जोधपुर। राजस्थान में महिलाओं से जुड़े मामलों की सुनवाई और संरक्षण के लिए गठित राज्य महिला आयोग पिछले एक वर्ष से लगभग निष्क्रिय स्थिति में है।
आयोग में अध्यक्ष और सदस्यों के पद लंबे समय से रिक्त पड़े होने के मामले को गंभीरता से लेते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
जस्टिस फरजंद अली और जस्टिस चन्द्रशेखर शर्मा की खंडपीठ ने उत्थान संस्थान की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया हैं.
मामले की सुनवाई न्यायाधीश फ़रजंद अली और न्यायाधीश चंद्रशेखर शर्मा की खंडपीठ ने की।
प्रारंभिक सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह तीन सप्ताह के भीतर स्पष्ट करे कि महिला आयोग में रिक्त पदों को भरने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं और नियुक्तियां कब तक की जाएंगी।
जनहित याचिका में उठाए गए गंभीर सवाल
इस मामले में याचिकाकर्ता उत्थान संस्थान के अध्यक्ष सरवर खान की ओर से अधिवक्ता हिमांशु चौधरी ने अदालत के समक्ष विस्तृत तर्क प्रस्तुत किए।
उन्होंने बताया कि राजस्थान राज्य महिला आयोग अधिनियम, 1999 के तहत आयोग का गठन किया गया है, जिसमें एक अध्यक्ष, एक सदस्य सचिव और अधिकतम चार सदस्य होने चाहिए।
यह व्यवस्था महिलाओं से जुड़े मामलों के त्वरित निस्तारण और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए बनाई गई थी।
हालांकि, वास्तविक स्थिति इससे बिल्कुल विपरीत है।
अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि वर्ष 2025 में आयोग के अध्यक्ष का कार्यकाल समाप्त हो गया था, लेकिन तब से अब तक नए अध्यक्ष की नियुक्ति नहीं की गई है।
इसके अलावा, वर्ष 2025 में ही तीन सदस्यों का कार्यकाल भी समाप्त हो गया, जिसके बाद से ये सभी पद खाली पड़े हैं।

लंबित मामलों का अंबार, पीड़ित महिलाएं परेशान
याचिका में यह भी बताया गया कि आयोग में वर्तमान में 3122 से अधिक मामले लंबित हैं।
आयोग में अध्यक्ष और सदस्यों की अनुपस्थिति के कारण इन मामलों की सुनवाई प्रभावित हो रही है। महिला उत्पीड़न, घरेलू हिंसा, दहेज प्रताड़ना और अन्य गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों में पीड़ित महिलाओं को समय पर न्याय नहीं मिल पा रहा है।
महिला आयोग जैसी संस्था का निष्क्रिय होना सीधे तौर पर महिलाओं के अधिकारों पर असर डालता है। आयोग न केवल शिकायतों की सुनवाई करता है, बल्कि सरकार को नीतिगत सुझाव भी देता है। ऐसे में इसके पद रिक्त रहना एक गंभीर प्रशासनिक लापरवाही माना जा रहा है।
अपराध बढ़ रहे, सुनवाई की व्यवस्था ठप
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि राज्य में महिला संबंधी अपराधों में लगातार वृद्धि हो रही है। ऐसे समय में महिला आयोग का सक्रिय रहना बेहद जरूरी है। लेकिन वर्तमान में आयोग की कार्यप्रणाली लगभग ठप हो चुकी है,
जिससे पीड़ित महिलाओं के लिए न्याय पाने का एक महत्वपूर्ण मंच अस्थाई रूप से समाप्त हो गया है।
इस स्थिति को लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी राज्य सरकार को निर्देश दिए थे कि वह महिला आयोग के रिक्त पदों को शीघ्र भरे।
इसके बावजूद राज्य सरकार द्वारा अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
हाईकोर्ट ने मांगा स्पष्ट जवाब
सुनवाई के दौरान अदालत ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए राज्य सरकार को नोटिस जारी किया।
कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि सरकार यह बताए कि आयोग में रिक्त पदों को भरने के लिए अब तक क्या प्रक्रिया अपनाई गई है और नियुक्तियां कब तक की जाएंगी।
राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता प्रवीण खण्डेलवाल के सहयोगी अधिवक्ता पीयूष भंडारी ने कोर्ट में पेश होकर नोटिस स्वीकार किया और जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा।
इस पर अदालत ने सरकार को तीन सप्ताह का समय देते हुए अगली सुनवाई तक मामले को स्थगित कर दिया।