धारा 308 IPC पर भी कोर्ट की स्पष्ट टिप्पणी, कहा- आरोप तय करने का आधार हर मामले के साक्ष्य होंगे, समानता जरूरी नहीं।
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और मार्गदर्शक फैसले में कहा है कि यदि एक ही घटना से जुड़े दो अलग-अलग मामले (केस और काउंटर-केस) दर्ज होते हैं, तो उनकी सुनवाई आदर्श रूप से एक ही अदालत द्वारा की जानी चाहिए।
हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसा करने से न्यायिक प्रक्रिया में निष्पक्षता बनी रहती है और एक ही घटना पर अलग-अलग अदालतों द्वारा विरोधाभासी निष्कर्ष आने की संभावना खत्म हो जाती है।
जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने अमीन खान व अन्य द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की।
हाईकोर्ट ने कहा कि क्रॉस-केस की स्थिति में अदालतों को दोनों मामलों का समग्र और तुलनात्मक मूल्यांकन करना चाहिए ताकि घटना की वास्तविक सच्चाई सामने आ सके।
क्या है पूरा मामला
मामला नागौर जिले के डीडवाना क्षेत्र की 23 जनवरी 2022 की एक घटना से जुड़ा है। इस घटना में दो पक्षों के बीच विवाद और मारपीट हुई थी, जिसके बाद दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के खिलाफ पुलिस में अलग-अलग FIR दर्ज करवाई।
घटना के बाद पुलिस थाने में FIR नंबर 24/2022 और FIR नंबर 23/2022 दर्ज हुईं।
FIR संख्या 24/2022 के आधार पर दायर मुकदमें में अमीन खान और अन्य आरोपियों के खिलाफ आरोप लगाया गया कि आरोपियों ने समूह बनाकर हमला किया और मारपीट की, जिससे पीड़ित को कई गंभीर चोटें आईं।
पुलिस जांच के बाद इस मामले में आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धाराएं 148, 341, 323, 325, 326, 308 और 504 सहित अन्य धाराओं में आरोप तय किए गए और मामला सत्र न्यायालय ADJ COURT में विचाराधीन हुआ।
दूसरी ओर दूसरी FIR संख्या 23/2022 दर्ज हुई, इस मामले की जांच के बाद यह पाया गया कि शिकायतकर्ता को मुख्य रूप से हाथ और उंगलियों पर चोटें आई थीं।
यह मामला मजिस्ट्रेट COURT में चला जहां कोर्ट ने इस मामले में धारा 308 आईपीसी के तहत आरोप तय नहीं किया और केवल कम गंभीर धाराओं के तहत कार्यवाही आगे बढ़ाने का निर्णय लिया
ट्रायल कोर्ट के अलग-अलग आदेश
पहले मामले में एडीजे अदालत ने आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 308 सहित कई गंभीर धाराओं में आरोप तय किए, जबकि दूसरे मामले में मजिस्ट्रेट अदालत ने धारा 308 के तहत आरोप तय करने से इनकार कर दिया।
इन्हीं आदेशों को चुनौती देते हुए दोनों पक्षों ने राजस्थान हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिकाएं दायर की थीं।
क्रॉस-केस की स्थिति में क्या है कानून
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि जब एक ही घटना से जुड़े दो अलग-अलग मामले दर्ज होते हैं, तो उन्हें आपराधिक कानून में “केस और काउंटर-केस” कहा जाता है।
ऐसी परिस्थितियों में दोनों पक्ष अपनी-अपनी कहानी पेश करते हैं और अक्सर दोनों एक-दूसरे को हमलावर बताते हैं।
अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में जांच एजेंसियों और अदालतों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि घटना की सच्चाई का पता केवल दोनों पक्षों के साक्ष्यों का तुलनात्मक अध्ययन करके ही लगाया जा सकता है।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि आदर्श स्थिति यह है कि ऐसे मामलों की सुनवाई एक ही जज द्वारा की जाए।
इससे यह सुनिश्चित होता है कि साक्ष्यों का मूल्यांकन एक ही दृष्टिकोण से किया जाए और किसी भी प्रकार के विरोधाभासी निष्कर्ष सामने न आएं।
एक ही कोर्ट में सुनवाई क्यों जरूरी
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि एक ही घटना से जुड़े दो मामलों की सुनवाई अलग-अलग अदालतों में होगी तो इस बात की संभावना रहती है कि दोनों अदालतें अलग-अलग निष्कर्ष निकाल लें।
ऐसी स्थिति न्यायिक प्रणाली की विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकती है।
हाईकोर्ट ने कहा कि एक ही जज के सामने दोनों मामलों की सुनवाई होने से उसे दोनों पक्षों के गवाहों को देखने, उनके बयान सुनने और उनके व्यवहार तथा विश्वसनीयता का आकलन करने का अवसर मिलता है।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि गवाहों के हाव-भाव, आत्मविश्वास, झिझक या विरोधाभास जैसी बातें भी सच्चाई तक पहुंचने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
आरोप तय करने के सिद्धांत
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि आरोप तय करने के चरण पर अदालत को विस्तृत साक्ष्य परीक्षण करने की आवश्यकता नहीं होती।
इस चरण पर केवल यह देखा जाता है कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर आरोपी के खिलाफ अपराध का प्रथम दृष्टया संदेह बनता है या नहीं।
यदि रिकॉर्ड में ऐसा पर्याप्त सामग्री मौजूद है जिससे अपराध की संभावना दिखाई देती है, तो अदालत आरोप तय कर सकती है।
पहले मामले में धारा 308 लगाना सही
हाईकोर्ट ने कहा कि पहले मामले में एडीजे अदालत ने रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए पाया कि पीड़ित को शरीर के महत्वपूर्ण हिस्सों, विशेष रूप से सिर के हिस्सों में चोटें आई थीं।
मेडिकल रिपोर्ट भी अभियोजन के आरोपों का समर्थन करती है।
हाईकोर्ट ने कहा कि मानव शरीर के महत्वपूर्ण अंगों पर हमला किया जाना यह दर्शाता है कि आरोपी को अपने कृत्य के संभावित घातक परिणाम का ज्ञान था।
ऐसी स्थिति में धारा 308 आईपीसी (गैर-इरादतन हत्या का प्रयास) के तहत आरोप तय करना उचित माना जा सकता है।
इसलिए अदालत ने ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोप तय करने के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
दूसरे मामले में धारा 308 लगाने का आधार नहीं
दूसरे मामले में अदालत ने पाया कि शिकायतकर्ता को जो चोटें आई थीं, वे मुख्य रूप से हाथ और उंगलियों पर थीं और शरीर के किसी महत्वपूर्ण अंग पर गंभीर चोट नहीं थी।
मेडिकल रिपोर्ट से भी यह संकेत नहीं मिलता कि चोटें इतनी गंभीर थीं कि उनसे मृत्यु की संभावना बनती।
हाईकोर्ट ने कहा कि केवल गंभीर चोट लगना ही धारा 308 लगाने के लिए पर्याप्त नहीं है।
इस धारा के लिए यह भी आवश्यक है कि आरोपी के कृत्य से यह संकेत मिले कि उसे मृत्यु होने की संभावना का ज्ञान था।
चूंकि इस मामले में ऐसा कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिला, इसलिए ट्रायल कोर्ट द्वारा धारा 308 के तहत आरोप तय करने से इनकार करना सही माना गया।
हर क्रॉस-केस में समान धाराएं जरूरी नहीं
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में एक और महत्वपूर्ण सिद्धांत स्पष्ट किया कि केवल इसलिए कि किसी एक मामले में धारा 308 आईपीसी लगाई गई है, यह जरूरी नहीं कि उसी घटना से जुड़े दूसरे मामले में भी वही धारा लगाई जाए।
हर मामला अपने स्वतंत्र साक्ष्यों और परिस्थितियों के आधार पर तय किया जाता है।
इसलिए क्रॉस-केस में आरोपों की समानता को कानूनी सिद्धांत नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
हाईकोर्ट ने दोनों पुनरीक्षण याचिकाओं का निस्तारण करते हुए महत्वपूर्ण आदेश दिए।
हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि जिस मामले की सुनवाई मजिस्ट्रेट कोर्ट में चल रही है, उसे सत्र न्यायालय —एडीजे कोर्ट को सौंपा जाए ताकि दोनों मामलों की सुनवाई एक ही अदालत में हो सके।
कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि दोनों मामलों में साक्ष्य अलग-अलग दर्ज किए जाएंगे, लेकिन गवाहों के बयान लगभग एक ही समय में रिकॉर्ड किए जाएं।
साथ ही अदालत ने कहा कि दोनों मामलों के फैसले अलग-अलग होंगे, लेकिन यदि संभव हो तो उन्हें एक ही दिन सुनाया जाए, ताकि विरोधाभासी निष्कर्षों से बचा जा सके।