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“Dominus Litis” सिद्धांत पर राजस्थान हाईकोर्ट की एक ही एकलपीठ के दो महत्वपूर्ण फैसले: वादी के अधिकार और अदालत की शक्ति के बीच संतुलन की नई व्याख्या

Rajasthan High Court Clarifies “Dominus Litis” Principle in Two Key CPC Judgments

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर मुख्यपीठ के जस्टिस संजीव पुरोहित की एकलपीठ द्वारा पिछले एक माह में दिए गए दो महत्वपूर्ण फैसलों ने CPC के एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत—“Dominus Litis” (वादी ही मुकदमे का मालिक)—को नए दृष्टिकोण से स्पष्ट किया है।

एकलपीठ ने दो अलग अलग फैसलों में Order 1 Rule 10 CPC के संदर्भ में यह बताया कि वादी की भूमिका और अदालत की न्यायिक विवेकाधीन शक्ति के बीच संतुलन कैसे बनाया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट के इन दोनों फैसलों का विस्तृत अध्ययन कहता हैं कि “Dominus Litis” सिद्धांत न तो वादी को असीमित अधिकार देता है और न ही तीसरे पक्ष को स्वतः मुकदमे में शामिल होने का अधिकार प्रदान करता है। बल्कि यह सिद्धांत अदालत की विवेकाधीन शक्ति और न्यायपूर्ण फैसले की आवश्यकता के साथ संतुलित रूप से कार्य करता है।

Dominus Litis सिद्धांत का मूल अर्थ

कानून में “Dominus Litis” का अर्थ है कि वादी मुकदमे का स्वामी होता है—वह यह तय करता है कि मुकदमा किसके खिलाफ दायर किया जाए, कौन-कौन पक्षकार बनाए जाएं और कौन-सी राहत मांगी जाए। परंतु यह अधिकार पूर्णत: निरंकुश नहीं है।

Order 1 Rule 10 CPC अदालत को यह शक्ति देता है कि यदि किसी व्यक्ति की उपस्थिति मुकदमे के प्रभावी और पूर्ण निस्तारण के लिए आवश्यक है, तो अदालत उसे पक्षकार बना सकती है या यदि उसकी आवश्यकता नहीं है तो उसे शामिल करने से इंकार कर सकती है।

पहला फैसला (Arvind Kumar केस): Dominus Litis का सीमित अधिकार

इस केस में वादी स्वयं किसी तीसरे व्यक्ति (दूसरे सूट के वादी) को अपने मुकदमे में पक्षकार बनाना चाहता था।

जस्टिस संजीत पुरोहित की एकलपीठ ने इस मामले में कहा कि:

वादी “डोमिनस लिटिस” है, पर इसका अर्थ यह नहीं कि वह अपनी इच्छा से किसी भी व्यक्ति को पार्टी बना सकता है।

एकलपीठ ने कहा कि Order 1 Rule 10 CPC के तहत अदालत यह देखेगी कि प्रस्तावित व्यक्ति— आवश्यक पक्षकार (Necessary Party) है या नहीं, या उचित पक्षकार (Proper Party) है या नहीं।

कोर्ट ने कहा कि केवल यह कारण कि उसी संपत्ति पर दूसरा मुकदमा चल रहा है, किसी व्यक्ति को आवश्यक पक्षकार नहीं बना देता। इसलिए वादी की impleadment अर्जी खारिज कर दी गई।

इस फैसले में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि Dominus Litis सिद्धांत वादी को “असीमित अधिकार” नहीं देता; अदालत की न्यायिक विवेकाधीन शक्ति सर्वोपरि है।

दूसरा फैसला (Kumari Rekha केस): Dominus Litis के आधार पर तीसरे पक्ष को शामिल करने से इनकार

इस मामले में तीसरे व्यक्ति स्वयं मुकदमे में पक्षकार बनना चाहते थे, जबकि वादी ने उनके खिलाफ कोई राहत नहीं मांगी थी।

जस्टिस संजीत पुरोहित की एकलपीठ ने अपने फैसले में कहा कि:

वादी मुकदमे का मालिक है और जिसके खिलाफ राहत नहीं मांगी गई, उसे वादी की इच्छा के विरुद्ध मुकदमे में शामिल नहीं किया जा सकता, जब तक वह “necessary party” सिद्ध न हो।

कोर्ट ने कहा कि जो व्यक्ति स्वतंत्र अधिकार का दावा करता है, वह अलग मुकदमा दायर कर सकता है; वर्तमान मुकदमे में शामिल होने का अधिकार नहीं। इसलिए impleadment की अर्जी खारिज कर दी गई।

इस फैसले में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि वादी को उस व्यक्ति को मुकदमे में जोड़ने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता जिसके खिलाफ वह राहत नहीं चाहता।

दोनों फैसलों के बीच मुख्य कानूनी भिन्नता

आधार पहला फैसला (Arvind Kumar) दूसरा फैसला (Kumari Rekha)

विवाद वादी किसी व्यक्ति को जोड़ना चाहता था तीसरा पक्ष स्वयं जुड़ना चाहता था


कोर्ट का सिद्धांत वादी को मनमाने impleadment का अधिकार नहीं वादी को अनचाहे impleadment के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता

Dominus Litis का अर्थ Dominus Litis = unlimited right नहीं Dominus Litis = plaintiff decides whom to sue

अदालत की भूमिका न्यायालय की विवेकाधीन शक्ति सर्वोपरि वादी की autonomy संरक्षित

सरल शब्दों में अंतर

पहला निर्णय: Dominus Litis “तलवार” नहीं है – वादी किसी को भी अपनी इच्छा से जोड़ नहीं सकता।

दूसरा निर्णय: Dominus Litis “ढाल” है – वादी को उसकी इच्छा के विरुद्ध किसी को जोड़ने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

यानी एक निर्णय में सिद्धांत को सीमित अधिकार (limitation) के रूप में और दूसरे में वादी की स्वायत्तता (autonomy protection) के रूप में लागू किया गया।

कानूनी महत्व

दोनों फैसले मिलकर यह स्पष्ट करते हैं कि: Dominus Litis का सिद्धांत दो-तरफा संतुलन है। न तो वादी की इच्छा सर्वोपरि है, और न ही तीसरे पक्ष का दावा स्वतः impleadment का अधिकार देता है।

यानी अंतिम निर्णय हमेशा Order 1 Rule 10 CPC के तहत necessary / proper party test पर निर्भर करेगा।

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