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सीकर में ओजस्वी मार्बल्स ने शुरू किया 600 बीघा फोरेस्ट भूमि पर खनन, किसानो ने सुप्रीम कोर्ट से लगाई गुहार

Mining activities allegedly commenced without prior court approval near a conservation reserve, raising environmental and livelihood concerns

नई दिल्ली/सीकर। देश की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखला अरावली को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

राजस्थान के सीकर जिले के नीमकाथाना क्षेत्र में अरावली की पहाड़ियों पर कथित रूप से शुरू की गई खनन गतिविधियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक नई इंटरलोक्यूटरी एप्लीकेशन (I.A. of 2026) यानी पक्षकार बनने का प्रार्थना पत्र दाखिल किया गया हैं.

यह आवेदन सुप्रीम कोर्ट में पहले से सुनवाई कि जा रहे स्वप्रेणा प्रंसज्ञान से दर्ज याचिका संख्या 10/2025 – ‘अरावली हिल्स और रेंज की परिभाषा एवं सहायक मुद्दे’ में किया गया हैं.

आवेदनकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद, अरावली क्षेत्र में बिना सुप्रीम कोर्ट की पूर्व अनुमति के खनन गतिविधियां शुरू कर दी गईं, जो न केवल अदालत की अवहेलना है बल्कि पर्यावरणीय दृष्टि से भी अत्यंत घातक है

सुप्रीम कोर्ट में 21 जनवरी को सुनवाई के दौरान पेश कि किए गए किसानों के प्रार्थना पत्र की प्रति राज्य सरकार के अतिरिक्त महाधिवक्ता शिवमंगल शर्मा को सोपने के आदेश देते हुए मौखिक टिप्पणी भी कि सरकार देखे कि कोर्ट के आदेशो की पालना सख्ती से हो.

ये हैं पूरा मामला

सीकर जिले के नीमकाथाना तहसील के दीपास, रामलियावास और घाटा गँवार गांवों में स्थित लगभग 180 हेक्टेयर क्षेत्र यानी करीब 710 बीघा में लौह अयस्क (आयरन ओर) खनन के लिए ओजस्वी मार्बल्स एंड ग्रेनाइट्स प्राइवेट लिमिटेड को अनुमति दी गई हैं।

इस परियोजना में से 149.3002 हेक्टेयर भूमि वन क्षेत्र की बताई गई है। जो कि 600 बीघा के करीब हैं.

आवेदनकर्ताओं के अनुसार, यह पूरा क्षेत्र अरावली पर्वत श्रृंखला का हिस्सा है और यह इलाका बलेश्वर संरक्षण रिजर्व से महज 1.7 से 2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

इतना ही नहीं, इस खनन पट्टे के बीच से गिरजन नदी भी बहती है, जो आसपास के लगभग 40 गांवों और ढाणियों के लिए पीने के पानी और सिंचाई का मुख्य स्रोत है

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सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश के बावजूद खनन?

प्रार्थना पत्र में सुप्रीम कोर्ट के 9 मई 2024 के आदेश का विशेष उल्लेख किया गया है, जो एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ मामले में पारित हुआ था। उस आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि—

“जब तक इस न्यायालय की पूर्व अनुमति न हो, तब तक Forest Survey of India (FSI) की 25 अगस्त 2010 की रिपोर्ट के अनुसार परिभाषित अरावली पहाड़ियों में किसी भी प्रकार की खनन गतिविधि के लिए अंतिम अनुमति नहीं दी जा सकती।”

इसके बावजूद, आरोप है कि 25 सितंबर 2024 को स्टेज-II फॉरेस्ट क्लीयरेंस, 21 अक्टूबर 2024 को ‘कंसेंट टू एस्टैब्लिश’ और 9 दिसंबर 2024 को ‘कंसेंट टू ऑपरेट’ जारी कर दिए गए।

आवेदनकर्ताओं का कहना है कि ये सभी अनुमतियां सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद दी गईं, जो सीधी अवहेलना के दायरे में आती हैं

500 पेड़ काटने का आरोप, भारी मशीनों की आवाज

दस्तावेज़ों के अनुसार, 16 जनवरी 2026 से खनन क्षेत्र में भारी मशीनरी और अर्थ मूवर्स के जरिए जमीन समतल करने, सड़क निर्माण और अन्य सहायक गतिविधियां शुरू कर दी गईं।

इससे पहले लगभग 500 पूर्ण विकसित पेड़ों की कटाई किए जाने का भी आरोप लगाया गया है।

फोटोग्राफ्स के माध्यम से यह दर्शाया गया है कि यह खनन कार्य 3 डिग्री से अधिक ढाल वाली पहाड़ियों पर हो रहा है, जो FSI की परिभाषा के अनुसार स्पष्ट रूप से अरावली क्षेत्र में आता है

अरावली की परिभाषा और विवाद

Forest Survey of India की 2010 की रिपोर्ट के अनुसार, अरावली पहाड़ियों की पहचान के लिए चार प्रमुख मानदंड तय किए गए हैं ढाल (Slope) 3 डिग्री से अधिक, फुटहिल बफर 100 मीटर, पहाड़ियों के बीच की दूरी 500 मीटर, चारों ओर से पहाड़ियों से घिरा क्षेत्र

आवेदनकर्ताओं का दावा है कि खनन पट्टा इन सभी मानदंडों को पूरा करता है, इसके बावजूद बिना सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के खनन शुरू किया गया

वन्यजीव और जैव विविधता पर खतरा

प्रार्थना पत्र में कहा गया कि यह क्षेत्र न केवल अरावली का हिस्सा है, बल्कि राजस्थान वन विभाग की ‘टाइगर कंजर्वेशन लॉन्ग टर्म एक्शन प्लान’ के अनुसार यह इलाका बाघों और तेंदुओं के संभावित आवास और गलियारे के रूप में चिन्हित है।

साथ ही, बलेश्वर संरक्षण रिजर्व (2025-26 से 2034-35 प्रबंधन योजना) में भी इस पूरे क्षेत्र को अरावली पर्वत श्रृंखला का अभिन्न हिस्सा बताया गया है। ऐसे में खनन गतिविधियां इस संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र को अपूरणीय क्षति पहुंचा सकती हैं

स्थानीय किसानों की आजीविका पर सीधा असर

प्रार्थना पत्र में कहा गया ​हैं कि आवेदनकर्ता स्वयं किसान हैं, जिनकी कृषि भूमि और मकान खनन पट्टे के अंतर्गत आते हैं। उनका कहना है कि यदि खनन जारी रहा तो उनकी खेती, जल स्रोत और आजीविका पूरी तरह समाप्त हो जाएगी। गिरजन नदी के प्रदूषित होने से सिंचाई और पीने के पानी का संकट भी गहरा सकता है

पहले एनजीटी, अब सुप्रीम कोर्ट

इससे पहले आवेदकों ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) में भी याचिका दायर की थी, जहां उन्हें पर्यावरणीय मंजूरी को विधि अनुसार चुनौती देने की स्वतंत्रता दी गई थी।

अब सुप्रीम कोर्ट से मांग की गई है कि जब तक 29 दिसंबर 2025 को गठित हाई पावर्ड एक्सपर्ट कमेटी अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं कर देती, तब तक सभी प्रकार की खनन गतिविधियों पर रोक लगाई जाए

सरकार को प्रति देने के आदेश

सुप्रीम कोर्ट में 21 जनवरी को पेश किए गए ​इस प्रार्थना पत्र पर कोर्ट ने प्रार्थना पत्र की प्रति राजस्थान सरकार के अतिरिक्त महाधिवक्ता को देने के निर्देश दिए.

पीठ ने मौखिक रूप से सरकार के अधिवक्ता को कहा कि कोर्ट के आदेशो की पालना सख्ती से होनी चाहिए.

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