टॉप स्टोरी

चर्चित खबरें

बकरी की हत्या के 37 साल पुराने मामले में राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: तकनीकी खामी के बावजूद नहीं होगा दोबारा ट्रायल, कहा-दोबारा ट्रायल से न्याय का उद्देश्य नहीं होगा पूरा

Rajasthan High Court Cracks Down on Obscene Social Media Content, Orders Instagram to Remove Private Images and Suspend Account

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने 37 साल पुराने एक आपराधिक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि केवल तकनीकी आधार पर दशकों पुराने विवाद को फिर से जीवित करना न्याय के उद्देश्य को पूरा नहीं करता।

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी मामले में लंबा समय बीत चुका हो और पुनः सुनवाई से न्याय के उद्देश्य की पूर्ति नहीं होती हो, तो अदालत अपने निहित (inherent) अधिकारों का उपयोग कर विवाद का अंत कर सकती है।

हाईकोर्ट ने इस मामले में माना कि निचली अदालत द्वारा किया गया समझौता कानूनी रूप से सही नहीं था, लेकिन घटना को हुए लगभग चार दशक बीत चुके हैं, इसलिए अब मामले को दोबारा खोलना उचित नहीं होगा।

इसी आधार पर अदालत ने राज्य सरकार की अपील को निस्तारित करते हुए आरोपी के खिलाफ चल रही पूरी आपराधिक कार्यवाही को समाप्त कर दिया।

जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने यह रिपोर्टेबल जजमेंट राज्य सरकार की ओर से दायर अपील पर दिया है।

क्या था पूरा मामला

मामले के अनुसार, वर्ष 1989 में पुलिस थाना सदर, बाड़मेर में एक एफआईआर दर्ज हुई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया कि कुछ बकरियों की हत्या कर दी गई, जो भूराराम नामक व्यक्ति की थीं।

इस मामले में पुलिस ने जांच कर आरोपी मूला राम के खिलाफ चालान पेश किया। इसके बाद मामला न्यायिक मजिस्ट्रेट बाड़मेर की अदालत में चला।

सुनवाई के दौरान रामाराम नामक व्यक्ति, जो इस मामले का प्रथम सूचक (First Informant) था, ने आरोपी के साथ समझौता कर लिया और अदालत में समझौते के आधार पर मुकदमा समाप्त करने का आवेदन प्रस्तुत किया।

निचली अदालत ने उस समझौते को स्वीकार करते हुए 2 जनवरी 1990 को आरोपी को बरी (acquit) कर दिया।

राज्य सरकार ने क्यों की अपील

राज्य सरकार ने इस आदेश को राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी।

सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया कि जिस व्यक्ति ने समझौता किया, वह कानूनी रूप से समझौता करने का पात्र (competent person) ही नहीं था।

क्योंकि जिन बकरियों की हत्या हुई थी, वे भूराराम की थीं, जबकि समझौता रामाराम ने किया था, जो केवल शिकायतकर्ता था।

दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 320 के अनुसार किसी अपराध में समझौता वही व्यक्ति कर सकता है जो उस संपत्ति का वास्तविक मालिक या प्रभावित व्यक्ति हो।

इसलिए राज्य सरकार ने कहा कि निचली अदालत द्वारा समझौते को स्वीकार करना कानून के अनुरूप नहीं था।

हाईकोर्ट ने क्या कहा

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में माना कि निचली अदालत द्वारा समझौते को स्वीकार करना तकनीकी रूप से कानून के अनुरूप नहीं था।

अदालत ने कहा कि चूंकि बकरियां भूराराम की थीं, इसलिए समझौता करने का अधिकार उसी के पास था।

हालांकि अदालत ने यह भी माना कि रामाराम भूराराम का सगा भाई था और बकरियां उसके खेत में चर रही थीं, लेकिन इसके बावजूद वह कानूनी रूप से समझौता करने का अधिकृत व्यक्ति नहीं था।

इस प्रकार मजिस्ट्रेट द्वारा आरोपी को बरी करने का आदेश कानूनी दृष्टि से पूरी तरह सही नहीं माना जा सकता।

फिर भी केस क्यों बंद किया गया

समझौते के गलत होने के बावजूद हाईकोर्ट ने कहा कि यह घटना 1989 की है और अब इस घटना को हुए 37 वर्ष से अधिक समय बीत चुका है।

जस्टिस फरजंद अली ने अपने फैसले में कहा कि इतने लंबे समय के बाद यदि मामले को दोबारा खोलकर ट्रायल करवाया जाता है तो इससे न्याय का कोई वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं होगा।

हाईकोर्ट ने कहा कि दशकों पुराने विवाद को पुनर्जीवित करना केवल पक्षकारों को अनावश्यक परेशानी और लंबी कानूनी प्रक्रिया में उलझाने जैसा होगा।

हाईकोर्ट ने कहा कि मामला मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय था और इसमें अधिकतम सजा भी सीमित अवधि की थी। ऐसे में 37 साल बाद नए सिरे से मुकदमा चलाना न्याय के हित में नहीं माना जा सकता।

विशेष शक्तियों का इस्तेमाल

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि संवैधानिक अदालत होने के नाते उसके पास ऐसी परिस्थितियों में न्याय सुनिश्चित करने के लिए अंतर्निहित (inherent) शक्तियां होती हैं।

इन शक्तियों का उपयोग तब किया जाता है जब कठोर कानूनी प्रक्रिया का पालन करने से न्याय के बजाय अनावश्यक विवाद और मुकदमेबाजी बढ़ने की संभावना हो।

हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में तकनीकी त्रुटि के बावजूद पूरे विवाद को समाप्त करना ही न्यायसंगत होगा।

अंतिम आदेश

इन परिस्थितियों को देखते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने अंतर्निहित अधिकारों का प्रयोग करते हुए पूरे आपराधिक मामले की कार्यवाही को रद्द (quash) कर दिया और राज्य सरकार की अपील का निपटारा कर दिया।

अदालत ने यह भी आदेश दिया कि आरोपी को आत्मसमर्पण करने की आवश्यकता नहीं है और यदि उसके द्वारा कोई जमानत बांड दिया गया है तो उसे भी समाप्त माना जाएगा।

सबसे अधिक लोकप्रिय