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वादी ही मुकदमे का “डोमिनस लिटिस” यानी मालिक, लेकिन वादी भी किसी को भी मनमर्जी से मुकदमे में पक्षकार नहीं बना सकता

Rajasthan High Court Judgment: Plaintiff Cannot Add Parties Arbitrarily Despite Being Dominus Litis

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने भूमि विवाद से जुड़े एक ओर महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि भले ही वादी को मुकदमे का “डोमिनस लिटिस” यानी मालिक माना जाता है, लेकिन उसे भी यह पूर्ण अधिकार नहीं है कि वह किसी भी व्यक्ति को अपनी इच्छा से मुकदमे में पक्षकार बना दे।

हाईकोर्ट ने कहा कि कहा कि केवल वही व्यक्ति मुकदमे में शामिल किया जा सकता है जो विवाद के समाधान के लिए आवश्यक या उचित पक्षकार हो।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने चित्तौड़गढ़ के एक भूमि विवाद से संबंधित याचिका को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के आदेश को सही ठहराया।

जस्टिस संजीत पुरोहित ने यह रिपोर्टेबल जजमेंट चित्तौड़गढ़ निवासी अरविंद कुमार की ओर से दायर याचिका को खारिज करते हुए दिया है।.

ये हैं मामला

चित्तौड़गढ़ निवासी अरविंद कुमार ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें अदालत ने एक अन्य व्यक्ति, दिनेश शर्मा, को मुकदमे में पक्षकार बनाने से इनकार कर दिया था।

याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि संबंधित भूमि के संबंध में उनके पक्ष में कई बिक्री समझौते हुए थे और प्रतिवादियों ने बाद में अन्य व्यक्तियों के पक्ष में बिक्री विलेख कर दिए, इसलिए उन्होंने बिक्री विलेख निरस्त करने और समझौते के क्रियान्वयन की मांग की।

याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि उसी भूमि को लेकर दिनेश शर्मा ने भी एक अलग मुकदमा दायर कर रखा है, इसलिए उसे भी वर्तमान मुकदमे में पक्षकार बनाया जाना चाहिए ताकि विरोधाभासी निर्णयों से बचा जा सके।

ट्रायल कोर्ट का फैसला

ट्रायल कोर्ट ने याचिकाकर्ता की इस मांग को अस्वीकार करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता ने अपने मूल वाद में दिनेश शर्मा के खिलाफ कोई राहत नहीं मांगी है और न ही उनके साथ हुए किसी कथित समझौते का उल्लेख किया है। इसलिए वह इस मुकदमे में आवश्यक या उचित पक्षकार नहीं हैं।

याचिकाकर्ता अ​रविंद कुमार ने ट्रायल कोर्ट के इस आदेश को चुनौती देते हुए राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर की हैं.

हाईकोर्ट की फैसला

दोनो पक्षों की बहस सुनने के बाद जस्टिस संजीत पुरोहित की एकलपीठ ने कहा कि “डोमिनस लिटिस” का सिद्धांत यह जरूर बताता है कि वादी मुकदमे का मालिक होता है और वह तय कर सकता है कि किन व्यक्तियों के खिलाफ मुकदमा चलाना है, लेकिन यह सिद्धांत वादी को किसी भी व्यक्ति को मनमर्जी से पक्षकार बनाने का असीमित अधिकार नहीं देता।

हाईकोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को तभी पक्षकार बनाया जा सकता है जब उसकी उपस्थिति मुकदमे के प्रभावी और पूर्ण निस्तारण के लिए आवश्यक हो। यदि बिना उस व्यक्ति के भी विवाद का निपटारा किया जा सकता है, तो उसे पक्षकार बनाना जरूरी नहीं है।

“डोमिनस लिटिस ढाल है, तलवार नहीं”

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि डोमिनस लिटिस का सिद्धांत वादी को यह सुरक्षा देता है कि उसे किसी ऐसे व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता जिसके खिलाफ वह राहत नहीं चाहता।

लेकिन यह सिद्धांत यह गारंटी नहीं देता कि वादी द्वारा किया गया हर पक्षकार जोड़ने का आवेदन स्वीकार ही किया जाएगा।

हाईकोर्ट ने कहा कि यह सिद्धांत एक “ढाल” की तरह है, जिससे वादी को अनावश्यक पक्षकार जोड़ने के लिए मजबूर होने से बचाया जाता है, न कि एक “तलवार” जिससे वह अपनी इच्छा से किसी को भी मुकदमे में शामिल कर सके।

दोनों मुकदमों की सुनवाई

राजस्थान हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि यदि संबंधित भूमि को लेकर अलग-अलग मुकदमे लंबित हैं, तो अदालत उन्हें एक साथ सुन सकती है ताकि विरोधाभासी फैसलों की संभावना न रहे।

लेकिन केवल इस आधार पर कि दूसरा मुकदमा भी उसी संपत्ति से संबंधित है, उस मुकदमे के वादी को दूसरे मुकदमे में पक्षकार बनाना आवश्यक नहीं हो जाता।

देरी से दाखिल आवेदन पर भी सवाल

हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि जिस व्यक्ति को पक्षकार बनाने की मांग की गई, उसके संबंध में जानकारी लंबे समय से याचिकाकर्ता को थी, फिर भी आवेदन कई वर्षों बाद दायर किया गया।

हाईकोर्ट ने इसे मुकदमे की कार्यवाही में देरी करने की कोशिश बताया और कहा कि इस प्रकार का आवेदन न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जा सकता है।

अनुच्छेद 227 के तहत हस्तक्षेप सीमित

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट का अधिकार क्षेत्र सीमित है और केवल तभी हस्तक्षेप किया जा सकता है जब निचली अदालत का आदेश स्पष्ट रूप से गलत, मनमाना या अधिकार क्षेत्र से बाहर हो।

हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में ऐसा कोई आधार नहीं पाया गया, इसलिए ट्रायल कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार किया गया।

अंतिम आदेश—याचिका खारिज

तमाम दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा दिनेश शर्मा को पक्षकार बनाने से इनकार करने के ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए याचिकाकर्ता की याचिका खारिज कर दी.

हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट का आदेश न्यायसंगत और विधिसम्मत है तथा उसमें कोई त्रुटि नहीं है।

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