पिता ने अपने बेटे की वायरल तस्वीरों के खिलाफ हाईकोर्ट में दायर की याचिका, इंस्टाग्राम को अश्लील कंटेंट तुरंत हटाने व आरोपी अकाउंट स्थायी रूप से बंद करने के आदेश
जोधपुर, 24 मार्च 2026। डिजिटल युग में बढ़ते साइबर दुरुपयोग और बिना अनुमति के लोगों की आपत्तिजनक तस्वीरें-वीडियो अपलोड करने को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट ने रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए ऐतिहासिक फैसला देते हुए इसे निजता के अधिकार का घोर उल्लंघन बताया है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक फैसले में साफ कर दिया है कि सोशल मीडिया पर स्वतंत्रता का मतलब अराजकता नहीं है। किसी की निजी जिंदगी में दखल देने या उसकी छवि खराब करने की अनुमति किसी को नहीं दी जा सकती।
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट शब्दों में कहा है कि किसी भी व्यक्ति की निजी और आपत्तिजनक तस्वीरों या वीडियो का बिना सहमति सोशल मीडिया पर प्रसार करना न केवल गैरकानूनी है, बल्कि यह संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार—निजता के अधिकार—का घोर उल्लंघन है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम (Meta) को आदेश दिया है कि वह याचिकाकर्ता से जुड़े ऐसे सभी आपत्तिजनक कंटेंट को तुरंत हटाए और दोषी अकाउंट को तत्काल स्थायी रूप से बंद किया जाए।
जस्टिस फरजंद अली की एकल पीठ ने यह फैसला मोहन राम की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला जोधपुर निवासी मोहन राम द्वारा दायर एक आपराधिक रिट याचिका से जुड़ा है।
याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि उनके पुत्र की निजी और अश्लील तस्वीरें सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर वायरल की जा रही हैं।
याचिकाकर्ता के अनुसार, इस कृत्य का उद्देश्य उनके परिवार की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाना था।
उन्होंने इस मामले में स्थानीय पुलिस थाने में शिकायत भी दर्ज करवाई, लेकिन समय पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और अपने पुत्र की निजता की रक्षा के लिए तत्काल हस्तक्षेप की मांग की।
‘निजता एक मौलिक अधिकार’
इस मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस फरजंद अली ने बेहद कड़े शब्दों में कहा कि किसी व्यक्ति की निजी जिंदगी में इस तरह का हस्तक्षेप अस्वीकार्य है।
कोर्ट ने कहा कि निजता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित है, जो प्रत्येक व्यक्ति को गरिमा के साथ जीने का अधिकार देता है।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ फैसले का हवाला देते हुए कहा कि “निजता व्यक्ति के जीवन और स्वतंत्रता का अभिन्न हिस्सा है और इसमें किसी भी प्रकार का अनधिकृत हस्तक्षेप असंवैधानिक है।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी की निजी तस्वीरों या वीडियो का बिना अनुमति प्रसार करना सीधे-सीधे उसकी गरिमा, आत्मसम्मान और मानसिक स्वास्थ्य पर आघात है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को चेतावनी
हाईकोर्ट ने इस मामले में सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी भी स्पष्ट की।
अदालत ने कहा कि इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म केवल ‘माध्यम’ बनकर नहीं रह सकते, बल्कि उन्हें सक्रिय रूप से ऐसे कंटेंट को रोकने और हटाने की जिम्मेदारी निभानी होगी।
कोर्ट ने सूचना प्रौद्योगिकी (IT) नियम, 2021 का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी इंटरमीडियरी (जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म) पर यह कानूनी दायित्व है कि वह आपत्तिजनक, अश्लील और निजी जानकारी के दुरुपयोग को रोकने के लिए तत्काल कार्रवाई करे।
अदालत ने साफ कहा कि यदि प्लेटफॉर्म को ऐसे कंटेंट की जानकारी होने के बाद भी वह कार्रवाई नहीं करता, तो उसे कानून के तहत मिलने वाली ‘सेफ हार्बर’ सुरक्षा का लाभ नहीं मिलेगा।
‘राइट टू बी फॉरगॉटन’
इस फैसले में हाईकोर्ट ने ‘राइट टू बी फॉरगॉटन’ यानी “भूल जाने का अधिकार” को भी महत्वपूर्ण बताया।
कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को यह अधिकार है कि उसकी निजी जानकारी, जो उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाती है, उसे डिजिटल प्लेटफॉर्म से हटाया जाए।
हाईकोर्ट ने माना कि इंटरनेट पर एक बार डाली गई सामग्री लंबे समय तक बनी रहती है और बार-बार सामने आती है, जिससे पीड़ित को लगातार मानसिक और सामाजिक नुकसान होता है। ऐसे में इस अधिकार का संरक्षण बेहद जरूरी है।
डिजिटल दुनिया के ‘स्थायी दाग’ पर कोर्ट की चिंता
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में डिजिटल युग की एक बड़ी समस्या—“डिजिटल स्कार” (Digital Scar) पर भी गहरी चिंता व्यक्त की।
कोर्ट ने कहा कि एक बार जब किसी की निजी सामग्री इंटरनेट पर प्रसारित हो जाती है, तो उसे पूरी तरह हटाना लगभग असंभव हो जाता है। यह पीड़ित के जीवन पर एक स्थायी दाग छोड़ देता है, जो समय-समय पर उसे मानसिक पीड़ा देता रहता है।
अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में पीड़ित को न केवल मानसिक तनाव झेलना पड़ता है, बल्कि सामाजिक अपमान, रिश्तों में दरार और करियर पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
महिलाओं पर ज्यादा असर, लेकिन हर कोई पीड़ित हो सकता है
कोर्ट ने यह भी माना कि इस तरह के मामलों का असर अक्सर महिलाओं पर अधिक गंभीर होता है, क्योंकि समाज में उनके प्रति दृष्टिकोण अधिक कठोर होता है।
हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह समस्या किसी एक लिंग तक सीमित नहीं है और पुरुष भी ऐसे अपराधों के शिकार हो सकते हैं।
इसलिए, कानून का उद्देश्य हर व्यक्ति की गरिमा और निजता की रक्षा करना होना चाहिए।
डिजिटल सबूत सुरक्षित रखने का आदेश
हाईकोर्ट ने इस मामले में महत्वपूर्ण आदेश देते हुए कहा कि आपत्तिजनक कंटेंट को हटाने के साथ-साथ उससे जुड़े डिजिटल सबूतों को सुरक्षित रखना भी जरूरी है।
कोर्ट ने कहा कि IP एड्रेस, लॉग डेटा, अकाउंट डिटेल्स जैसे इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य जांच और ट्रायल के लिए बेहद अहम होते हैं। यदि इन्हें समय पर सुरक्षित नहीं रखा गया, तो न्याय प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
इसलिए, सोशल मीडिया कंपनियों को कंटेंट हटाने के साथ-साथ डेटा संरक्षित रखने की भी जिम्मेदारी निभानी होगी।
हाईकोर्ट का आदेश
राजस्थान हाईकोर्ट ने इस फैसले में कई आदेश दिए हैं।
हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि केंद्र सरकार तुरंत इस मामले में हस्तक्षेप कर इंस्टाग्राम के साथ समन्वय स्थापित करे और सभी आपत्तिजनक फोटो और वीडियो को तुरंत हटाया जाए।
हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि यदि जांच में संबंधित इंस्टाग्राम अकाउंट (@suresh_bishnoi_688) दोषी पाया जाता है, तो उसे स्थायी रूप से बंद किया जाए।
याचिकाकर्ता को आदेश के अनुपालन में किसी भी कमी की स्थिति में दोबारा कोर्ट आने की स्वतंत्रता दी गई है।