राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा-प्रारंभिक चरण में चार्जशीट रद्द करना न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर; आरोपों की जांच विभागीय कार्यवाही में ही होगी
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि विभागीय जांच की प्रारंभिक अवस्था में जारी चार्जशीट को सामान्यतः न्यायिक समीक्षा के दायरे में चुनौती नहीं दी जा सकती।
हाईकोर्ट ने कहा कि जब तक चार्जशीट अधिकार क्षेत्र से बाहर जारी न की गई हो या उसमें स्पष्ट रूप से कोई अवैधता न हो, तब तक अदालत को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
जस्टिस आनंद शर्मा की एकलपीठ ने राजाराम शर्मा की ओर से दायर दो रिट याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की और याचिकाकर्ता की मांग को खारिज कर दिया।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि आरोपों की सत्यता और तथ्यों की जांच का उचित मंच विभागीय जांच है, न कि रिट याचिका।
मामला क्या था
याचिकाकर्ता राजाराम शर्मा ने वर्ष 1994 में ड्रग इंस्पेक्टर के रूप में सेवा शुरू की थी और बाद में पदोन्नति पाकर 2017 में ड्रग कंट्रोलर बने। इसके बाद उन्हें ड्रग कंट्रोलर (प्रथम) और ड्रग कंट्रोलर (द्वितीय) का अतिरिक्त प्रभार भी दिया गया था।
चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद वह ड्रग कंट्रोलर के पद पर कार्यरत रहे।
विवाद उस समय उत्पन्न हुआ जब वर्ष 2020 में ड्रग सैंपलों के मामलों में अभियोजन से जुड़ी केंद्रीय सरकार की गाइडलाइंस पर विचार करने के लिए याचिकाकर्ता ने सात सदस्यीय समिति का गठन किया।
इस समिति ने 29 जून 2020 को अपनी रिपोर्ट दी, जिसे याचिकाकर्ता ने आगे केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) के माध्यम से ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (DCGI) को भेज दिया।
सरकार ने लगाए गंभीर आरोप
समिति गठन करने पर राज्य सरकार ने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता ने राज्य सरकार की अनुमति के बिना समिति गठित कर अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कार्य किया।
सरकार ने गंभीर आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता ने केंद्रीय सरकार की गाइडलाइंस में संशोधन जैसा प्रभाव उत्पन्न करने के लिए समिति बनाकर उसकी सिफारिशों को आगे बढ़ाया।
इसके अलावा आरोप लगाया गया कि उन्होंने सबस्टैंडर्ड दवाओं के मामलों में अभियोजन स्वीकृति देने की प्रक्रिया को प्रभावित किया और कुछ मामलों में अभियोजन स्वीकृति नहीं देकर दोषी निर्माताओं को लाभ पहुंचाने का प्रयास किया।
सरकार का कहना था कि यह आचरण सरकारी सेवा के नियमों के विपरीत है और यह कर्तव्य में लापरवाही तथा अधिकारों के दुरुपयोग की श्रेणी में आता है।
चार्जशीट और जांच अधिकारी
राज्य सरकार की अनुमति के बिना समिति गठित करने के चलते विभाग ने उनके खिलाफ दो अलग-अलग चार्जशीट जारी कर उन पर जांच अधिकारी की नियुक्ति की।
राजाराम शर्मा ने अपने खिलाफ जारी दो चार्जशीट और जांच अधिकारी की नियुक्ति को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में रिट याचिकाएं दायर कीं।
याचिकाकर्ता की दलीलें
याचिकाकर्ता ने राज्य सरकार द्वारा चार्जशीट देने और जांच अधिकारी नियुक्त करने को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में इसे पूरी तरह से अवैध और मनमानी बताया।
हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि याचिकाकर्ता ने किसी भी कानून या नियम का उल्लंघन नहीं किया। समिति का गठन केवल प्रशासनिक स्तर पर बेहतर निर्णय लेने और केंद्रीय गाइडलाइंस के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए किया गया था।
याचिकाकर्ता का यह भी कहना था कि चार्जशीट जारी करने में अत्यधिक देरी की गई।
आरोपित घटना वर्ष 2020 की थी, जबकि चार्जशीट सितंबर 2022 में जारी की गई। इसके बाद भी जांच अधिकारी नियुक्त करने में लगभग तीन वर्ष का समय लग गया।
उनका तर्क था कि इतनी लंबी और अनावश्यक देरी विभागीय कार्रवाई को अवैध बनाती है और इससे उन्हें गंभीर नुकसान हुआ है।
सरकार का विरोध
राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त सरकारी अधिवक्ता ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि चार्जशीट जारी करने की प्रक्रिया पूरी तरह से कानून के अनुसार हुई है।
सरकार ने अदालत को बताया कि जैसे ही अधिकारियों को समिति की रिपोर्ट और उससे संबंधित पत्राचार की जानकारी मिली, याचिकाकर्ता को जनवरी 2021 में कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। इसके बाद उनकी प्रतिक्रिया पर विचार करने के बाद ही चार्जशीट जारी करने का निर्णय लिया गया।
सरकार का यह भी कहना था कि जांच अधिकारी की नियुक्ति में हुई देरी के लिए याचिकाकर्ता स्वयं जिम्मेदार हैं, क्योंकि उन्होंने कई बार दस्तावेजों के निरीक्षण और अतिरिक्त रिकॉर्ड की मांग करते हुए प्रक्रिया को लंबा किया।
सरकार ने यह भी कहा कि केंद्र सरकार द्वारा ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 के तहत जारी दिशा-निर्देश बाध्यकारी हैं और राज्य का कोई अधिकारी उन्हें अपने स्तर पर बदलने या कमजोर करने का अधिकार नहीं रखता।
हाईकोर्ट का फैसला
हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि विभागीय कार्यवाही की प्रारंभिक अवस्था में अदालत को बहुत सीमित दायरे में ही हस्तक्षेप करना चाहिए।
हाईकोर्ट ने कहा कि चार्जशीट जारी होने मात्र से कर्मचारी के अधिकारों पर अंतिम प्रभाव नहीं पड़ता, क्योंकि आरोपों की सत्यता का निर्धारण विभागीय जांच में होना है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि चार्जशीट सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी की गई है और उसमें आरोपों का स्पष्ट विवरण दिया गया है, तो उसे प्रारंभिक चरण में रद्द नहीं किया जा सकता।
देरी के तर्क को भी नहीं माना
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल देरी के आधार पर विभागीय कार्रवाई को रद्द नहीं किया जा सकता, जब तक यह साबित न हो कि देरी से कर्मचारी को वास्तविक नुकसान हुआ है।
हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि मामले में पहले कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था और उसके बाद ही विभागीय कार्रवाई शुरू की गई। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि सरकार ने बिना कारण देरी की।
चार्जशीट में आरोप स्पष्ट
हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि चार्जशीट में लगाए गए आरोप स्पष्ट और विशिष्ट हैं। इसमें समिति के गठन, रिपोर्ट तैयार करने और उसे बिना अनुमति भेजने जैसे आरोपों का स्पष्ट उल्लेख किया गया है।
अदालत ने कहा कि यदि आरोप साबित होते हैं तो वे सरकारी सेवा आचरण नियमों के तहत कदाचार की श्रेणी में आ सकते हैं।
हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय
सभी तथ्यों और कानूनी सिद्धांतों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि इस चरण में विभागीय जांच में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं बनता।
अदालत ने दोनों रिट याचिकाओं को असमय और निराधार बताते हुए खारिज कर दिया और कहा कि याचिकाकर्ता को विभागीय जांच में अपने बचाव का पूरा अवसर मिलेगा।