हाईकोर्ट ने कहा वेतन और सेवा लाभ रोकना कर्मचारी के सम्मानपूर्वक जीवन जीने के मौलिक अधिकार का हनन
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक बेहद संवेदनशील और झकझोर देने वाले मामले में राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर सख्त टिप्पणी करते हुए बड़ा और अहम फैसला सुनाया है।
ड्यूटी के दौरान हादसे में गंभीर रूप से घायल होकर पिछले 4 साल से कोमा में रहे पुलिस कांस्टेबल को वेतन और सेवा लाभ से वंचित रखने पर हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए तत्काल चार साल का वेतन जारी करने तथा विशेष विकलांगता अवकाश देने के आदेश दिए हैं।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि किसी कर्मचारी को, जो ड्यूटी निभाते हुए जीवनभर के लिए दिव्यांग हो गया हो, उसे वर्षों तक वेतन से वंचित रखना न केवल अमानवीय है, बल्कि यह उसके “सम्मानपूर्वक जीवन जीने के मौलिक अधिकार” का भी सीधा उल्लंघन है।
मौलिक अधिकार का हनन
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में पूर्व के फैसलों का भी हवाला दिया, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि सेवा के दौरान विकलांग हुए कर्मचारी को नौकरी से हटाया नहीं जा सकता और यदि वह अपने पद पर कार्य करने में सक्षम नहीं है, तो उसे समान वेतन के साथ अन्य पद पर समायोजित किया जाना चाहिए या सुपरन्यूमरेरी पोस्ट पर रखा जाना चाहिए।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 का उद्देश्य ऐसे कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा करना है, जो सेवा के दौरान दुर्घटना या बीमारी के कारण विकलांग हो जाते हैं।
कोर्ट ने कहा
ऐसे मामलों में राज्य का कर्तव्य है कि वह संवेदनशीलता दिखाए और कर्मचारी को सभी वैधानिक लाभ प्रदान करे।
हाईकोर्ट ने कहा कि पिछले कई वर्षों से वेतन और सेवा लाभ नहीं देना न केवल कानून के प्रावधानों का उल्लंघन है, बल्कि यह कर्मचारी के सम्मानपूर्वक जीवन जीने के मौलिक अधिकार का भी हनन है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित है।
हाईकोर्ट ने दी बड़ी राहत
जस्टिस आनंद शर्मा की एकलपीठ ने मामले में कांस्टेबल की पत्नी शारदा कंवर की ओर से दायर याचिका को स्वीकार करते हुए राज्य सरकार को आदेश दिया कि कांस्टेबल को विशेष विकलांगता अवकाश प्रदान करे।
साथ ही, कांस्टेबल के अगस्त 2021 से अब तक का बकाया 4 साल का वेतन 30 दिनों के भीतर जारी करने का आदेश दिया है।
साथ ही, आगे भी नियमित रूप से वेतन का भुगतान सुनिश्चित करने के आदेश दिए हैं।
जयपुर पुलिस का मामला
यह मामला जयपुर पुलिस में कार्यरत रहे कांस्टेबल नरेंद्र सिंह सिसोदिया से जुड़ा है, जो 22 अगस्त 2021 को ड्यूटी के दौरान मोटरसाइकिल का टायर फटने से हुए हादसे में गंभीर रूप से घायल हो गए थे।
इस दुर्घटना के बाद वे कोमा में चले गए और आज तक होश में नहीं आ सके हैं।
मेडिकल विशेषज्ञों ने उनकी 85 प्रतिशत स्थायी दिव्यांगता प्रमाणित की है।
लेकिन हैरानी की बात यह रही कि इतने गंभीर हालात के बावजूद विभाग ने न तो उन्हें विशेष विकलांगता अवकाश दिया और न ही उनका वेतन जारी किया।
चार साल तक वेतन बंद रहने से परिवार को भारी आर्थिक और मानसिक संकट का सामना करना पड़ा।
इसी अन्याय के खिलाफ कांस्टेबल की पत्नी शारदा कंवर ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
याचिका में दलीलें
याचिका में अधिवक्ता लक्ष्मीकांत शर्मा मालपुरा ने अदालत को बताया कि दुर्घटना के समय कांस्टेबल पूरी तरह ड्यूटी पर थे, जिसकी पुष्टि संबंधित थाना अधिकारी और पुलिस उपायुक्त, जयपुर पूर्व की रिपोर्ट से भी होती है। इसके बावजूद विभाग ने तकनीकी आधारों पर लाभ देने से इनकार कर दिया।
याचिकाकर्ता की ओर से राजस्थान सेवा नियम, 1951 के नियम 99 का हवाला देते हुए कहा गया कि यदि कोई सरकारी कर्मचारी ड्यूटी के दौरान दुर्घटना का शिकार होकर दिव्यांग हो जाता है, तो उसे विशेष विकलांगता अवकाश और सभी सेवा लाभों का अधिकार है।
साथ ही, दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की धारा 20(4) के तहत भी ऐसे कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा की गई है।
सरकार का दावा खारिज
याचिका का विरोध करते हुए राज्य सरकार ने अदालत में दलील दी कि घटना के संबंध में कोई एफआईआर दर्ज नहीं हुई, इसलिए यह साबित नहीं होता कि हादसा ड्यूटी के दौरान हुआ था।
सरकार ने कहा कि इसी आधार पर विशेष अवकाश देने का विरोध किया गया।
हालांकि, हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया।
हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में मौजूद दस्तावेज और पुलिस अधिकारियों की रिपोर्ट स्पष्ट रूप से यह साबित करती हैं कि दुर्घटना के समय कर्मचारी ड्यूटी पर था।
कोर्ट ने कहा
केवल एफआईआर दर्ज न होने या रोज़नामचा में कथित विसंगतियों के आधार पर कर्मचारी को उसके वैध अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि
ऐसे मामलों में राज्य का दायित्व है कि वह संवेदनशीलता दिखाए और कर्मचारी को उसके सभी वैधानिक लाभ उपलब्ध कराए।
हाईकोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि पिछले कई वर्षों से वेतन और सेवा लाभ नहीं देना न केवल कानून के प्रावधानों का उल्लंघन है, बल्कि यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त “गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार” का भी हनन है।
अंततः अदालत ने शारदा कंवर की याचिका स्वीकार करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया कि कांस्टेबल को विशेष विकलांगता अवकाश दिया जाए और अगस्त 2021 से अब तक का पूरा बकाया वेतन 30 दिनों के भीतर जारी किया जाए।
साथ ही, भविष्य में नियमित रूप से वेतन और अन्य सेवा लाभों का भुगतान सुनिश्चित किया जाए।