जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और न्यायिक दृष्टि से बेहद अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी भी आपराधिक मुकदमे में निष्पक्ष सुनवाई (फेयर ट्रायल) सर्वोपरि है और तकनीकी आधार पर आरोपी के अधिकारों को सीमित नहीं किया जा सकता।
राजस्थान हाईकोर्ट ने हत्या के बेहद गंभीर मामले में वकील की गैरमौजूदगी के चलते गवाह से अधूरी रही जिरह को अदालत ने न्याय के खिलाफ माना है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने अब इस मामले में ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए हत्या के मामले में आरोपी को मुख्य गवाह से दोबारा जिरह करने के लिए पुनः बुलाने के आदेश दिए हैं।
जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने भूपेन्द्र सिंह की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए यह फैसला दिया है।
याचिकाकर्ता भूपेन्द्र सिंह उर्फ तम्मू सिंह हत्या के गंभीर मामले का सामना कर रहा है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में ट्रायल कोर्ट के उस निर्णय को निरस्त कर दिया, जिसमें आरोपी द्वारा गवाह को पुनः बुलाने की मांग को खारिज कर दिया गया था।
क्या है पूरा मामला?
चित्तौड़गढ़ की अतिरिक्त सत्र न्यायालय संख्या-3 में चल रहे एक हत्या के मुकदमे में अभियोजन पक्ष के गवाह, जो कि प्रत्यक्षदर्शी (eyewitness) मुख्य बताया गया था।
गवाह का बयान 23 अप्रैल 2024 को दर्ज किया गया था।
रिकॉर्ड के अनुसार, बचाव पक्ष को गवाह से जिरह का अवसर दिया गया था, लेकिन उस दिन आरोपी के वकील की अनुपस्थिति के कारण आरोपी को स्वयं ही गवाह से प्रश्न करने पड़े।
चूंकि आरोपी विधिक प्रक्रिया से पूरी तरह परिचित नहीं था, इसलिए जिरह प्रभावी नहीं हो सकी।
इसी आधार पर आरोपी ने गवाह को पुनः बुलाने की मांग की थी, जिसे ट्रायल कोर्ट ने खारिज कर दिया। इसके बाद आरोपी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
याचिकाकर्ता की दलीलें
याचिकाकर्ता भूपेन्द्र सिंह उर्फ तम्मू सिंह की ओर से हाईकोर्ट में दलील दी गई कि ट्रायल कोर्ट में उन्हें निष्पक्ष सुनवाई का वास्तविक अवसर नहीं दिया गया।
अधिवक्ता ने कहा कि इस मामले में मुख्य गवाह, जो कि कथित तौर पर प्रत्यक्षदर्शी है, का बयान अत्यंत महत्वपूर्ण था।
अधिवक्ता ने कहा कि जिस दिन गवाह का बयान हुआ, उस दिन बचाव पक्ष के अधिवक्ता उपस्थित नहीं थे। ऐसी स्थिति में आरोपी को स्वयं ही जिरह करनी पड़ी, जबकि वह कानून की बारीकियों से अनभिज्ञ है।
अधिवक्ता ने कहा कि “जिरह केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह आरोपी के बचाव का सबसे महत्वपूर्ण हथियार है।”
अधिवक्ता ने कहा कि “एक आम व्यक्ति, जो कानून का जानकार नहीं है, वह गवाह की विश्वसनीयता पर सवाल नहीं उठा सकता।”
अधिवक्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि आरोपी की ओर से की गई जिरह अधूरी, सतही और अप्रभावी रही। इस कारण गवाह के बयान को चुनौती देने का अवसर वास्तविक रूप से नहीं मिल पाया।
ट्रायल कोर्ट ने इस तथ्य को नजरअंदाज करते हुए पुनः जिरह का मौका देने से इनकार कर दिया, जो कि न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।
अधिवक्ता ने कहा कि “यदि मुख्य गवाह से प्रभावी जिरह का अवसर नहीं दिया गया, तो पूरा ट्रायल एकतरफा हो जाएगा और आरोपी को गंभीर अन्याय का सामना करना पड़ेगा।”
सरकार और प्रतिवादी का जवाब
राज्य की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ने याचिका का विरोध करते हुए ट्रायल कोर्ट के आदेश को सही ठहराया।
सरकार की ओर से दलील दी गई कि बचाव पक्ष को पहले ही गवाह से जिरह का पूरा अवसर दिया जा चुका था। अदालत की प्रक्रिया के दौरान आरोपी को मौका मिला, लेकिन उसका सही उपयोग नहीं किया गया।
सरकार ने कहा कि केवल इस आधार पर कि वकील उपस्थित नहीं था, पूरी प्रक्रिया को दोहराना न्यायिक समय की बर्बादी होगा।
सरकार ने कहा कि “यदि हर मामले में इस प्रकार गवाहों को बार-बार बुलाया जाएगा, तो ट्रायल अनावश्यक रूप से लंबा खिंचेगा।”
सरकार ने कहा कि “यह एक प्रकार से देरी (delay tactic) का तरीका भी हो सकता है।”
सरकार ने कहा कि गवाह पहले ही कोर्ट में पेश होकर बयान दे चुका है। उसे दोबारा बुलाना उसके लिए असुविधाजनक होगा। इससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित होगी और मुकदमे के निस्तारण में देरी होगी।
राजस्थान हाईकोर्ट का फैसला
दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि—
आपराधिक मुकदमे, विशेषकर वे जिनमें सजा मृत्यु दंड या आजीवन कारावास तक हो सकती है, केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं हैं, बल्कि यह एक गंभीर न्यायिक जांच होती है, जिसमें व्यक्ति की स्वतंत्रता और जीवन दांव पर होता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि—
किसी भी आरोपी को गवाह से प्रभावी जिरह करने का अधिकार एक मौलिक अधिकार है। यदि जिरह उचित तरीके से नहीं हो पाती, तो यह निष्पक्ष सुनवाई के सिद्धांत का उल्लंघन है।
कोर्ट ने कहा कि एक सामान्य व्यक्ति से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह एक अनुभवी वकील की तरह गवाह की विश्वसनीयता पर सवाल उठा सके।
हाईकोर्ट ने कहा कि केवल औपचारिक अवसर देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि वह अवसर वास्तविक और प्रभावी होना चाहिए।
न्याय बनाम तकनीकी
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ट्रायल कोर्ट का दृष्टिकोण अत्यधिक तकनीकी था, जिससे न्याय का उद्देश्य प्रभावित हुआ।
कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि न्यायालयों को “form over substance” यानी औपचारिकता को वास्तविक न्याय से ऊपर नहीं रखना चाहिए।
अदालत ने यह भी माना कि गवाह को दोबारा बुलाने से कुछ असुविधा जरूर होगी, लेकिन यह असुविधा आरोपी के मौलिक अधिकारों से बड़ी नहीं हो सकती।
अंतिम आदेश
राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले में चित्तौड़गढ़ की ट्रायल कोर्ट के 10 फरवरी 2026 को दिए गए आदेश को रद्द कर दिया है।
हाईकोर्ट ने इस मामले के मुख्य गवाह को सशर्त पुनः बुलाने का आदेश दिया है।
कोर्ट ने कहा कि जिरह उसी दिन पूरी की जाएगी, किसी भी प्रकार का स्थगन (adjournment) नहीं दिया जाएगा। जिरह केवल प्रासंगिक प्रश्नों तक सीमित रहेगी।
इसके साथ ही आरोपी को वापस बुलाए जाने वाले गवाह को ₹5,000 की राशि मुआवजे के रूप में देनी होगी।