कोर्ट ने कहा कि “कॉरपोरेट वील” हटाना एक असाधारण उपाय है, जिसे केवल विशेष परिस्थितियों में ही लागू किया जा सकता है।
जयपुर, 19 मार्च। राजधानी जयपुर के सांगानेर स्थित 848 फैक्ट्री मालिकों को राजस्थान हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने जयपुर कॉमर्शियल कोर्ट के 14 फरवरी 2025 के उस फैसले को रद्द कर दिया है, जिसमें सांगानेर स्थित इन 848 टेक्सटाइल फैक्ट्रियों को सीज कर उनकी कुर्की के आदेश दिए गए थे।
हाईकोर्ट ने कॉमर्शियल कोर्ट के 14 फरवरी 2025 के आदेश और उसके तहत होने वाली अंतर्गत प्रवर्तन कार्यवाही को रद्द करते हुए पुन: नए सिरे से सुनवाई के लिए कॉमर्शियल कोर्ट को भेजने के आदेश दिए हैं.
हाईकोर्ट ने कॉमर्शिलय कोर्ट को आदेश दिये हैं कि वह सभी पक्षकारों को अवसर देते हुए और निष्पादन तक सीमित रहते हुए पुन: फैसला करेगा.
दिए थे कठोर आदेश
कॉमर्शियल कोर्ट ने इस आदेश में न केवल कंपनी के निदेशकों और सदस्यों बल्कि राज्य सरकार तक को वित्तीय रूप से जिम्मेदार ठहराते हुए कठोर निर्देश जारी किए थे।
यह आदेश सांगानेर में इन फैक्ट्रियों से निकलने वाले प्रदूषित अपशिष्ट के निष्पादन के लिए सीईटीपी प्लांट बनाने वाली कंपनी की ओर से दायर एक्जीक्यूशन पिटीशन पर दिया गया था।
कॉमर्शियल कोर्ट ने इस मामले में राजस्थान सरकार को आदेश दिया था कि वह “पॉल्यूटर पेज़” के नियम के अनुसार कंपनी को जारी अवार्ड की राशि का भुगतान करे और बाद में इस राशि की वसूली फैक्ट्री संचालकों से करे।
तीन माह में कंपनी को अवार्ड राशि का भुगतान नहीं होने पर कोर्ट ने आदेश दिए थे कि सभी फैक्ट्री मालिकों की चल-अचल संपत्ति को अटैच कर सीज करने के साथ ही उनकी कुर्की कर वसूली की जाए।
इसके लिए कोर्ट के अधिकृत अधिकारी की मौजूदगी में चल-अचल संपत्तियों की खुली नीलामी कर वसूली करने के आदेश दिए गए थे।
हाईकोर्ट ने क्या कहा
राज्य सरकार सहित फैक्ट्री संचालकों की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस समीर जैन की एकलपीठ ने स्पष्ट किया कि निष्पादन (Execution) कार्यवाही के दौरान अदालत अपनी सीमाओं से बाहर जाकर नए दायित्व तय नहीं कर सकती।
एकलपीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट और सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि निष्पादन अदालत डिक्री से आगे नहीं जा सकती।
वह नए दायित्व तय नहीं कर सकती और न ही तीसरे पक्षों को बिना आधार के जिम्मेदार ठहरा सकती है।
कोर्ट ने कहा कि “कॉरपोरेट वील” हटाना एक असाधारण उपाय है, जिसे केवल विशेष परिस्थितियों में ही लागू किया जा सकता है।
“पॉल्यूटर पेज़” या “पे एंड रिकवर” जैसे सिद्धांतों का प्रयोग भी सीमित दायरे में ही किया जा सकता है।
अदालत ने यह भी कहा कि निष्पादन कार्यवाही का उद्देश्य केवल अवार्ड की वसूली है, न कि नए अधिकारों और दायित्वों का निर्धारण।
क्या था मामला
सांगानेर में सांगानेर कपड़ा रंगाई-छपाई एसोसिएशन ने कपड़ा फैक्ट्रियों से निकलने वाले अपशिष्ट के शोधन के लिए सभी फैक्ट्रियों के लिए संयुक्त रूप से सामान्य अपशिष्ट उपचार संयंत्र (सीईटीपी) के निर्माण के लिए टेंडर जारी किया।
इसके लिए 12.3 एमएलडी के ट्रीटमेंट प्लांट का टेंडर 22 मई 2015 को गुजरात के गांधीनगर स्थित मैसर्स एडवेंट एनविरोकेयर टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी को मिला था।
24 जुलाई 2015 को एसकेआरसीए और एडवेंट एनविरोकेयर टेक्नोलॉजी के बीच ट्रीटमेंट प्लांट के लिए समझौता हुआ।
समझौते के बाद इस प्लांट के लिए केंद्र और राज्य सरकार से फंड हासिल करने के लिए एसपीवी (SPV) का गठन किया जाना जरूरी था।
विशेष प्रयोजन वाहन (SPV) के लिए सांगानेर कपड़ा रंगाई-छपाई एसोसिएशन ने सांगानेर एनवायरो परियोजना विकास कंपनी का गठन किया।
इस कंपनी का गठन एसकेआरसीए और सांगानेर प्रदूषण निवारण समिति के सदस्यों द्वारा किया गया था।
इसमें करीब 848 फैक्ट्री संचालक शामिल थे। ट्रीटमेंट प्लांट के लिए भूमि का आवंटन जेडीए की ओर से समिति के नाम पर किया गया था। इस समिति में टेक्सटाइल फैक्ट्री संचालकों के साथ ही जयपुर जिला कलेक्टर भी शामिल थे।
समझौते के अनुसार मैसर्स एडवेंट एनविरोकेयर टेक्नोलॉजी कंपनी ने समय पर ट्रीटमेंट प्लांट तैयार कर लिया, लेकिन प्लांट पर हुए खर्च का कंपनी को भुगतान नहीं किया गया।
भुगतान नहीं होने पर 12 अगस्त 2019 को प्लांट निर्माता कंपनी ने बकाया 33 करोड़ रुपये की रिकवरी के लिए गांधीनगर की कोर्ट में क्लेम दायर किया।
12 अक्टूबर 2021 को गांधीनगर के प्रिंसिपल जज की अदालत ने एडवेंट कंपनी के पक्ष में फैसला देते हुए मूल राशि 33 करोड़ रुपये के साथ ब्याज देने के आदेश दिए।
सांगानेर के फैक्ट्री संचालकों ने इस अवार्ड आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में भी याचिका दायर की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने भी उनकी याचिकाएं खारिज करते हुए अवार्ड को उचित ठहराया।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद एक्जीक्यूशन के लिए कंपनी ने जयपुर कॉमर्शियल कोर्ट में पिटीशन दायर की, जिस पर तत्कालीन जज दिनेश कुमार गुप्ता ने फैसला सुनाते हुए सांगानेर की 848 फैक्ट्रियों को सीज कर कुर्की करने का आदेश दिया था।
याचिकाकर्ता का पक्ष
राज्य सरकार सहित अन्य याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में दलील दी कि निष्पादन अदालत ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर आदेश पारित किया।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि निष्पादन अदालत केवल डिक्री/अवार्ड को लागू कर सकती है, नए दायित्व नहीं जोड़ सकती।
जिन व्यक्तियों या संस्थाओं को मूल अवार्ड में पक्षकार नहीं बनाया गया, उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
अवार्ड होल्डर (प्रतिवादी) ने न तो राज्य सरकार, न ही समिति या एसोसिएशन को मूल कार्यवाही में पक्षकार बनाया था। निदेशकों को भी न तो MSME काउंसिल के समक्ष और न ही निष्पादन कार्यवाही में पक्षकार बनाया गया। निष्पादन याचिका में कहीं भी धोखाधड़ी या अनुचित आचरण का आरोप नहीं लगाया गया।
ऐसी स्थिति में निष्पादन अदालत द्वारा कॉरपोरेट वील हटाना और सभी निदेशकों, सदस्यों व अन्य पक्षों पर दायित्व डालना पूरी तरह अनुचित और कानून के विरुद्ध है।
“कॉरपोरेट वील” हटाकर निदेशकों और सदस्यों को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराना कानून के खिलाफ है। राज्य सरकार को “पे एंड रिकवर” सिद्धांत के तहत जिम्मेदार ठहराना पूरी तरह अवैध है।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि निष्पादन अदालत ने बिना नोटिस दिए तीसरे पक्षों पर कार्रवाई की, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
एडवेंट एनविरोकेयर का पक्ष
प्रतिवादी कंपनी (एडवेंट एनविरोकेयर) ने तर्क दिया कि उसे वैध रूप से MSME काउंसिल से अवार्ड मिला है और उसका भुगतान होना चाहिए।
प्रतिवादी का कहना था कि परियोजना में कई हितधारक शामिल थे, इसलिए सभी की जिम्मेदारी बनती है और “पॉल्यूटर पेज़” सिद्धांत के तहत उद्योगों और संबंधित संस्थाओं को भुगतान करना चाहिए।
यदि SPV भुगतान करने में असमर्थ है, तो अन्य संबंधित पक्षों को जिम्मेदार ठहराना उचित है।
कॉमर्शियल कोर्ट का आदेश
जयपुर कॉमर्शियल कोर्ट ने अपने फैसले में कई कठोर निर्देश दिए थे, जिनमें कंपनी के निदेशकों और सदस्यों को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराना शामिल था।
सांगानेर की 848 टेक्सटाइल यूनिट्स की संपत्तियों को अटैच और नीलाम करने के आदेश देना और कलेक्टर, जयपुर तक को जिम्मेदार मानते हुए कलेक्टर के वेतन पर रोक लगाने का आदेश दिया था।
कोर्ट का निष्कर्ष
राजस्थान हाईकोर्ट की एकलपीठ ने इस मामले में लंबी सुनवाई के बाद 22 जनवरी 2026 को फैसला सुरक्षित रखा था।
एकलपीठ ने अपने फैसले में माना कि निचली अदालत ने अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण किया और ऐसे आदेश पारित किए जो कानून के अनुरूप नहीं थे।
अदालत ने स्पष्ट किया कि निष्पादन कार्यवाही सीमित दायरे में ही रहनी चाहिए।