जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि अदालत के आदेश का सहारा लेकर किसी कर्मचारी द्वारा अपनी मनचाही पोस्टिंग प्राप्त करने का प्रयास न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जाएगा।
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि प्रशासन ने अदालत के आदेश का पालन करते हुए कर्मचारी को ड्यूटी जॉइन करने का अवसर दिया है, तो केवल किसी विशेष स्थान पर पोस्टिंग की मांग के आधार पर अवमानना याचिका दायर करना उचित नहीं है।
जस्टिस प्रवीर भटनागर की एकलपीठ ने अलवर निवासी नमो नारायण वैद्य की ओर से दायर अवमानना याचिका को खारिज करते हुए उस पर 5000 रुपये का जुर्माना लगाया है।
हाईकोर्ट ने यह राशि तीन महीने के भीतर राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, जयपुर में जमा कराने के आदेश दिए हैं।
क्या है पूरा मामला
अलवर जिले के बानसूर तहसील के ग्राम श्यामपुरा निवासी नमो नारायण वैद्य ने राज्य सरकार के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के खिलाफ अवमानना याचिका दायर की थी।
याचिकाकर्ता का आरोप था कि हाईकोर्ट ने 30 जनवरी 2025 को अपने एक आदेश में उसे पुनः ड्यूटी जॉइन करने की अनुमति देने का निर्देश दिया था, लेकिन विभागीय अधिकारियों ने इस आदेश का पालन नहीं किया।
याचिकाकर्ता ने 3 फरवरी 2025 को एक अभ्यावेदन देकर सीएचसी नरेहड़ा (कोटपुतली) में ड्यूटी जॉइन करने की अनुमति मांगी थी। इसके बाद 4 फरवरी 2025 को भी संबंधित अधिकारी को आवेदन दिया।
याचिकाकर्ता का कहना था कि उसने कई बार विभाग को अभ्यावेदन देकर कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए जॉइनिंग की अनुमति मांगी, लेकिन अधिकारियों ने उसे काम पर नहीं लिया। इसी आधार पर उसने अदालत से अधिकारियों के खिलाफ अवमानना कार्रवाई करने की मांग की।
याचिका में दलीलें
याचिका में दलील दी गई कि राजस्थान हाईकोर्ट ने पूर्व में 30 जनवरी 2025 को पारित अपने आदेश में स्पष्ट रूप से निर्देश दिया था कि संबंधित विभागीय अधिकारी याचिकाकर्ता को पुनः अपनी ड्यूटी जॉइन करने की अनुमति दें।
इसके बावजूद अधिकारियों ने अदालत के आदेश का पालन नहीं किया, जिसके कारण याचिकाकर्ता को मजबूर होकर अवमानना याचिका दायर करनी पड़ी।
याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि अदालत के आदेश के बाद उसने विभाग को कई बार लिखित रूप से अवगत कराया और ड्यूटी जॉइन करने की इच्छा जताई।
विशेष रूप से उसने 3 फरवरी 2025 को एक अभ्यावेदन प्रस्तुत कर सीएचसी नरेहड़ा (कोटपुतली) में जॉइनिंग की अनुमति देने का अनुरोध किया था।
इसके बाद 4 फरवरी 2025 को भी उसने संबंधित अधिकारी को एक और आवेदन देकर उसी स्थान पर जॉइन करने की अनुमति मांगी।
याचिकाकर्ता का कहना था कि उसने अदालत के आदेश की प्रति के साथ कई बार विभागीय अधिकारियों से संपर्क किया, लेकिन इसके बावजूद उसे जॉइनिंग नहीं दी गई।
याचिका में आरोप लगाया गया कि अधिकारियों ने अदालत के आदेश की अनदेखी की और जानबूझकर उसे काम पर नहीं लिया।
याचिकाकर्ता के अनुसार, अदालत के आदेश के बाद भी यदि उसे जॉइनिंग नहीं दी जाती है, तो यह स्पष्ट रूप से अदालत के आदेश की अवमानना है। इसी आधार पर याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की कि संबंधित अधिकारियों के खिलाफ Contempt of Courts Act के तहत कार्रवाई की जाए।
सरकार की ओर से दलीलें
सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता के आरोप तथ्यात्मक रूप से सही नहीं हैं। अदालत के 30 जनवरी 2025 के आदेश के बाद विभाग ने आवश्यक कार्रवाई की थी।
सरकारी पक्ष के अनुसार 3 फरवरी 2025 को एक कार्यालय आदेश जारी किया गया था, जिसमें याचिकाकर्ता को विधानसभा स्थित सरकारी अस्पताल में डीडीसी हेल्पर के पद पर रिपोर्ट करने के निर्देश दिए गए थे।
इसके बावजूद याचिकाकर्ता ने वहां जॉइन नहीं किया, जिस पर बाद में उसे कारण बताओ नोटिस भी जारी किया गया।
सरकार ने कहा कि इसके बाद भी उसने ड्यूटी जॉइन नहीं की।
सरकार ने यह भी बताया कि बाद में विधानसभा में डीडीसी हेल्पर का पद समाप्त कर दिया गया था और 15 दिसंबर 2025 को उसे फिर से आदेश जारी कर कोटपुतली-बहरोड़ में डीडीसी हेल्पर के रूप में जॉइन करने का आदेश दिया गया था।
सरकारी पक्ष का कहना था कि प्रशासन ने अदालत के आदेश का पालन करते हुए याचिकाकर्ता को काम पर आने के अवसर दिए थे, लेकिन वह केवल अपनी पसंद के स्थान पर पोस्टिंग चाहता था।
हाईकोर्ट का फैसला
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और पेश किए गए रिकॉर्ड का अध्ययन करने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि 30 जनवरी 2025 के आदेश में केवल यह कहा गया था कि याचिकाकर्ता को अपनी ड्यूटी फिर से जॉइन करने की अनुमति दी जाए।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि उस आदेश में किसी विशेष स्थान पर पोस्टिंग देने का कोई निर्देश नहीं था।
कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता को विधानसभा स्थित अस्पताल में डीडीसी हेल्पर के पद पर जॉइन करने के लिए कहा गया था।
बाद में उसे कोटपुतली-बहरोड़ में भी जॉइन करने का अवसर दिया गया, इसके बावजूद उसने बार-बार केवल सीएचसी कोटपुतली में ही पोस्टिंग की मांग की।
हाईकोर्ट ने माना कि यह व्यवहार यह दर्शाता है कि याचिकाकर्ता केवल अपनी पसंद की जगह पर पोस्टिंग चाहता था और उसी उद्देश्य से अदालत की प्रक्रिया का उपयोग कर रहा था।
न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग माना
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा दायर अवमानना याचिका से यह स्पष्ट होता है कि वह अधिकारियों पर दबाव बनाकर अपनी मनचाही जगह पर पोस्टिंग करवाना चाहता था।
अदालत ने कहा कि इस प्रकार की याचिका न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग (Abuse of Legal Process) है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि जब प्रशासन ने अदालत के आदेश का पालन करते हुए कर्मचारी को ड्यूटी जॉइन करने का अवसर दिया था, तब अवमानना का प्रश्न ही नहीं उठता।
याचिका खारिज, जुर्माना लगाया
मामले के तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने अवमानना याचिका को खारिज कर दिया। साथ ही अदालत ने याचिकाकर्ता पर 5000 रुपये का जुर्माना लगाया।
अदालत ने आदेश दिया कि यह राशि तीन महीने के भीतर राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, जयपुर के कार्यालय में जमा कराई जाए। यदि निर्धारित अवधि में राशि जमा नहीं कराई जाती है, तो प्राधिकरण कानून के अनुसार इसकी वसूली कर सकता है।