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हर मौत हत्या नहीं होती, एक वार, कोई मंशा नहीं, लेकिन…. पत्नी की मौत के मामले में राजस्थान हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

Not Every Death is Murder: Rajasthan High Court Alters Conviction in Wife’s Death Case

फावड़े के सिर्फ एक वार से हुई पत्नी की मौत पर हाईकोर्ट ने बदली सजा, ‘इरादा नहीं, सिर्फ ज्ञान’ मानते हुए धारा 304 पार्ट-II में दोषी करार – 7 साल की सजा बरकरार

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील आपराधिक मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि हर मौत हत्या नहीं होती, बल्कि परिस्थितियों और मानसिक अवस्था के आधार पर अपराध की प्रकृति तय की जाती है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने 21 साल पुराने हत्या के एक मामले में दोषी पति को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 304 भाग I की जगह भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 304 भाग II में दोषी मानते हुए 7 साल की सजा सुनाई है।

मामले में पति द्वारा पत्नी पर किए गए फावड़े के एक ही वार में मौत हो गई थी।

नाबालिग बेटे की गवाही से हुई थी सजा

यह मामला वर्ष 2005 का है, जब चित्तौड़गढ़ जिले के प्रतापगढ़ थाना क्षेत्र में एक महिला किरण की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी।

मृतका के पिता उमेद सिंह ने रिपोर्ट दर्ज कराई कि उनकी बेटी को उसके पति पिंटू उर्फ प्रवीण सिंह ने फावड़े से सिर पर वार कर घायल किया, जिससे उसकी बाद में मौत हो गई।

घटना के समय मृतका के दो छोटे बच्चे भी मौजूद थे। इनमें से एक नाबालिग बच्चे ने ही घटना का प्रत्यक्षदर्शी गवाह बनते हुए बताया कि उसके पिता ने फावड़े से वार किया था।

पहले इस मामले में धारा 307 IPC (हत्या का प्रयास) के तहत मामला दर्ज हुआ, लेकिन महिला की मृत्यु के बाद इसे धारा 302 IPC (हत्या) में परिवर्तित कर दिया गया।

ट्रायल कोर्ट का फैसला

मामले में ट्रायल कोर्ट ने हत्या के करीब दो वर्ष बाद वर्ष 2007 में फैसला सुनाते हुए आरोपी पति को धारा 304 पार्ट-I IPC (गैर इरादतन हत्या) में दोषी ठहराया, लेकिन धारा 302 (हत्या) से बरी कर दिया।

इसके साथ ही आरोपी के माता-पिता को धारा 498A (क्रूरता) के आरोप से मुक्त कर दिया गया था।

इस फैसले के खिलाफ राज्य सरकार ने सजा बढ़ाने और हत्या साबित करने के लिए हाईकोर्ट में अपील दायर की, वहीं आरोपी पति ने खुद को पूरी तरह बरी करने की मांग करते हुए अपील दायर की।

हाईकोर्ट में क्या हुआ?

राजस्थान हाईकोर्ट में जस्टिस फरजंद अली और जस्टिस संदीप शाह ने दोनों अपीलों की एक साथ सुनवाई करते हुए कई कानूनी बिंदुओं को बहस के लिए तय किया।

हाईकोर्ट ने पूछा:
क्या यह हत्या थी?
क्या यह पूर्व नियोजित (premeditated) हत्या थी?
क्या इस मामले में आरोपी के पास हत्या की मंशा स्पष्ट थी?
क्या वार करने के बाद भी पति ने उसे जारी रखा?

पक्ष-विपक्ष की दलीलें और बहस

आरोपी पति की दलीलें

मामले में आरोपी पति की ओर से अधिवक्ताओं ने कई महत्वपूर्ण दलीलें पेश कीं।

— घटना अचानक हुई, कोई पूर्व योजना नहीं थी। अधिवक्ता ने कहा कि घटना एक सामान्य वैवाहिक विवाद के दौरान हुई थी और हत्या का कोई पूर्व नियोजन (premeditation) नहीं था, न ही पति कोई हथियार साथ लेकर आया था।

— अधिवक्ता ने कहा कि घटना में प्रयोग हुआ फावड़ा मौके पर पड़ा था और उसी का उपयोग किया गया।

— यह भी दलील दी गई कि आरोपी पति द्वारा फावड़े का केवल एक ही वार किया गया और बार-बार हमला नहीं किया गया, जिससे स्पष्ट है कि हत्या का इरादा नहीं था।

— आरोपी पति की दलील थी कि घटना आवेश में हुई थी और वह उस समय गुस्से और उत्तेजना में था, अचानक हुए विवाद में आत्म-नियंत्रण खो बैठा।

— अधिवक्ता ने कहा कि यह “grave and sudden provocation” का मामला है, जिसके चलते धारा 304 Part-I लागू नहीं होती।

— अधिवक्ता ने कहा कि उसका इरादा हत्या करने का नहीं था, इसलिए धारा 304 Part-I (इरादे के साथ) भी गलत है।

— अधिवक्ता ने कहा कि अधिकतम यह धारा 304 Part-II (ज्ञान के आधार पर) बनता है या फिर पूर्ण बरी किया जाना चाहिए।

— 498A के आरोप को निराधार बताते हुए आरोपी और उसके परिवार की ओर से कहा गया कि मृतका के साथ लगातार क्रूरता के कोई ठोस प्रमाण नहीं हैं और केवल एक घटना के आधार पर 498A लागू नहीं किया जा सकता।

— आरोपी पति ने दलील दी कि उसके छोटे-छोटे बच्चे हैं, वही उनका पालन-पोषण कर रहा है। लंबी सजा से बच्चों का भविष्य प्रभावित होगा।

राज्य सरकार की दलील और विरोध

राज्य सरकार ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में अपील दायर की। राज्य का मुख्य तर्क यह था कि ट्रायल कोर्ट ने मामले की गंभीरता को कम करके आंका और आरोपी को गलत तरीके से राहत दी।

— सरकार ने कहा कि यह स्पष्ट रूप से हत्या (Section 302 IPC) का मामला है, क्योंकि आरोपी ने मृतका के सिर जैसे संवेदनशील अंग पर फावड़े से वार किया।

— सिर पर वार करना स्वाभाविक रूप से घातक होता है, इसलिए इसे साधारण झगड़ा या अचानक घटना नहीं माना जा सकता।

— सरकार ने दलील दी कि आरोपी को धारा 302 IPC (हत्या) में दोषी ठहराया जाना चाहिए था।

— सरकार ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने गलत तरीके से धारा 304 Part-I लागू की, क्योंकि आरोपी का कृत्य गंभीर था और जानलेवा हथियार (फावड़ा) का उपयोग किया गया।

— इस प्रकार यह ‘ज्ञान’ नहीं बल्कि ‘इरादा’ का मामला है।

— सरकार ने कहा कि इसलिए धारा 304 Part-I भी अपर्याप्त है और इसे सीधे हत्या माना जाना चाहिए।

— सरकार ने धारा 498A (क्रूरता) में बरी करने को गलत बताते हुए कहा कि मृतका के साथ ससुराल पक्ष द्वारा प्रताड़ना की जाती थी और पति, सास और ससुर सभी जिम्मेदार थे।

हाईकोर्ट का बिंदुवार फैसला

क्या यह हत्या थी?

दोनों पक्षों की दलीलों के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि यह घटना अचानक हुए विवाद का परिणाम थी। आरोपी अपने साथ कोई हथियार लेकर नहीं आया था और फावड़ा मौके पर ही पड़ा हुआ था।

कोर्ट ने कहा कि केवल एक ही वार किया गया और वार के बाद आरोपी ने दोबारा हमला नहीं किया।

इन तथ्यों के आधार पर कोर्ट ने कहा कि यह पूर्व नियोजित (premeditated) हत्या नहीं थी और न ही आरोपी के पास हत्या की स्पष्ट मंशा थी।

“इरादा” बनाम “ज्ञान”

हाईकोर्ट ने इस मामले में इरादा (Intention) और ज्ञान (Knowledge) में फर्क को स्पष्ट किया।

कोर्ट ने कहा कि आरोपी का इरादा हत्या का नहीं था, लेकिन उसे यह ज्ञान जरूर था कि सिर पर फावड़े से वार मौत का कारण बन सकता है।

इसलिए यह मामला धारा 304 पार्ट-I नहीं, बल्कि धारा 304 पार्ट-II IPC के तहत आता है।

बच्चों का भविष्य भी बना आधार

हाईकोर्ट ने आरोपी पति को धारा 304 पार्ट-II में दोषी माना, लेकिन मानवीय आधार पर लंबी सजा से इनकार किया।

कोर्ट के अनुसार आरोपी अपने बच्चों की देखभाल कर रहा है और यदि उसे लंबी सजा दी गई तो बच्चे असहाय हो जाएंगे।

498A पर कोर्ट की टिप्पणी

कोर्ट ने कहा कि इस मामले में लगातार क्रूरता के प्रमाण नहीं हैं और यह एक एकल (single) घटना थी।

इसलिए ट्रायल कोर्ट द्वारा 498A में बरी करने का फैसला सही माना गया।

अंतिम फैसला

राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी और आरोपी पति की अपील आंशिक रूप से स्वीकार की।

कोर्ट ने आरोपी को IPC की धारा 304 Part-II में दोषी ठहराते हुए 7 साल के कठोर कारावास (Rigorous Imprisonment) की सजा सुनाई।

धारा 304 पार्ट-I से पार्ट-II में क्यों बदली सजा?

अदालत ने स्पष्ट किया:

आधारपार्ट-Iपार्ट-II
इरादाहोता हैनहीं होता
ज्ञानहोता हैहोता है
केस की स्थितिजानबूझकर चोटबिना इरादे, लेकिन परिणाम का ज्ञान

इस केस में इरादा साबित नहीं हुआ लेकिन ज्ञान मौजूद था, इसलिए सजा पार्ट-II में परिवर्तित की गई।

अपीलकर्ता पति की ओर से अधिवक्ता रमेश पुरोहित ने पैरवी की।
राज्य सरकार और प्रतिवादियों की ओर से अधिवक्ता राजेश भाटी और भगत दाधिच ने पैरवी।

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