जयपुर: राजस्थान हाईकोर्ट ने तलाक के बाद पति के खिलाफ दर्ज क्रूरता और दहेज के केस को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है।
एक मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पति की उस मांग को खारिज कर दिया, जिसमें उसने आपराधिक केस खत्म करने की मांग की थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि सिर्फ तलाक हो जाने से शादी के दौरान किए गए कथित अपराध खत्म नहीं हो जाते।
मामले में पति ने दलील दी थी कि दोनों का तलाक हो चुका है और अब अलग रह रहे हैं।
ऐसे में शादी से जुड़ा आपराधिक केस चलाने का कोई आधार नहीं है।
लेकिन हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति-पत्नी का रिश्ता कानूनी तौर पर खत्म हो जाने के बाद भी शादी के दौरान किए गए कथित अपराध की जांच और ट्रायल जारी रह सकता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि एफआईआर में क्रूरता और दहेज की मांग से जुड़े आरोप हैं। इन आरोपों की सच्चाई ट्रायल के दौरान सबूतों के आधार पर तय होगी।
जस्टिस अशोक कुमार जैन की पीठ ने पति की याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि तलाक से पति-पत्नी का रिश्ता खत्म हो जाता है, लेकिन शादी के दौरान किए गए कथित अपराध खत्म नहीं होते।
इसलिए सिर्फ तलाक की डिक्री के आधार पर आपराधिक केस को शुरुआती स्तर पर खत्म नहीं किया जा सकता।
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तलाक के बाद दर्ज हुआ था केस
मामला पति-पत्नी के बीच 2014 में हुई शादी से जुड़ा है। कुछ समय बाद दोनों के बीच विवाद शुरू हो गया।
पति ने नवंबर 2018 में तलाक के लिए केस दायर किया था।
बाद में दोनों के बीच तलाक हो गया। इसके कुछ समय बाद दिसंबर 2018 में पत्नी ने पति के खिलाफ आपराधिक शिकायत दर्ज कराई।
इसके आधार पर पति के खिलाफ धारा 498ए के तहत एफआईआर दर्ज हुई।
इस एफआईआर में शादी के दौरान क्रूरता और दहेज से जुड़ी मांगों के आरोप लगाए गए थे।
पति ने इसी एफआईआर को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
उसका कहना था कि जब तलाक हो चुका है और दोनों अलग-अलग रह रहे हैं तो अब वैवाहिक रिश्ते से जुड़ा आपराधिक मामला चलाने का कोई मतलब नहीं है।
पति की हाईकोर्ट में दलील
पति की ओर से हाईकोर्ट में दलील दी गई कि तलाक की प्रक्रिया पूरी होने के बाद पत्नी ने आपराधिक मामला दर्ज कराया।
उसका कहना था कि तब तक दोनों का वैवाहिक रिश्ता खत्म हो चुका था और वे अलग रह रहे थे।
पति ने यह भी बताया कि पत्नी नौकरी कर रही है और अलग रह रही है। ऐसे में तलाक के बाद भी शादी के दौरान की क्रूरता का केस चलाना उचित नहीं है।
उसने एफआईआर में लगाए गए आरोपों पर भी सवाल उठाए।
पति की दलील थी कि एफआईआर में लगाए गए आरोप इतने साफ नहीं हैं कि उनके आधार पर धारा 498ए का अपराध बनता हो।
इसी आधार पर पति ने हाईकोर्ट से एफआईआर और उसके आधार पर चल रही आपराधिक कार्रवाई को रद्द करने की मांग की।
सिर्फ तलाक से अपराध खत्म नहीं होगा
हाईकोर्ट ने पति की इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया।
हाईकोर्ट ने कहा कि तलाक से पति-पत्नी का रिश्ता खत्म हो सकता है, लेकिन शादी के दौरान किए गए कथित अपराध का मामला अपने आप खत्म नहीं होता।
यानी अगर शादी के दौरान पत्नी के साथ क्रूरता या दहेज की मांग का आरोप लगा है, तो बाद में तलाक हो जाने से उस मामले की कार्रवाई खत्म नहीं होगी।
हाईकोर्ट ने कहा कि तलाक और आपराधिक केस दो अलग-अलग मामले हैं।
तलाक में पति-पत्नी का रिश्ता खत्म करने का फैसला होता है, जबकि आपराधिक केस में यह देखा जाता है कि शादी के दौरान कोई अपराध हुआ था या नहीं।
FIR में क्या मिला?
हाईकोर्ट ने एफआईआर और रिकॉर्ड को भी देखा।
हाईकोर्ट के मुताबिक, इसमें सिर्फ पति-पत्नी के बीच सामान्य विवाद की बात नहीं थी।
एफआईआर में दहेज की मांग और क्रूरता से जुड़े आरोप लगाए गए थे।
हाईकोर्ट ने माना कि इन आरोपों की सच्चाई ट्रायल के दौरान सबूतों के आधार पर तय होगी।
हाईकोर्ट ने इस स्तर पर यह फैसला नहीं दिया कि पति ने वास्तव में क्रूरता की या दहेज की मांग की थी।
सिर्फ इतना माना कि एफआईआर में ऐसे आरोप हैं, जिनकी जांच और ट्रायल जरूरी है।
इसी वजह से हाईकोर्ट ने एफआईआर और उससे जुड़ी आपराधिक कार्रवाई को शुरुआती स्तर पर खत्म करने से इनकार कर दिया।
हाईकोर्ट कब केस खत्म कर सकता है?
हाईकोर्ट के पास आपराधिक मामलों को शुरुआती स्तर पर खत्म करने की शक्ति है।
लेकिन इसका इस्तेमाल तभी किया जाता है, जब एफआईआर में ऐसे आरोप हों जिनसे कोई अपराध बनता ही न हो या मामला कानून की प्रक्रिया के गलत इस्तेमाल जैसा लगे।
इस मामले में हाईकोर्ट को ऐसा नहीं लगा।
हाईकोर्ट के मुताबिक, एफआईआर में लगाए गए आरोपों की सच्चाई सबूतों के आधार पर ही सामने आएगी।
इसलिए यह तय करना ट्रायल कोर्ट का काम है कि आरोप सही हैं या नहीं।
हाईकोर्ट इस स्तर पर आरोपों की सच्चाई की जांच नहीं कर सकता।
हाईकोर्ट ने यह भी साफ किया कि एफआईआर में आरोप लगने का मतलब यह नहीं है कि आरोपी दोषी साबित हो गया।
उसे ट्रायल के दौरान अपना पक्ष रखने और आरोपों का जवाब देने का पूरा मौका मिलेगा।
तलाक और आपराधिक केस अलग-अलग चीजें
इस फैसले में हाईकोर्ट ने तलाक और आपराधिक केस के बीच का फर्क भी साफ किया है।
तलाक से पति-पत्नी का रिश्ता खत्म होता है, जबकि आपराधिक केस में यह देखा जाता है कि शादी के दौरान कोई अपराध हुआ था या नहीं।
दोनों मामले एक ही विवाद से जुड़े हो सकते हैं, लेकिन तलाक हो जाने से आपराधिक केस अपने आप खत्म नहीं हो जाता।
यानी शादी के दौरान क्रूरता या दहेज की मांग के आरोप में दर्ज केस सिर्फ इसलिए खत्म नहीं होगा कि बाद में पति-पत्नी का तलाक हो गया और वे अलग रहने लगे।
हाईकोर्ट ने पति को दोषी नहीं माना
हाईकोर्ट ने इस मामले में पति को दोषी नहीं ठहराया है।
हाईकोर्ट ने सिर्फ एफआईआर और उससे जुड़ी आपराधिक कार्रवाई को इस स्तर पर खत्म करने से इनकार किया है।
अब आरोप सही हैं या नहीं, यह ट्रायल के दौरान सबूतों के आधार पर तय होगा।
दोनों पक्षों को अपना पक्ष रखने और सबूत पेश करने का मौका मिलेगा।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने पति की याचिका खारिज कर दी। यानी फिलहाल आपराधिक केस आगे चलता रहेगा और इसका अंतिम फैसला ट्रायल कोर्ट करेगा।