जोधपुर। राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन (RCA) से जुड़े एक अहम विवाद में राजस्थान हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कन्वीनर को हटाने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब किसी व्यक्ति के खिलाफ तय किए गए आपराधिक आरोप ही अदालत द्वारा रद्द कर दिए गए हों, तो उसके खिलाफ अयोग्यता (डिसक्वालिफिकेशन) का आधार स्वतः समाप्त हो जाता है।
यह फैसला राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ के जस्टिस कुलदीप माथुर ने देवी सिंह की ओर से दायर याचिका पर दिया हैं.
हाईकोर्ट ने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में याचिकाकर्ता द्वारा उठाया गया आधार टिकाऊ नहीं है और इसलिए याचिका स्वीकार नहीं की जा सकती।
RCA कन्वीनर की नियुक्ति को दी गई थी चुनौती
मामला राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन की एड-हॉक कार्यकारिणी समिति के कन्वीनर डी.डी. कुमावत (दीनदयाल कुमावत) की नियुक्ति से जुड़ा हुआ था।
याचिकाकर्ता देवी सिंह ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दावा किया था कि कुमावत को पद पर बने रहने का अधिकार नहीं है क्योंकि उनके खिलाफ आपराधिक मामले में अदालत द्वारा आरोप तय किए गए थे।
याचिका में दलीलें
याचिकाकर्ता देवी सिंह की ओर से अधिवक्ता प्रतीक कासलीवाल ने पैरवी करते हुए कहा कि यह नियुक्ति RCA के उपनियमों के अनुच्छेद 26 के विपरीत है, जिसमें कार्यकारिणी समिति के सदस्यों के लिए अयोग्यता के प्रावधान स्पष्ट रूप से निर्धारित किए गए हैं।
अधिवक्ताओं ने अदालत को बताया कि 18 सितंबर 2025 को सांभर लेक, जयपुर की एक सक्षम आपराधिक अदालत ने डी.डी. कुमावत सहित अन्य आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 188 और 149 के तहत आरोप तय किए थे।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि RCA के संविधान के अनुच्छेद 26(ग) के अनुसार जैसे ही किसी सदस्य के खिलाफ सक्षम आपराधिक अदालत आरोप तय करती है, वह व्यक्ति स्वतः कार्यकारिणी समिति की सदस्यता और उससे जुड़े किसी भी पद के लिए अयोग्य हो जाता है।
इस आधार पर याचिकाकर्ता ने कहा कि 18 सितंबर 2025 से डी.डी. कुमावत RCA की एड-हॉक कार्यकारिणी समिति के कन्वीनर पद पर बने रहने के लिए अयोग्य हो गए थे।
याचिका में यह भी कहा गया कि आरोप तय होने के बाद कुमावत द्वारा कन्वीनर के रूप में लिए गए सभी फैसले गैरकानूनी, शून्य और अधिकार क्षेत्र से परे हैं।
याचिकाकर्ता ने अदालत से यह भी आग्रह किया कि रजिस्ट्रार, सोसायटीज को निर्देश दिया जाए कि वे RCA के उपनियमों के अनुसार कुमावत को उनके सभी पदों से हटाने की कार्रवाई करें।
इसके अलावा याचिकाकर्ता ने अदालत से यह भी मांग की कि RCA के कुछ पदाधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार, साक्ष्यों को दबाने और अधिकारों के दुरुपयोग के आरोपों की जांच कर अनुशासनात्मक और कानूनी कार्रवाई के निर्देश दिए जाएं।
डी डी कुमावत का पक्ष
दूसरी ओर, प्रतिवादी डी.डी. कुमावत की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ सचिन आचार्य, रवि भंसाली, पी आर मेहता, एन एस राठौड़ ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता का पूरा मामला तथ्यों पर आधारित नहीं है।
प्रतिवादी पक्ष ने अदालत को बताया कि 18 सितंबर 2025 को जिन आरोपों के आधार पर कुमावत के खिलाफ अयोग्यता का दावा किया जा रहा है, उस आदेश को राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ पहले ही निरस्त कर चुकी है।
प्रतिवादी की ओर से बताया गया कि सह-आरोपी द्वारा दायर आपराधिक याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने 1 नवंबर 2025 को आरोप तय करने वाले आदेश को रद्द कर दिया था।
अधिवक्ता ने दलील दी कि जब आरोप तय करने का आदेश ही निरस्त हो चुका है, तो RCA के उपनियमों के तहत बताई गई कथित अयोग्यता का आधार भी समाप्त हो जाता है।
इसलिए डी.डी. कुमावत को RCA की एड-हॉक कार्यकारिणी समिति के कन्वीनर पद से हटाने का कोई आधार नहीं बचता।
प्रतिवादी की ओर से यह भी कहा गया कि याचिकाकर्ता ने अदालत से यह महत्वपूर्ण तथ्य छिपाया कि आरोप तय करने का आदेश पहले ही हाईकोर्ट द्वारा रद्द किया जा चुका है।
इस आधार पर प्रतिवादी पक्ष ने दलील दी कि जो व्यक्ति अदालत के सामने संपूर्ण और सही तथ्य प्रस्तुत नहीं करता, वह किसी भी राहत का हकदार नहीं हो सकता।
हाईकोर्ट का फैसला
हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद कहा कि जब आरोप तय करने का आदेश ही पहले ही रद्द हो चुका है, तो उसके आधार पर किसी पदाधिकारी की अयोग्यता नहीं मानी जा सकती।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि चूंकि आरोप तय करने का आदेश जयपुर पीठ द्वारा पहले ही निरस्त किया जा चुका है, इसलिए डी.डी. कुमावत के खिलाफ कथित अयोग्यता का आधार अब मौजूद नहीं है।
इसलिए RCA के उपनियमों के अनुच्छेद 26 के तहत उन्हें पद से हटाने का आधार स्वतः समाप्त हो जाता है।
पुराने फैसलों को भी चुनौती देने से कोर्ट का इंकार
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता ने यह तर्क दिया कि 18 सितंबर 2025 से 1 नवंबर 2025 के बीच कुमावत द्वारा लिए गए फैसले अवैध हैं।
लेकिन अदालत ने इस दलील को भी स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि उस समय कुमावत की नियुक्ति को चुनौती नहीं दी गई थी और काफी समय बीत जाने के बाद उनके फैसलों को चुनौती देना उचित नहीं है।
हाईकोर्ट ने कहा कि सरकारी या संस्थागत पदों पर बैठे व्यक्ति द्वारा अपने अधिकारों के तहत लिए गए निर्णयों को इतने लंबे समय बाद चुनौती देना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।
याचिका खारिज
इन सभी तथ्यों और कानूनी पहलुओं को देखते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया।
अदालत ने कहा कि चूंकि याचिका का मुख्य आधार ही समाप्त हो चुका है, इसलिए इस मामले में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं बनता।