हाईकोर्ट ने कहा अनुच्छेद 21 के तहत अनुपातिकता के सिद्धांत को लागू करते हुए अभियुक्त को उसके सभी मुकदमों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उपस्थित होने की अनुमति प्रदान कर सकता है।
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर मुख्यपीठ ने न्यायिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव डालने वाला आदेश पारित करते हुए 156 मुकदमों के आरोप में जेल में बंद 4 कैदियों को बड़ी राहत दी है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले के जरिए स्पष्ट किया जब कोई अभियुक्त एक से अधिक एफआईआर या विभिन्न आपराधिक मुकदमों का सामना कर रहा हो और प्रत्येक बार उसकी भौतिक (शारीरिक) पेशी के लिए पुलिस बल, सुरक्षा व्यवस्था एवं सरकारी संसाधनों पर अनावश्यक बोझ पड़ रहा हो, तब अदालत संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत निहित प्रोपोर्शनैलिटी (अनुपातिकता) के सिद्धांत को लागू करते हुए उसे सभी मुकदमों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उपस्थित होने की अनुमति प्रदान कर सकता है।
अर्थात् न्यायालय यह संतुलन स्थापित करता है कि एक ओर अभियुक्त के मौलिक अधिकार सुरक्षित रहें और दूसरी ओर राज्य के संसाधनों का दुरुपयोग या अनावश्यक व्यय न हो।
राजस्थान हाईकोर्ट ने चारों कैदियों की याचिकाओं को मंजूर करते हुए उनके खिलाफ पेंडिंग मुकदमों की तारीखों पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश होने और कोर्ट कार्यवाही में भाग लेने की अनुमति दी है।
हाईकोर्ट ने संबंधित जेल प्राधिकारियों को भी आदेश दिया है कि जब भी कोर्ट द्वारा आवश्यक हो या विशेष अनुरोध प्राप्त हो, तब वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की समुचित सुविधा उपलब्ध कराई जाए।
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जब तकनीक उपलब्ध है और विधिक प्रावधान इसकी अनुमति देते हैं, तो केवल औपचारिक पेशी के लिए बंदियों को एक जिले से दूसरे जिले या दूसरे राज्य तक बार-बार ले जाना न तो व्यावहारिक है और न ही न्यायसंगत।
JUSTICE FARJAND ALI की एकलपीठ ने यह फैसला जोधपुर सेंट्रल जेल में बंद कैदी Ranveer Singh Alias Ranveer Bijarnia, Subhash Chandra Bijnoriya, Amarchand और Opendra Kumar की ओर से दायर याचिकाओं पर दिया है।
हाईकोर्ट ने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि इन आदेशों का अक्षरशः पालन सुनिश्चित किया जाए, ताकि वर्चुअल माध्यम से न्यायिक कार्यवाही में किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न न हो।
“क्या हर बार 5-7 पुलिसकर्मी तैनात करना उचित?”
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में इस तरह की पेशियों पर प्रशासनिक और वित्तीय बोझ पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए कहा कि हर अंतर-राज्यीय प्रोडक्शन में 5 से 7 पुलिसकर्मियों की एस्कॉर्ट टीम लगती है, जिससे नियमित कानून-व्यवस्था और जांच कार्य प्रभावित होते हैं।
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति अनेक आपराधिक मुकदमों का सामना कर रहा है, तो उसे भी निष्पक्ष और न्यायपूर्ण सुनवाई का अधिकार प्राप्त है। न्याय केवल राज्य का अधिकार नहीं, बल्कि प्रत्येक अभियुक्त का मौलिक अधिकार है।
ऐसी स्थिति में हर बार उसकी शारीरिक पेशी के लिए भारी संख्या में पुलिस बल, सुरक्षा प्रबंध और सरकारी संसाधनों का उपयोग करना पड़ता है, जिससे सार्वजनिक धन और प्रशासनिक तंत्र पर अनावश्यक बोझ पड़ता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि जब आज तकनीक अत्याधुनिक और सुलभ है, तो न्यायालय वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग जैसे माध्यमों का उपयोग कर निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित कर सकता है। इससे एक ओर अभियुक्त के अधिकार सुरक्षित रहते हैं और दूसरी ओर राज्य के संसाधनों का संतुलित व प्रभावी उपयोग संभव होता है।
वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का विकल्प
हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि अनुच्छेद 21 के तहत प्रक्रिया ‘न्यायसंगत, उचित और तर्कसंगत’ होनी चाहिए। यदि कम दखल वाला और समान रूप से प्रभावी विकल्प (वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग) उपलब्ध है, तो कठोर और बोझिल प्रक्रिया पर जोर देना अनुचित होगा।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यह आदेश ‘Doctrine of Proportionality’ की संवैधानिक व्याख्या का महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है।
कोर्ट ने उदाहरण दिया—यदि कोई आरोपी बीकानेर जेल में बंद है और उसे मंदसौर (मध्य प्रदेश) में पेश करना है, तो पूरी एस्कॉर्ट टीम, दस्तावेजी प्रक्रिया, ट्रांजिट, ठहराव—सब दोहराया जाता है। कई मामलों में यह प्रक्रिया सप्ताह में कई बार दोहराई जाती है।
कोर्ट ने इसे “शंटिंग” की स्थिति बताते हुए कहा कि इससे न्याय की गति नहीं बढ़ती, बल्कि प्रशासनिक और वित्तीय बोझ बढ़ता है।
क्या है पूरा मामला?
याचिकाकर्ता रणवीर सिंह उर्फ रणवीर बिजारणिया सहित अन्य आरोपियों पर निवेश एवं रियल एस्टेट से जुड़े मामलों में राजस्थान के विभिन्न जिलों में कुल 156 से अधिक एफआईआर दर्ज हैं।
कुछ मामलों में चार्जशीट दाखिल हो चुकी है और ट्रायल चल रहा है, जबकि कई प्रकरणों में अभी जांच जारी है।
बार-बार गिरफ्तारी, पुलिस रिमांड, विभिन्न अदालतों से प्रोडक्शन वारंट और अलग-अलग जिलों में पेशी के कारण आरोपियों को एक जेल से दूसरी जेल में ले जाया जा रहा था।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि इससे न केवल उन्हें कठिनाई हो रही है बल्कि न्यायिक प्रक्रिया भी प्रभावित हो रही है।
हर पेशी के समय इन कैदियों को ले जाने के लिए 5—7 पुलिस के जवानों को तैनात किया जाता है।
याचिकाकर्ताओं की दलील
जोधपुर सेंट्रल जेल में बंद इन कैदियों की ओर से अधिवक्ता प्रियंका बोराणा ने अनुच्छेद 226 के अंतर्गत रिट याचिका पेश कर दलील देते हुए अनुरोध किया कि उन्हें उनके विरुद्ध लंबित समस्त आपराधिक मामलों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उपस्थित होने की अनुमति प्रदान की जाए।
अधिवक्ता प्रियंका बोराणा ने तर्क दिया कि चारों याचिकाकर्ताओं के खिलाफ 150 से ज्यादा एफआईआर दर्ज हैं जो प्रदेश के अलग-अलग जिलों में दर्ज हैं।
अलग-अलग जिलों की अदालतों द्वारा अलग-अलग प्रोडक्शन वारंट जारी किया जाता है, जिसके चलते बार-बार ट्रांजिट के कारण निरंतर जेल से जेल ट्रांसफर किया जा रहा है।
अधिवक्ता ने यह भी दलील दी कि यह स्थिति “न्यायिक शंटिंग” (Judicial Shunting) का रूप ले चुकी है।
अधिवक्ता ने दलील देते हुए कहा कि अनुच्छेद 21 के तहत ‘न्यायसंगत, उचित एवं तर्कसंगत प्रक्रिया’ का अधिकार है। बार-बार ट्रांजिट से त्वरित न्याय (Speedy Trial) प्रभावित हो रहा है।
और अपने वकील से परामर्श का अवसर भी सीमित हो जाता है।
वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग नियम, 2021
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता ने VC Rules, 2021 का हवाला देते हुए कहा कि नियम 3 के अनुसार न्यायिक कार्यवाही के सभी चरणों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की अनुमति है।
नियम 6 के अंतर्गत आवेदन देकर VC के माध्यम से उपस्थिति संभव है और वर्चुअल कार्यवाही भी विधिक रूप से वैध न्यायिक कार्यवाही है।
प्रशासनिक और वित्तीय बोझ
अधिवक्ता ने यह भी दलील दी कि प्रत्येक अंतर-जिला या अंतर-राज्यीय ट्रांजिट में 4–7 पुलिसकर्मियों की एस्कॉर्ट टीम, वाहन, ईंधन, टोल, भत्ता, सुरक्षा खर्च हो रहा है, जो कि राज्य के सार्वजनिक धन का अनावश्यक व्यय है।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि जब तकनीक उपलब्ध है तो भौतिक पेशी पर जोर देना तर्कसंगत नहीं।
अधिवक्ता प्रियंका बोराणा ने इस दौरान लंबी दूरी के ट्रांजिट में सुरक्षा जोखिम का तर्क पेश करते हुए कहा कि ऐसे समय में स्वास्थ्य या आपातकाल की संभावना बनी रहती है।
अधिवक्ता ने कहा कि जब कम दखल वाला और समान रूप से प्रभावी विकल्प (वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग) उपलब्ध है, तो कठोर प्रक्रिया अपनाना असंगत और अनुपातहीन (Disproportionate) है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी कहा गया कि बार-बार प्रोडक्शन से सुनवाई टलती है। कई बार एक ही तारीख को विभिन्न न्यायालयों में पेशी होती है। VC से सुनवाई अधिक नियमित और सुचारू हो सकती है।
राज्य सरकार का विरोध
याचिका का विरोध करते हुए राज्य के उप महाधिवक्ता ने दलील दी कि आरोपियों के खिलाफ बेहद गंभीर आपराधिक मामले हैं और याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध 100 से अधिक एफआईआर दर्ज हैं।
सरकार ने कहा कि आरोपियों ने निवेश घोटाले एवं बड़े पैमाने पर आर्थिक अपराध किया है और राज्य के अनेक पीड़ितों का हित जुड़ा हुआ है।
सरकार ने कहा कि मामलों की गंभीरता को देखते हुए उनकी त्वरित सुनवाई के लिए भौतिक उपस्थिति आवश्यक हो सकती है।
ट्रायल कोर्ट के विवेक में हस्तक्षेप
सरकार ने दलील दी कि प्रत्येक ट्रायल कोर्ट को यह अधिकार है कि वह परिस्थितियों के अनुसार भौतिक उपस्थिति का आदेश दे।
सरकार ने इस बात का विरोध किया कि हाईकोर्ट से blanket permission देना ट्रायल कोर्ट के विवेक में हस्तक्षेप हो सकता है।
राज्य सरकार ने यह भी दलील दी कि कुछ मामलों में अभियुक्त की पहचान विवादित हो सकती है, जिसके लिए गवाहों के समक्ष अभियुक्त की भौतिक उपस्थिति आवश्यक हो सकती है और जिरह (Cross Examination) के दौरान व्यक्तिगत उपस्थिति आवश्यक हो सकती है।
राज्य सरकार ने यह भी कहा कि सभी न्यायालयों में समान स्तर की VC सुविधा उपलब्ध नहीं है और तकनीकी कारणों से कार्यवाही प्रभावित हो सकती है।
राज्य सरकार ने यह भी आशंका व्यक्त की कि कहीं ऐसा न हो कि VC की अनुमति से अभियुक्त प्रक्रिया में विलंब का प्रयास करें।
यदि प्रत्येक आरोपी blanket permission मांगने लगे तो व्यावहारिक कठिनाई उत्पन्न हो सकती है।
Blanket छूट नहीं
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि VC से न्यायिक नियंत्रण समाप्त नहीं होता और ट्रायल कोर्ट आवश्यक होने पर भौतिक उपस्थिति का निर्देश दे सकता है।
कोर्ट ने कहा कि यह blanket छूट नहीं, बल्कि संरचित एवं नियमबद्ध अनुमति दी जा रही है।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
हाईकोर्ट ने सुनवाई के बाद याचिकाकर्ताओं की याचिका स्वीकार करते हुए उन्हें उनके विरुद्ध लंबित सभी पेंडिंग मुकदमों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश होने और कोर्ट कार्यवाही में भाग लेने की अनुमति दे दी है।
अदालत ने संबंधित जेल अधिकारियों को निर्देश दिया है कि जब भी न्यायालय द्वारा आवश्यक हो या विशेष अनुरोध प्राप्त हो, तब वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की समुचित सुविधा उपलब्ध कराई जाए।