील
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में कहा गया कि उनके खिलाफ कोई नियमित विभागीय जांच नहीं की गई, न ही आरोप पत्र दिया गया।
याचिका में कहा गया कि उन्हें सुनवाई का कोई अवसर नहीं दिया गया, जो प्राकृतिक न्याय का घोर उल्लंघन है।
याचिका में यह भी दलील दी गई कि जिन तस्वीरों के आधार पर कार्रवाई की गई, उनकी फॉरेंसिक जांच तक नहीं कराई गई।
वर्तमान समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डिजिटल तकनीक से फोटो की सत्यता जांचे बिना उसे साक्ष्य मानना खतरनाक है।
सबसे महत्वपूर्ण तर्क यह था कि उसी फोटो में दिख रहे पुलिस निरीक्षक जोधा राम को भी पहले बर्खास्त किया गया था, लेकिन बाद में विभागीय अपील में उन्हें पूरी तरह राहत दे दी गई, जबकि अजीत मोगा की अपील खारिज कर दी गई। इसे भेदभावपूर्ण रवैया बताया गया।
21 से अधिक पुरस्कार
हाईकोर्ट में दायर की गई याचिका में याचिकाकर्ता एएसआई की ओर से यह भी कहा गया कि उनका लगभग 14 वर्षों का सेवा रिकॉर्ड उत्कृष्ट रहा है और उन्हें 21 से अधिक नकद पुरस्कार मिल चुके हैं।
राज्य सरकार का पक्ष
याचिका के जवाब में राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि याचिकाकर्ता अपराधियों के संपर्क में थे।
सरकार ने कहा कि याचिकाकर्ता के खिलाफ कॉल डिटेल्स और यात्रा से जुड़े तथ्य मौजूद थे और ऐसे मामलों में गवाह सामने आने की संभावना नहीं होती।
सरकार ने कहा कि इस मामले में विभागीय जांच कराना “व्यावहारिक नहीं” था, जिसके चलते नियम 19(ii) के तहत कार्रवाई को सही ठहराया गया।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
जस्टिस गणेश राम मीणा की एकलपीठ ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद स्पष्ट किया कि—
“केवल यह कह देना कि जांच कराना व्यावहारिक नहीं है, पर्याप्त कारण नहीं हो सकता। कानून यह अपेक्षा करता है कि ऐसे निष्कर्ष ठोस, वस्तुनिष्ठ और प्रमाणित तथ्यों पर आधारित हों।”
कोर्ट ने कहा कि—
नियम 19(ii) का उपयोग केवल अत्यंत असाधारण परिस्थितियों में किया जा सकता है। यह प्रावधान विभाग को जांच से बचने का लाइसेंस नहीं देता।
हाईकोर्ट ने कहा कि फोटो या मीडिया रिपोर्ट अपने आप में पुख्ता सबूत नहीं होतीं।
जब समान परिस्थितियों में एक अधिकारी को राहत दी गई, तो दूसरे को दंड देना अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है।
हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 311 का उल्लेख करते हुए कहा कि—
किसी भी सरकारी कर्मचारी को पद से हटाने, हटाने या पदावनत करने से पहले उसे आरोपों की जानकारी देना और सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य है।
विभाग को छूट
हाईकोर्ट ने सभी पक्षों को सुनने के बाद अजीत मोगा की पदावनति का आदेश रद्द करने के साथ ही विभागीय अपीलीय आदेश को भी अवैध करार दिया।
लेकिन यह भी स्पष्ट किया कि यदि विभाग चाहे, तो कानून के अनुसार नियमित जांच कर सकता है।