हाईकोर्ट ने कहा ‘ड्यूटी पर लौटने का नोटिस सेवा समाप्ति का आदेश नहीं’,बिना निर्धारित प्रक्रिया के कर्मचारी की सेवा समाप्त नहीं मान सकते
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने करीब 25 साल पुराने एक सेवा विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए बिजली कर्मचारी की विधवा को परिवार पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य बकाया सेवा परिलाभों के दावे पर राहत दी है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी स्थायी कर्मचारी की लंबे समय तक अनुपस्थिति मात्र से उसकी सेवा स्वतः समाप्त नहीं मानी जा सकती, जब तक कि नियमानुसार आवश्यक प्रक्रिया का पालन न किया गया हो।
हाईकोर्ट ने डिस्कॉम को आदेश दिया है कि वह मृतक कर्मचारी की विधवा के सभी दावों का नियमानुसार निर्धारण कर 60 दिन के भीतर देय राशि का भुगतान करे।
जस्टिस बिपिन गुप्ता की एकलपीठ ने मृतक कर्मचारी की विधवा मोहनी देवी याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए विभाग को परिवार पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य बकाया सेवानिवृत्ति लाभों की पात्रता निर्धारित करने के आदेश दिए।
1971 में हुई थी नियुक्ति, 1974 से कर्मचारी को मिला स्थायी दर्जा
मोहनी देवी के पति हीरा राम की नियुक्ति राजस्थान राज्य विद्युत मंडल में 1 अक्टूबर 1971 को हेल्पर-II के पद पर हुई थी।
हीराराम की सेवा को प्रारंभिक नियुक्ति से नियमित माना गया और 1 अप्रैल 1974 से स्थायी कर्मचारी का दर्जा दिया गया.
बाद में विभाग के अनुसार, हीरा राम 11 सितंबर 1990 से बिना अनुमति ड्यूटी से अनुपस्थित रहने लगा.
इस पर विभाग ने 18 जनवरी 1991 को उसे नोटिस जारी कर ड्यूटी पर लौटने के लिए कहा।
विभाग ने बाद में राजस्थान राज्य विद्युत मंडल (टेक्निकल वर्कमैन) सेवा विनियम, 1975 के विनियम 9(h) का हवाला देते हुए दावा किया कि आठ दिन से अधिक अनुपस्थित रहने के कारण मृतक की सेवा स्वतः समाप्त हो गई थी।
वहीं, याचिकाकर्ता मोहनीदेवी का पक्ष था कि हीरा राम की सेवा समाप्त करने का कोई वैध अंतिम आदेश कभी पारित नहीं किया गया।
केवल ड्यूटी पर लौटने के लिए जारी नोटिस को सेवा समाप्ति का आदेश नहीं माना जा सकता।
करंट लगने की घटना के बाद मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होने का दावा
याचिका में बताया गया कि वर्ष 1992 में हीरा राम के साथ करंट लगने की घटना हुई थी, जिसके बाद उनकी मानसिक स्थिति प्रभावित हुई।
बाद में 7 जून 2001 को उनका निधन हो गया।
पति की मृत्यु के बाद मोहनी देवी ने परिवार को मिलने वाले सेवा एवं पेंशन संबंधी लाभों के लिए विभाग से संपर्क किया।
इसी क्रम में उनके बेटे मोतराम ने मृतक आश्रित के रूप में अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया था, लेकिन विभाग ने 9 जून 2014 को देरी का आधार बताते हुए आवेदन अस्वीकार कर दिया।
विभाग ने 21 जुलाई 2014 को मोहनी देवी को 1,22,685 रुपये की जीपीएफ राशि का भुगतान किया, लेकिन परिवार पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों का भुगतान नहीं किया गया।
इसके बाद 4 अगस्त 2014 को कानूनी नोटिस भेजा गया और अंततः वर्ष 2015 में हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की गई।
याचिकाकर्ता की दलील- बिना प्रक्रिया अपनाए समाप्त नहीं की जा सकती सेवा
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जी.आर. पुनिया एवं अधिवक्ता मदन बेनीवाल ने पैरवी करते हुए दलील दी कि हीरा राम स्थायी कर्मचारी थे और विभाग ने उनकी सेवा समाप्त करने के लिए निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया।
अधिवक्ता ने कहा कि 18 जनवरी 1991 का नोटिस केवल ड्यूटी पर वापस लौटने का निर्देश था, न कि सेवा समाप्ति का अंतिम आदेश।
स्थायी कर्मचारी की सेवा समाप्त करने के लिए संबंधित सेवा विनियमों के तहत नोटिस अथवा उसके बदले वेतन देना और यदि अनुपस्थिति को कदाचार माना जाता है तो नियमानुसार अनुशासनात्मक प्रक्रिया अपनाना आवश्यक था।
वहीं, विभाग की ओर से अधिवक्ता विक्रम चौधरी ने दलील दी कि कर्मचारी 11 सितंबर 1990 से लगातार अनुपस्थित था।
उसे 18 जनवरी 1991 को नोटिस भी दिया गया, लेकिन वह ड्यूटी पर वापस नहीं लौटा।
विभाग के अनुसार, विनियम 9(h) के तहत उसकी सेवा स्वतः समाप्त हो गई थी और कर्मचारी ने अपने जीवनकाल में इस कार्रवाई को चुनौती भी नहीं दी थी।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी- ड्यूटी पर लौटने का नोटिस सेवा समाप्ति का आदेश नहीं
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कर्मचारी की नियुक्ति और स्थायी दर्जे को महत्वपूर्ण माना।
हाईकोर्ट ने सेवा विनियमों के प्रावधानों का विश्लेषण करते हुए कहा कि किसी स्थायी कर्मचारी के लंबे समय तक अनुपस्थित रहने के आरोप को अपने आप वैध सेवा समाप्ति नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि 18 जनवरी 1991 को जारी नोटिस में कर्मचारी को ड्यूटी पर लौटने के लिए कहा गया था और आगे की कार्रवाई की चेतावनी दी गई थी।
यह नोटिस अपने आप में सेवा समाप्ति का अंतिम आदेश नहीं था।
हाईकोर्ट के अनुसार, ड्यूटी पर वापस आने का निर्देश और कर्मचारी की सेवा समाप्त करने का आदेश, दोनों की प्रकृति तथा कानूनी परिणाम अलग-अलग हैं।
हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि विभाग ऐसा कोई अंतिम आदेश या रिकॉर्ड पेश नहीं कर सका, जिससे यह साबित हो कि हीरा राम की सेवा निर्धारित प्रक्रिया के तहत विधिवत समाप्त की गई थी।
स्थायी कर्मचारी को हटाने के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन जरूरी
राजस्थान हाईकोर्ट ने राजस्थान राज्य विद्युत मंडल (टेक्निकल वर्कमैन) सेवा विनियम, 1975 के विनियम 9(h), 18(a), 21(e) और 22(3) पर विचार किया।
कोर्ट ने कहा कि स्थायी कर्मचारी की सेवा समाप्त करने के लिए विनियम 18(a) के तहत निर्धारित नोटिस या उसके बदले वेतन संबंधी प्रक्रिया का पालन आवश्यक था।
यदि कर्मचारी की अनुपस्थिति को कदाचार माना जाता है, तो विनियम 21(e) और 22(3) के तहत आरोपों की जानकारी देकर उसे अपना पक्ष रखने का उचित अवसर देना भी जरूरी था।
हाईकोर्ट के अनुसार, इस मामले में ऐसी किसी विधिवत अनुशासनात्मक प्रक्रिया या अंतिम सेवा समाप्ति आदेश का रिकॉर्ड सामने नहीं आया।
परिवार पेंशन के दावे को केवल देरी के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता
हाईकोर्ट ने देरी और लापरवाही के आधार पर याचिका खारिज करने की विभागीय दलील पर भी विचार किया।
हाईकोर्ट ने कहा कि परिवार पेंशन एक आवर्ती प्रकृति का लाभ है। इसका भुगतान नहीं होने पर प्रत्येक महीने नया कारण उत्पन्न होता है।
इसलिए केवल इस आधार पर कि याचिका देर से दायर की गई है, परिवार पेंशन के दावे को खारिज नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जीपीएफ की राशि का भुगतान हो जाने मात्र से कर्मचारी के परिवार के अन्य सभी सेवा एवं पेंशन संबंधी लाभों का निपटारा नहीं माना जा सकता।
परिवार पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य सेवानिवृत्ति लाभ अलग-अलग मद हैं, जिनकी पात्रता का स्वतंत्र रूप से परीक्षण किया जाना आवश्यक है।
60 दिन में पात्रता तय कर भुगतान के आदेश
सभी पक्षों की बहस और दलीले सुनने के बाद हाईकोर्ट ने डिस्कॉम को आदेश दिया कि वह दिवगंत हीरा राम के सेवा रिकॉर्ड और लागू सेवा एवं पेंशन नियमों के अनुसार मोहनी देवी की परिवार पेंशन, ग्रेच्युटी तथा अन्य बकाया सेवा परिलाभों की पात्रता निर्धारित करे।
हाईकोर्ट ने कहा कि प्रत्येक मद के तहत देय राशि की गणना की जाए और पहले से भुगतान की गई 1,22,685 रुपये की जीपीएफ राशि को समायोजित किया जाए।
इसके बाद जो भी राशि नियमानुसार देय पाई जाए, उसका भुगतान आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने से 60 दिन के भीतर किया जाए।
हाईकोर्ट ने विलंब से भुगतान पर ब्याज देने की मांग के संबंध में भी विभाग को लागू नियमों और कानून के अनुसार निर्णय लेने के आदेश दिए। हालांकि, कोर्ट ने 24 प्रतिशत ब्याज देने का कोई स्वतः आदेश नहीं दिया।