CBI की जांच में रिश्वत लेकर फैसले प्रभावित करने के आरोप, कार से 30 लाख और घर से 80 लाख रुपये की बरामदगी; हाईकोर्ट ने कहा-मामला गंभीर, जमानत का लाभ नहीं।
जयपुर। देशभर में चर्चा में आए रिश्वत लेकर फैसले देने के तथाकथित आयकर अपीलीय अधिकरण (ITAT) से जुड़े बहुचर्चित रिश्वत कांड में राजस्थान हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए सभी प्रमुख आरोपियों की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी हैं।
राजस्थान हाईकोर्ट ने 25 फरवरी को दिए अपने रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए स्पष्ट कहा कि प्रथम दृष्टया गंभीर आरोप और जांच में सामने आए तथ्यों को देखते हुए इस स्तर पर आरोपियों को राहत देना उचित नहीं है।
राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ के जज जस्टिस चंद्र प्रकाश श्रीमाली ने 4 फरवरी 2026 को इस मामले में सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था और 25 फरवरी 2026 को विस्तृत आदेश सुनाते हुए मामले में आरोपी जज, वकील, पक्षकार और सीए की जमानत याचिकाओं को खारिज कर दिया।
कौन हैं आरोपी
इस बहुचर्चित मामले में जिन पांच प्रमुख आरोपियों की जमानत खारिज हुई है, उनमें शामिल हैं:
सीता लक्ष्मी – आयकर अपीलीय अधिकरण की न्यायिक सदस्य यानी इस अधिकरण की जज
मुजम्मिल – कोटा निवासी, कथित रिश्वत देने वाला पक्षकार
राजेन्द्र सिसोदिया – अधिवक्ता
विजय गोयल – कथित बिचौलिया और सीए
कैलाश चन्द्र मीणा – अधिकरण से जुड़ा अधिकारी
सभी आरोपी फिलहाल जयपुर सेंट्रल जेल में बंद हैं।
एक दर्जन से अधिक अधिवक्ताओं ने की पैरवी
इस मामले में पांचों आरोपियों की ओर से दिग्गज अधिवक्ताओं ने पैरवी की। हाईकोर्ट में इन आरोपियों की ओर से अधिवक्ता दीपक चौहान, अधिवक्ता वी. आर. बाजवा, सर्वेश जैन, एस. एस. होरा, स्नेहदीप ख्यालिया, सिद्धार्थ शर्मा, सविता नथावत, हिमांशु चौधरी, टी. सी. शर्मा, सहजवीर बावेजा, समर्थ शर्मा, मृत्युंजय शर्मा, नरेन्द्र कुमार पारीक और हर्ष जोशी ने पैरवी की।
CBI के विशेष अधिवक्ता प्रदीप कुमार
दूसरी तरफ पांचों आरोपियों के खिलाफ सीबीआई के मामले में नियुक्त किए गए एकमात्र विशेष अधिवक्ता प्रदीप कुमार ने अपनी दलीलों से हाईकोर्ट में जमानत याचिकाएं खारिज कराने के लिए बेहद मजबूत तर्क पेश किए।
हाईकोर्ट ने इन सभी की जमानत याचिकाओं को खारिज कर दिया। यह सभी आरोपी केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) द्वारा दर्ज भ्रष्टाचार के मामले में गिरफ्तार किए गए थे।
रिश्वत लेकर फैसले देने का आरोप
सीबीआई के अनुसार यह मामला आयकर अपीलीय अधिकरण में लंबित मामलों के फैसलों को प्रभावित करने के लिए रिश्वत लेने से जुड़ा है। आरोप है कि कुछ मामलों में अनुकूल आदेश दिलाने के लिए लाखों रुपये की अवैध राशि ली गई।
सीबीआई के अनुसार एक संगठित नेटवर्क के माध्यम से वकीलों, बिचौलियों और पक्षकारों के जरिए पैसे का लेन-देन कराया गया। आरोप है कि अधिकरण में लंबित टैक्स अपीलों में अनुकूल निर्णय दिलाने के लिए रिश्वत की मांग की गई और राशि का वितरण किया गया।
सीबीआई ने गोपनीय सूचना मिलने के बाद इस पूरे मामले में ट्रैप और निगरानी के जरिए जांच शुरू की थी।
CBI की कार्रवाई: करोड़ों की नकदी बरामद
CBI ने 25 नवंबर 2025 को कार्रवाई करते हुए आयकर अपीलीय अधिकरण की न्यायिक सदस्य सीता लक्ष्मी और अधिवक्ता राजेन्द्र सिसोदिया को गिरफ्तार किया था। जांच के दौरान कई स्थानों पर छापे भी मारे गए।
जांच एजेंसी के अनुसार सीता लक्ष्मी की कार से 30 लाख रुपये नकद बरामद हुए और अधिवक्ता राजेन्द्र सिसोदिया के घर से करीब 80 लाख रुपये नकद मिले।
मामले में कथित रिश्वत देने वाले मुजम्मिल सहित अन्य लोगों को भी गिरफ्तार किया गया।
सीबीआई का आरोप है कि यह पूरी रकम न्यायिक आदेशों को प्रभावित करने के उद्देश्य से दी गई रिश्वत का हिस्सा थी।
किस कानून के तहत मामला
सीबीआई ने इस मामले में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की कई धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया है। इनमें मुख्य रूप से शामिल हैं:
धारा 7 – रिश्वत लेने का अपराध,
धारा 7A – रिश्वत की मांग या स्वीकृति,
धारा 8 और 9 – रिश्वत दिलाने के लिए बिचौलिया बनना,
धारा 10 और 12 – रिश्वत देने और उकसाने से संबंधित प्रावधान शामिल हैं।
यह मामला CBI पुलिस स्टेशन जयपुर में दर्ज किया गया है।
कोर्ट में क्या बोले आरोपी
जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान आरोपियों की ओर से कई कानूनी तर्क पेश किए गए। आइए जानते हैं बिंदुवार कानूनी बिंदु जो दलीलों में पेश किए गए।
न्यायिक अधिकारी होने के कारण संरक्षण का दावा
मामले में आरोपी और जज सीता लक्ष्मी, जो आयकर अपीलीय अधिकरण (ITAT) की न्यायिक सदस्य थीं, की ओर से दलील दी गई कि वह एक न्यायिक अधिकारी हैं, इसलिए उनके खिलाफ कार्रवाई जजेज प्रोटेक्शन एक्ट, 1985 के तहत संरक्षित है और बिना सक्षम अनुमति के उनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई नहीं की जा सकती।
याचिकाकर्ता पक्ष का कहना था कि सीबीआई ने आवश्यक वैधानिक अनुमति लिए बिना जांच और गिरफ्तारी की कार्रवाई की, जो कानून के विपरीत है।
महिला होने की दलील, गिरफ्तारी की प्रक्रिया पर सवाल
आरोपी जज सीता लक्ष्मी की ओर से यह भी कहा गया कि उन्हें 25 नवंबर 2025 की रात लगभग 9:30 बजे सीबीआई द्वारा हिरासत में लिया गया और औपचारिक गिरफ्तारी अगले दिन सुबह दिखाई गई।
याचिकाकर्ता पक्ष का तर्क था कि सूर्यास्त के बाद किसी महिला की गिरफ्तारी के लिए सक्षम मजिस्ट्रेट की अनुमति आवश्यक होती है, जो इस मामले में नहीं ली गई।
इस आधार पर गिरफ्तारी को अवैध और कानून के विपरीत बताया गया।
FIR में नाम नहीं
याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि प्रारंभिक सूचना रिपोर्ट (FIR) में सीता लक्ष्मी का नाम नहीं था और बाद में जांच के दौरान उन्हें आरोपी बनाया गया। उनका कहना था कि रिश्वत मांगने या लेने का कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं है।
रिश्वत की मांग या स्वीकृति का कोई प्रमाण नहीं
आरोपियों की ओर से यह भी कहा गया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अपराध सिद्ध करने के लिए रिश्वत की मांग और स्वीकृति का स्पष्ट प्रमाण होना आवश्यक है।
सिर्फ किसी व्यक्ति के पास से पैसे मिलने मात्र से यह साबित नहीं होता कि वह रिश्वत की रकम है।
बरामद नकदी का रिश्वत से संबंध नहीं
याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि सीता लक्ष्मी की कार से मिली 30 लाख रुपये की राशि का रिश्वत से कोई संबंध साबित नहीं किया गया।
दलील दी गई कि अधिवक्ता राजेन्द्र सिसोदिया के घर से बरामद 80 लाख रुपये उनकी पेशेवर आय का हिस्सा हो सकते हैं।
इसलिए सिर्फ कैश बरामदगी के आधार पर रिश्वत का अपराध सिद्ध नहीं माना जा सकता।
टेलीफोन टैपिंग पर सवाल
याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि मामले में टेलीफोन बातचीत को आधार बनाया गया है, लेकिन टेलीफोन टैपिंग की अनुमति कानून के अनुसार नहीं ली गई। टेलीफोन टैपिंग का आदेश सक्षम प्राधिकारी की बजाय अन्य अधिकारी द्वारा जारी किया गया, इसलिए उस पर आधारित जांच को भी अवैध बताया गया।
चार्जशीट अधूरी होने का दावा
याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि चार्जशीट अदालत में दाखिल की गई है, लेकिन उसके साथ सभी दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए गए। ऐसी स्थिति में इसे पूर्ण चार्जशीट नहीं माना जा सकता और आरोपियों को डिफॉल्ट बेल का लाभ मिलना चाहिए।
ट्रायल में लंबा समय लगेगा
याचिकाकर्ताओं का यह भी कहना था कि जांच लगभग पूरी हो चुकी है, आरोप पत्र दाखिल हो चुका है और ट्रायल पूरा होने में काफी समय लगेगा। इसलिए आरोपियों को जमानत पर रिहा किया जाना चाहिए।
डिफॉल्ट बेल का तर्क
कुछ आरोपियों ने यह भी तर्क दिया कि आरोप पत्र के साथ सभी दस्तावेज पेश नहीं किए गए, इसलिए उन्हें डिफॉल्ट बेल का लाभ मिलना चाहिए।
CBI ने अदालत में क्या कहा
सीबीआई की ओर से विशेष लोक अभियोजक प्रदीप कुमार ने जमानत याचिकाओं का जोरदार विरोध किया।
एजेंसी की ओर से अदालत को बताया गया कि यह मामला सामान्य रिश्वतखोरी का नहीं बल्कि न्यायिक संस्थान से जुड़ा गंभीर भ्रष्टाचार का है।
सीबीआई ने अदालत को बताया कि आयकर अपीलीय अधिकरण में मामलों के फैसले प्रभावित करने के लिए पैसे की मांग की गई और आरोपियों के बीच पैसों के लेन-देन के साक्ष्य जांच में सामने आए।
सीबीआई ने कहा कि भारी मात्रा में नकदी बरामद हुई है और मामले में कई डिजिटल और दस्तावेजी साक्ष्य मौजूद हैं।
एजेंसी का कहना था कि यदि आरोपियों को जमानत दी गई तो वे जांच और गवाहों को प्रभावित कर सकते हैं।

Advocate Pradeep Kumar
हाईकोर्ट का फैसला
जस्टिस चन्द्र प्रकाश श्रीमाली ने सभी पक्षों की बहस और दलीलें सुनने के बाद रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए फैसला देते हुए कहा कि यह मामला अत्यंत गंभीर प्रकृति का है क्योंकि इसमें न्यायिक संस्था से जुड़े अधिकारियों पर रिश्वत लेने के आरोप हैं।
ऐसे मामलों में अदालत को अत्यधिक सावधानी बरतनी होती है।
हाईकोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसी द्वारा पेश किए गए साक्ष्य प्रथम दृष्टया आरोपियों की भूमिका की ओर संकेत करते हैं।
इस स्तर पर अदालत आरोपों की विस्तृत जांच नहीं कर सकती, लेकिन उपलब्ध सामग्री जमानत देने के लिए पर्याप्त आधार नहीं बनाती।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि गिरफ्तारी की प्रक्रिया या अन्य तकनीकी आपत्तियों को जमानत का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता, खासकर तब जब मामला गंभीर भ्रष्टाचार से जुड़ा हो।
कोर्ट ने माना कि यह मामला न्यायिक संस्थान की साख से जुड़ा हुआ है। यदि ऐसे मामलों में जल्दबाजी में जमानत दी जाती है तो इससे न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि आरोपों की सत्यता और साक्ष्यों की विश्वसनीयता जैसे सभी मुद्दों का अंतिम फैसला ट्रायल कोर्ट में ही होगा।
अंतिम आदेश
राजस्थान हाईकोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद आयकर अपीलीय अधिकरण रिश्वत कांड में आरोपी जज सीता लक्ष्मी, मुजम्मिल, राजेन्द्र सिसोदिया, विजय गोयल और कैलाश चन्द्र मीणा की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं।
कोर्ट ने कहा कि इस स्तर पर जमानत देने से जांच और ट्रायल की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है, इसलिए आरोपियों को राहत नहीं दी जा सकती।