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20 हजार करोड़ की जरूरत, बजट में सिर्फ 1000 करोड़, यह समुद्र में बूंद जैसा: राजस्थान में जर्जर स्कूल भवनों पर हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी

Rajasthan High Court Slams State Over Dilapidated School Buildings, Says ₹1000 Crore Budget “Drop in the Ocean” Against ₹20,000 Crore Need

जयपुर। राजस्थान में सरकारी स्कूलों के जर्जर भवनों और बच्चों की सुरक्षा के मुद्दे पर राजस्थान हाईकोर्ट ने सुनवाई करते हुए राज्य सरकार द्वारा हाल ही में किए गए बजट प्रावधान पर बेहद सख्त टिप्पणी की है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि जब राज्य में सरकारी स्कूलों की स्थिति सुधारने के लिए लगभग 20 हजार करोड़ रुपये की जरूरत है, तब सिर्फ 1000 करोड़ रुपये का बजट प्रावधान करना “समुद्र में बूंद” के समान है।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि इस तरह के सीमित बजट से स्कूलों की सुरक्षा सुनिश्चित करना संभव नहीं दिखता।

राजस्थान हाईकोर्ट ने जुलाई 2025 में झालावाड़ जिले में एक सरकारी स्कूल भवन ढहने से सात छोटे बच्चों की दर्दनाक मौत के मामले में स्वप्रेरणा से प्रसंज्ञान लिया था।

स्वप्रेरणा से लिए गए प्रसंज्ञान से दायर जनहित याचिका पर हाईकोर्ट लगातार सुनवाई कर रहा है। हाल ही में 5 मार्च को भी हाईकोर्ट ने इस मामले पर सुनवाई की थी।

जस्टिस महेन्द्र कुमार गोयल और जस्टिस अशोक कुमार जैन की विशेष खंडपीठ का 5 मार्च का विस्तृत आदेश मंगलवार को सामने आया है।

राज्यभर में हजारों जर्जर स्कूल भवन

सुनवाई के दौरान अदालत के सामने पेश किए गए दस्तावेजों और रिपोर्टों से यह सामने आया कि राजस्थान के कई जिलों में सरकारी स्कूलों की इमारतें बेहद खराब स्थिति में हैं। कई जगहों पर स्कूलों की छतें टूट चुकी हैं, दीवारों में दरारें हैं और कई भवन पूरी तरह जर्जर हो चुके हैं।

कुछ स्थानों पर तो बच्चों को मजबूरी में खुले मैदान या पेड़ों के नीचे पढ़ाई करनी पड़ रही है। अदालत ने इस स्थिति को बेहद गंभीर बताते हुए कहा कि बच्चों को ऐसे असुरक्षित वातावरण में पढ़ाना उनके जीवन और स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है।

सरकार ने बताया-20 हजार करोड़ की जरूरत

राज्य सरकार की ओर से दायर अतिरिक्त हलफनामे में बताया गया कि राजस्थान के सरकारी स्कूलों के भवनों की मरम्मत, पुनर्निर्माण और नए निर्माण कार्यों के लिए लगभग 20 हजार करोड़ रुपये की आवश्यकता है।

सरकार ने यह भी बताया कि अब तक लगभग 1624 करोड़ रुपये स्वीकृत किए जा चुके हैं। इसके अलावा वित्तीय वर्ष 2026-27 के बजट में 1000 करोड़ रुपये का प्रावधान प्रस्तावित किया गया है, ताकि जर्जर स्कूल भवनों की मरम्मत और नए कक्षों का निर्माण किया जा सके।

“समुद्र में बूंद” जैसा बजट

सरकार के जवाब पर हाईकोर्ट की खंडपीठ ने बजट प्रस्ताव को बेहद अपर्याप्त बताते हुए कहा कि जब जरूरत इतनी बड़ी है, तब इतनी कम राशि से समस्या का समाधान संभव नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि 20 हजार करोड़ रुपये की आवश्यकता के मुकाबले 1000 करोड़ रुपये का बजट बेहद कम और “समुद्र में बूंद” जैसा है।

अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि सरकार वास्तव में स्कूलों की स्थिति सुधारना चाहती है तो उसे इसके लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराने होंगे। केवल औपचारिक बजट घोषणाओं से बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती।

कोर्ट ने यह भी कहा कि निर्माण और मरम्मत कार्यों की लागत हर साल बढ़ती रहती है। ऐसे में यदि पर्याप्त बजट नहीं दिया गया तो आने वाले समय में समस्या और भी गंभीर हो सकती है।

बच्चों की सुरक्षा राज्य की जिम्मेदारी

अदालत ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि राज्य सरकार अपने संवैधानिक दायित्व से पीछे नहीं हट सकती।

कोर्ट ने कहा कि हर बच्चे का मौलिक अधिकार है कि उसे सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण में शिक्षा मिले। बच्चों को जर्जर या असुरक्षित भवनों में पढ़ने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

यदि सरकार के पास पर्याप्त बजट नहीं है, तो भी वह अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती। बच्चों की सुरक्षा और शिक्षा से जुड़ा यह मुद्दा संविधान के तहत राज्य की प्राथमिक जिम्मेदारी है।

अदालत ने जताई सरकार की गंभीरता पर शंका

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि उपलब्ध तथ्यों से ऐसा प्रतीत नहीं होता कि राज्य सरकार स्कूलों के सुरक्षित ढांचे को लेकर पूरी तरह गंभीर है।

अदालत ने कहा कि यदि वास्तव में सरकार इस समस्या का समाधान चाहती है तो उसे स्पष्ट और ठोस योजना पेश करनी होगी।

इसी कारण अदालत ने राज्य के मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि वे एक विस्तृत शपथपत्र दाखिल करें, जिसमें यह बताया जाए कि स्कूल भवनों के निर्माण और मरम्मत के लिए सरकार का पूरा रोडमैप क्या है।

केंद्र से सहायता लेने में भी लापरवाही

सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया कि उन्होंने राज्य सरकार से कई बार यह जानकारी मांगी कि केंद्र सरकार से करीब 2000 करोड़ रुपये की सहायता के लिए क्या प्रस्ताव भेजा गया है, लेकिन राज्य के अधिकारियों ने आवश्यक जानकारी साझा नहीं की।

इस पर अदालत ने राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है, जो अधिकारियों की लापरवाही और उदासीनता को दर्शाती है। हालांकि बाद में राज्य के महाधिवक्ता ने आश्वासन दिया कि आवश्यक जानकारी उसी दिन उपलब्ध करा दी जाएगी।

विशेषज्ञ समिति बनाने का सुझाव

अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि स्कूल भवनों के निर्माण और मरम्मत कार्य की निगरानी के लिए विशेषज्ञों की एक समिति गठित करने का सुझाव दिया जाए। यह समिति यह सुनिश्चित करेगी कि निर्माण कार्य राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग और राष्ट्रीय भवन संहिता के मानकों के अनुसार हो।

कोर्ट ने कहा कि किसी भी तरह की लापरवाही या नियमों की अनदेखी होने पर संबंधित अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए।

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