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राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: भूमि विवाद में रास्ता केवल सुविधा के लिए नहीं, बल्कि ‘पूर्ण आवश्यकता’ के आधार पर तय होगा

Rajasthan High Court Big Verdict: Right of Way Only on “Absolute Necessity”, Not Convenience

हाईकोर्ट ने कहा कि सभी प्रभावित पक्षों को सुनना जरूरी, SDO और राजस्व बोर्ड के आदेश रद्द

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने संपूर्ण राज्य के गांवों में अक्सर होने वाले रास्तों के जमीनी विवाद को लेकर महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला दिया है।

राजस्थान हाईकोर्ट का यह फैसला सिर्फ एक गांव या एक भूमि विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे राजस्थान में भूमि विवादों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।

इस फैसले में राजस्थान हाईकोर्ट ने रास्ते की जमीन के लिए होने वाले जमीनी विवादों के मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी भूमि विवाद में रास्ता केवल सुविधा के लिए नहीं दिया जा सकता, बल्कि रास्ते के लिए पूर्ण आवश्यकता के आधार पर ही तय किया जाएगा।

हाईकोर्ट ने इसके साथ ही कहा कि खसरा भूमि विवाद में सभी प्रभावित पक्षों को सुनना जरूरी है, और SDO व राजस्व बोर्ड के आदेश रद्द किए जाते हैं।

हाईकोर्ट ने नागौर जिले के मकराना तहसील के गोठड़ी गांव में लंबे समय से चल रहे भूमि विवाद में फैसला सुनाते हुए निचली अदालतों के आदेशों को रद्द कर दिया है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी भूमि विवाद में यदि वैकल्पिक रास्ते की संभावना हो, तो उससे जुड़े सभी खातेदारों को पक्षकार बनाना आवश्यक है, ताकि न्यायपूर्ण और पूर्ण निर्णय हो सके।

जस्टिस संजीत पुरोहित की एकलपीठ ने यह फैसला अर्जुनराम और हरजीराम की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिया है।

यह फैसला न्यायमूर्ति संजीत पुरोहित की एकलपीठ ने 13 मार्च 2026 को सुनाया, जिसमें दो रिट याचिकाओं (S.B. Civil Writ Petition No. 18952/2022 और 18888/2022) को एक साथ निपटाया गया।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला गोठड़ी गांव के खसरा नंबर 162 की भूमि से जुड़े रास्ते के विवाद का है।

याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि प्रतिवादियों ने उनकी भूमि से होकर नया रास्ता निकालने के लिए आवेदन किया था, जिसे 2013 में एसडीओ (उपखंड अधिकारी) ने मंजूरी दे दी।

इस फैसले के खिलाफ याचिकाकर्ताओं ने अपील की, जिसके बाद राजस्व अपीलीय प्राधिकरण (RAA) ने 2016 में एसडीओ के आदेश को रद्द कर मामला पुनः सुनवाई के लिए वापस भेज दिया।

इसके बाद मामला राजस्व बोर्ड (BOR), अजमेर पहुंचा, जिसने भी 2017 में RAA के आदेश को सही ठहराया और निर्देश दिए कि भूमि को दो हिस्सों में विभाजित न किया जाए और वैकल्पिक रास्ते की संभावनाओं की जांच की जाए।

बोर्ड ने कहा कि नया रास्ता केवल तब दिया जाए जब कोई अन्य विकल्प न हो।

विवाद की जड़:

पुनः सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने मांग की कि खसरा नंबर 161 के खातेदारों को भी इस मामले में पक्षकार बनाया जाए, क्योंकि वैकल्पिक रास्ता उसी भूमि से होकर संभव है।

हालांकि, एसडीओ ने 30 मार्च 2021 को यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि खसरा 161 से रास्ता मांगा ही नहीं गया है और राजस्व रिकॉर्ड में वहां कोई रास्ता दर्ज नहीं है।

बाद में राजस्व बोर्ड ने भी 20 सितंबर 2022 को इस निर्णय को बरकरार रखा।

याचिकाकर्ता का पक्ष

याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में मुख्य रूप से यह तर्क रखा गया कि पूरा विवाद केवल रास्ते का नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण और समग्र निर्णय (comprehensive adjudication) का है।

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि खसरा नंबर 162 से रास्ता निकालने की बजाय एक वैकल्पिक रास्ता खसरा नंबर 161 के पास से उपलब्ध है, इसलिए उस जमीन के खातेदार को पक्षकार बनाना जरूरी है।

उनका तर्क था कि यदि खसरा 161 के खातेदार को पक्षकार नहीं बनाया गया, तो उसका अधिकार प्रभावित होगा और निर्णय अधूरा और एकतरफा होगा।

इसलिए Order 1 Rule 10 CPC के तहत उसे “necessary party” बनाया जाना चाहिए।

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि यह जरूरी नहीं कि केवल वही रास्ता देखा जाए, जो आवेदन में मांगा गया है, बल्कि प्रशासन का कर्तव्य है कि सभी संभावित रास्तों की जांच करे।

उन्होंने बताया कि पहले ही राजस्व बोर्ड ने निर्देश दिया था कि जमीन को दो भागों में न बांटा जाए, वैकल्पिक रास्ता तलाशा जाए, लेकिन SDO ने इन निर्देशों को नजरअंदाज किया।

याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि साइट निरीक्षण रिपोर्ट (12.03.2021) में खुद वैकल्पिक रास्ता दिखाया गया है, जो खसरा 161 के पास से जाता है।

इसलिए उस जमीन के मालिक को शामिल करना अनिवार्य है।

प्रतिवादी का पक्ष

प्रतिवादियों की ओर से याचिकाकर्ताओं के सभी तर्कों का विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्ताओं ने कभी खसरा 161 से रास्ता मांगा ही नहीं, इसलिए उसके खातेदार को पक्षकार बनाने का कोई आधार नहीं है।

उन्होंने तर्क दिया कि खसरा 161 में कोई रास्ता रिकॉर्ड में दर्ज नहीं है, इसलिए उसे विवाद में शामिल करना गैरजरूरी है।

अधिवक्ता ने दलील दी कि SDO और राजस्व बोर्ड ने सभी तथ्यों को देखकर निर्णय लिया है और उनके आदेश विचारित व न्यायसंगत (well reasoned) हैं।

इसलिए हाईकोर्ट को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

हाईकोर्ट का बड़ा हस्तक्षेप

दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि निचली अदालतों के तर्क “त्रुटिपूर्ण और कानून के विपरीत” हैं।

कोर्ट ने कहा कि सिर्फ यह आधार कि रास्ता मांगा नहीं गया, पर्याप्त नहीं है।

वास्तविक जांच यह होनी चाहिए कि क्या वैकल्पिक रास्ता संभव है। जिस भूमि से रास्ता संभावित है, उसके खातेदार को पक्षकार बनाना जरूरी है।

कोर्ट ने साफ कहा कि धारा 251-A (राजस्थान टेनेंसी एक्ट, 1955) के तहत “आवश्यकता” का मतलब “पूर्ण आवश्यकता (absolute necessity)” है, न कि केवल सुविधा या पसंद।

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता सरोज पटेल और नंदपना गहलोत ने पैरवी की
प्रतिवादी पक्ष की ओर से स्वेता पुरोहित ने पैरवी की.

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