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चुनावी रंजिश के चलते आंखों में मिर्च डालकर किडनैप, फिर हत्या!” राजस्थान हाईकोर्ट ने मुख्य आरोपी की चौथी जमानत अर्जी को भी किया खारिज

“Chili Powder Kidnap & Murder Case: Rajasthan High Court Rejects Main Accused’s Fourth Bail Plea”

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक सनसनीखेज हत्या और अपहरण के मामले में सख्त रुख अपनाते हुए मुख्य आरोपी डालूराम को किसी भी तरह की राहत देने से साफ इनकार कर दिया है।

कोर्ट ने उसकी चौथी जमानत याचिका खारिज करते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि गंभीर अपराधों में कानून का दृष्टिकोण कठोर रहता है, खासकर जब आरोपी की भूमिका केंद्रीय और साक्ष्य मजबूत हों।

जस्टिस चन्द्रप्रकाश श्रीमाली ने हत्या के आरोपी की चौथी जमानत याचिका खारिज करते हुए यह आदेश दिया हैं.

यह मामला बाड़मेर जिले से जुड़ा है, याचिकाकर्ता पर आरोप है कि आरोपी डालूराम ने अपने साथियों के साथ मिलकर योजनाबद्ध तरीके से पीड़ित रेखाराम को पहले बुलाया, फिर उसकी आंखों में मिर्च डालकर उसे किडनैप किया और बाद में बेरहमी से उसकी हत्या कर दी।

कोर्ट ने क्यों नहीं दी राहत?

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि आरोपी की भूमिका इस पूरे घटनाक्रम में प्रमुख (मुख्य) है।

गवाहों के बयानों, कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) और बरामद साक्ष्यों से यह स्पष्ट रूप से सामने आता है कि आरोपी घटना में सीधे तौर पर शामिल था।

कोर्ट ने यह भी माना कि आरोपी के कब्जे से बरामद वस्तुएं—जैसे मिर्च पाउडर, हथियार और वाहन—उसकी संलिप्तता को और मजबूत करती हैं। इसके अलावा, गवाहों के बयानों में भी आरोपी की सक्रिय भूमिका का उल्लेख है, जिससे यह मामला और गंभीर हो जाता है।

“लंबी हिरासत जमानत का आधार नहीं”

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल यह तथ्य कि आरोपी लंबे समय से जेल में है, जमानत देने का पर्याप्त आधार नहीं बन सकता। विशेष रूप से तब, जब अपराध अत्यंत गंभीर हो और साक्ष्य आरोपी के खिलाफ स्पष्ट हों।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि इस मामले में ट्रायल में देरी का कारण खुद आरोपी द्वारा ली गई स्थगन (स्टे) कार्यवाही भी रही है। ऐसे में देरी का लाभ उठाकर जमानत की मांग करना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।

सह-आरोपियों को मिली जमानत का नहीं मिला लाभ

डालूराम की ओर से यह भी दलील दी गई थी कि अन्य सह-आरोपियों को पहले ही जमानत मिल चुकी है, इसलिए उसे भी समान राहत दी जानी चाहिए। लेकिन कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए स्पष्ट कहा कि हर आरोपी की भूमिका अलग-अलग होती है।

अदालत ने माना कि इस मामले में डालूराम की भूमिका अन्य आरोपियों की तुलना में अधिक गंभीर और प्रमुख है, इसलिए उसे समानता के आधार पर जमानत नहीं दी जा सकती।

अभियोजन पक्ष का मजबूत मामला

अभियोजन पक्ष ने अदालत के समक्ष यह तर्क रखा कि आरोपी ने सुनियोजित तरीके से वारदात को अंजाम दिया। पहले पीड़ित को बुलाना, फिर उसकी आंखों में मिर्च डालना, अपहरण करना और अंततः हत्या करना—ये सभी घटनाएं एक सोची-समझी साजिश की ओर इशारा करती हैं।

इसके अलावा, कॉल रिकॉर्ड्स से भी यह साबित होता है कि आरोपी घटना के समय घटनास्थल के आसपास मौजूद था। बरामद साक्ष्य और गवाहों के बयान अभियोजन के पक्ष को और मजबूत करते हैं।

हाईकोर्ट का आदेश

राजस्थान हाईकोर्ट ने आरोपी की चौथी जमानत याचिका को खारिज करते हुए कहा कि गंभीर आपराधिक मामलों में अदालतें बेहद सतर्क और कठोर दृष्टिकोण अपनाती हैं। जब किसी आरोपी के खिलाफ ठोस साक्ष्य मौजूद हों और उसकी भूमिका मुख्य हो, तब जमानत की संभावना काफी सीमित हो जाती है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित होने से बचाना जरूरी है और समाज में कानून के प्रति विश्वास बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

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