कोर्ट ने कहा-43,000 फर्जी डिग्रियां और अंकतालिकाएं जारी करने का गंभीर आरोप, इस गंभीर अपराध से बेरोजगार युवाओं को भारी नुकसान।
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर पीठ ने फर्जी डिग्री रैकेट से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए मुख्य आरोपी अजय भारद्वाज और सह-आरोपी संगीता कड़वासरा उर्फ भूमि की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं।
हाईकोर्ट ने जमानत याचिकाएं खारिज करते हुए कहा कि दोनों के खिलाफ आरोप बेहद गंभीर प्रकृति के हैं और प्रथम दृष्टया यह मामला एक संगठित गिरोह द्वारा बड़े पैमाने पर फर्जी डिग्रियां जारी करने से जुड़ा प्रतीत होता है।
जस्टिस चंद्र प्रकाश श्रीमाली की एकलपीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि इस प्रकार की गतिविधियों से न केवल शिक्षा व्यवस्था प्रभावित होती है बल्कि विभिन्न भर्ती परीक्षाओं में शामिल होने वाले योग्य युवाओं को भी गंभीर नुकसान पहुंचता है।
क्या है पूरा मामला
मामला वर्ष 2024 में दर्ज एक एफआईआर से जुड़ा है, जिसमें आरोप लगाया गया था कि एक संगठित गिरोह फर्जी तरीके से विश्वविद्यालयों की डिग्रियां और अंकतालिकाएं उपलब्ध कराकर मोटी रकम वसूल रहा था।
एफआईआर के अनुसार, शिकायतकर्ता ने वर्ष 2022 में शारीरिक शिक्षा शिक्षक (PTI) सीधी भर्ती परीक्षा दी थी, लेकिन उसका चयन नहीं हुआ। बाद में उसे जानकारी मिली कि कुछ अभ्यर्थियों ने बीपीएड (B.P.Ed.) की फर्जी डिग्रियां हासिल कर परीक्षा में भाग लिया और चयनित हो गए।
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि एक व्यक्ति ने उससे संपर्क कर लगभग दो लाख रुपये में फर्जी बीपीएड डिग्री दिलाने का प्रस्ताव दिया था। इसी आधार पर पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की।
संगठित गिरोह चलाने का आरोप
जांच के दौरान पुलिस को पता चला कि आरोपी अजय भारद्वाज ने अपने साथियों के साथ मिलकर जयपुर में आईटी ट्रंप एजुकेशन नाम से एक संस्था बनाई थी।
आरोप है कि इस संस्था के माध्यम से विभिन्न विश्वविद्यालयों से मिलीभगत कर फर्जी डिग्रियां और मार्कशीट जारी कराई जाती थीं।
जांच में यह भी सामने आया कि आरोपी कथित रूप से जेएस विश्वविद्यालय, शिकोहाबाद (उत्तर प्रदेश) सहित अन्य संस्थानों से संपर्क कर अभ्यर्थियों को पूर्व तिथि में डिग्रियां उपलब्ध करवाता था।
इन फर्जी दस्तावेजों के आधार पर कई लोग सरकारी भर्तियों और अन्य नौकरियों के लिए आवेदन कर रहे थे।
भारी मात्रा में फर्जी दस्तावेज बरामद
पुलिस जांच में आरोपी के ठिकानों से बड़ी संख्या में फर्जी दस्तावेज और रिकॉर्ड बरामद किए गए। जांच एजेंसियों के अनुसार आरोपी के कब्जे से पूर्व तिथि में जारी डिग्रियां, अंकतालिकाएं और अन्य दस्तावेज मिले हैं।
जांच में यह भी सामने आया कि आरोपी के बैंक खातों में भारी मात्रा में लेन-देन हुआ है, जो इस अवैध गतिविधि से जुड़ा माना जा रहा है।
पुलिस के अनुसार आरोपी ने वर्ष 2016 से 2025 के बीच विभिन्न पाठ्यक्रमों की फर्जी डिग्रियां जारी करने के बदले बड़ी रकम वसूली।
हजारों फर्जी डिग्रियां जारी करने का आरोप
जांच के दौरान यह भी सामने आया कि आरोपियों ने विभिन्न पाठ्यक्रमों की करीब 43,000 फर्जी डिग्रियां और अंकतालिकाएं जारी की थीं।
इनमें से कई डिग्रियां ऐसे पाठ्यक्रमों की थीं जिनके लिए संबंधित विश्वविद्यालय को मान्यता भी प्राप्त नहीं थी। उदाहरण के तौर पर, कृषि और वेटरनरी से संबंधित करीब 930 डिग्रियां जारी की गईं, जबकि विश्वविद्यालय को इन पाठ्यक्रमों की मान्यता नहीं थी।
अदालत ने इस तथ्य को अत्यंत गंभीर मानते हुए कहा कि इस प्रकार की गतिविधियां शिक्षा व्यवस्था और भर्ती प्रक्रियाओं की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़े करती हैं।
1955 छात्रों को फर्जी डिग्री देने का आरोप
जांच में यह भी सामने आया कि आरोपियों ने कम से कम 1955 छात्रों को पूर्व तिथि में फर्जी डिग्रियां और अंकतालिकाएं उपलब्ध कराईं।
यह डेटा विश्वविद्यालय की वेबसाइट और सॉफ्टवेयर में मौजूद रिकॉर्ड तथा आरोपी के मोबाइल फोन से प्राप्त डिजिटल डेटा के विश्लेषण से सामने आया।
इसके अलावा आरोपियों के बीच हुई ई-मेल और व्हाट्सऐप चैट से भी इस पूरे नेटवर्क के संचालन के संकेत मिले।
अभियोजन का पक्ष
सरकारी पक्ष ने अदालत में तर्क दिया कि यह मामला केवल एक या दो फर्जी डिग्रियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अंतरराज्यीय स्तर पर संचालित संगठित गिरोह का मामला है।
अभियोजन के अनुसार, आरोपियों ने बड़े पैमाने पर छात्रों से मोटी रकम लेकर फर्जी डिग्रियां जारी कीं और कई मामलों में रिकॉर्ड नष्ट करने की भी कोशिश की।
अभियोजन ने यह भी कहा कि यदि आरोपियों को जमानत दी जाती है तो वे साक्ष्यों से छेड़छाड़ कर सकते हैं और जांच को प्रभावित कर सकते हैं।
बचाव पक्ष की दलील
दूसरी ओर बचाव पक्ष ने अदालत में कहा कि अजय भारद्वाज का संबंधित विश्वविद्यालय से कोई आधिकारिक संबंध नहीं था और उसके पास से कोई फर्जी डिग्री या दस्तावेज बरामद नहीं हुए हैं।
बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि कई सह-आरोपियों को पहले ही जमानत मिल चुकी है, इसलिए समानता के आधार पर याचिकाकर्ता को भी राहत दी जानी चाहिए।
हाईकोर्ट की टिप्पणी
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड से यह स्पष्ट होता है कि आरोपियों की भूमिका गंभीर प्रकृति की है और यह मामला व्यापक स्तर पर फर्जी डिग्री जारी करने से जुड़ा है।
अदालत ने कहा कि इस प्रकार की गतिविधियों से योग्य उम्मीदवारों के अवसर छिन जाते हैं और भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता प्रभावित होती है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि आरोपियों की भूमिका अन्य सह-आरोपियों से भिन्न है, इसलिए केवल इस आधार पर कि कुछ अन्य आरोपियों को जमानत मिल चुकी है, याचिकाकर्ता को भी जमानत नहीं दी जा सकती।
जमानत याचिका खारिज
सभी तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने कहा कि इस चरण पर आरोपियों को जमानत का लाभ देना उचित नहीं होगा।
इसलिए हाईकोर्ट ने अजय भारद्वाज और संगीता कड़वासरा उर्फ भूमि की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं।
साथ ही अदालत ने निचली अदालत को निर्देश दिया कि मामले की सुनवाई तेजी से पूरी की जाए और महत्वपूर्ण गवाहों के बयान प्राथमिकता के आधार पर दर्ज किए जाएं।