सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि मजिस्ट्रेट को धारा 156(3) CrPC के तहत FIR दर्ज करने का आदेश देने के लिए किसी भी प्रकार की पूर्व सरकारी मंजूरी (sanction) की आवश्यकता नहीं होती।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा कि धारा 196 और 197 CrPC के तहत जो पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता होती है, वह केवल उस चरण पर लागू होती है जब अदालत अपराध का संज्ञान (cognizance) लेती है, न कि FIR दर्ज करने या जांच शुरू करने के शुरुआती चरण में।
क्या था पूरा मामला
यह मामला CPI(M) नेता बृंदा करात द्वारा दायर याचिका से जुड़ा था, जिसमें उन्होंने दिल्ली दंगों (2020) से पहले कथित हेट स्पीच को लेकर कुछ नेताओं के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग की थी। उन्होंने कपिक मिश्रा और अनुराग ठाकुर सहित अन्य के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी।
हालांकि मजिस्ट्रेट ने यह कहते हुए FIR दर्ज करने का आदेश देने से इनकार कर दिया था कि इसके लिए पहले सरकारी मंजूरी जरूरी है। बाद में दिल्ली हाईकोर्ट ने भी इस फैसले को सही ठहराया।
इसके खिलाफ याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं। याचिकाकर्ता का कहना था कि अगर FIR दर्ज करने से पहले ही मंजूरी की शर्त लगा दी जाए, तो गंभीर अपराधों की जांच शुरू ही नहीं हो पाएगी।
वहीं दूसरी ओर, यह तर्क दिया गया कि कुछ विशेष मामलों, खासकर सार्वजनिक अधिकारियों से जुड़े मामलों में, कानून के तहत पूर्व मंजूरी आवश्यक है।
SC का स्पष्ट रुख: जांच से पहले मंजूरी जरूरी नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे मुद्दे पर स्पष्ट करते हुए कहा कि FIR दर्ज करना और जांच शुरू करना “pre-cognizance stage” का हिस्सा है।
अदालत ने कहा कि इस स्तर पर मंजूरी की जरूरत नहीं होती, क्योंकि यह केवल जांच की शुरुआत है, न कि दोष तय करने की प्रक्रिया। कोर्ट ने कहा कि अगर इस स्तर पर ही मंजूरी की शर्त लगा दी जाए, तो यह कानून की मंशा के खिलाफ होगा और न्याय प्रक्रिया बाधित होगी
कोर्ट ने कहा कि FIR दर्ज करने और जांच शुरू करने का चरण “pre-cognizance stage” होता है, जहां किसी भी प्रकार की पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं होती।
इसलिए, मजिस्ट्रेट 156(3) CrPC के तहत सीधे FIR दर्ज कराने का निर्देश दे सकता है।
हेट स्पीच पर कोर्ट की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि देश में हेट स्पीच से निपटने के लिए मौजूदा कानून पर्याप्त हैं और नए कानून बनाने की जरूरत फिलहाल नहीं है।
कोर्ट ने यह जिम्मेदारी विधायिका (legislature) पर छोड़ दी कि वह आवश्यकता पड़ने पर नए प्रावधानों पर विचार करे।
अदालत ने अपने फैसले में यह भी दोहराया कि अगर कोई संज्ञेय अपराध (cognizable offence) सामने आता है, तो पुलिस के लिए FIR दर्ज करना अनिवार्य है। कोर्ट ने कहा कि अगर पुलिस FIR दर्ज नहीं करती, तो कानून में पहले से ही इसके खिलाफ उपाय मौजूद हैं।
कानूनी प्रक्रिया पर SC का जोर
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि CrPC और BNSS में FIR दर्ज कराने और जांच शुरू कराने के लिए एक पूरा कानूनी ढांचा (statutory framework) मौजूद है।
इसमें पुलिस अधीक्षक के पास जाने, मजिस्ट्रेट के पास आवेदन करने और शिकायत दर्ज कराने जैसे विकल्प शामिल हैं।
अदालत ने स्पष्ट किया कि इन उपायों के होते हुए किसी नए हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है।
अंतिम फैसला: HC का आदेश आंशिक रूप से रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतिम आदेश में दिल्ली हाईकोर्ट के उस निष्कर्ष को रद्द कर दिया, जिसमें कहा गया था कि मजिस्ट्रेट बिना पूर्व मंजूरी के FIR दर्ज करने का आदेश नहीं दे सकता।
हालांकि, कोर्ट ने अन्य व्यापक निर्देश देने से इनकार कर दिया और मौजूदा कानून को पर्याप्त माना।
कोर्ट ने कहा कि FIR दर्ज करने और जांच शुरू करने का चरण “pre-cognizance stage” होता है, जहां किसी भी प्रकार की पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं होती।इसलिए, मजिस्ट्रेट 156(3) CrPC के तहत सीधे FIR दर्ज कराने का निर्देश दे सकता है।
इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि जांच शुरू करने के लिए मंजूरी की बाध्यता नहीं है।
यह निर्णय उन मामलों में खास महत्व रखता है, जहां पुलिस FIR दर्ज करने में देरी करती है या मंजूरी का हवाला देकर कार्रवाई टालती है।
