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किरायेदारी को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: जरूरत अत्यावश्यक होना जरूरी नहीं, वास्तविक होना जरूरी, किरायेदार को 6 माह में दुकान खाली करने का आदेश

Rajasthan High Court Dismisses Landlord’s Plea, Says Bona Fide Need Must Be Proven with Evidence

जयपुर, 18 मार्च 2026।राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने किरायेदारी विवाद से जुड़े एक अहम मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए मकान मालिक के अधिकारों को प्राथमिकता दी है।

अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि यदि मकान मालिक की आवश्यकता वास्तविक (bona fide) है, तो वह बेदखली का पर्याप्त आधार है, चाहे वह अत्यंत आपातकालीन क्यों न हो।

जस्टिस बिपिन गुप्ता की एकलपीठ ने कोटा निवासी मकान मालिक प्रताप सिंह हाड़ा की याचिका को मंजूर करते हुए अपीलीय रेंट ट्रिब्यूनल के आदेश को निरस्त कर दिया और रेंट ट्रिब्यूनल द्वारा पारित बेदखली आदेश को बहाल कर दिया।

कोर्ट ने क्या कहा?

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि कानून केवल मकान मालिक ही नहीं, बल्कि किरायेदार के हितों की भी रक्षा करता है।

कोर्ट ने कहा कि यदि मकान मालिक bona fide आवश्यकता के आधार पर किरायेदार को बेदखल करता है और तीन वर्षों के भीतर उसी संपत्ति को किसी अन्य व्यक्ति को किराए पर दे देता है, तो पूर्व किरायेदार को पुनः कब्जा प्राप्त करने का अधिकार रहेगा।

कोर्ट ने यह भी दोहराया कि मकान मालिक की आवश्यकता “अत्यावश्यक” होना जरूरी नहीं है। यदि वह वास्तविक और ईमानदार है, तो वह बेदखली का पर्याप्त आधार बन सकती है।

क्या है पूरा मामला

मकान मालिक ने राजस्थान रेंट कंट्रोल एक्ट, 2001 के तहत याचिका दायर कर यह दावा किया था कि उसे अपने बेटों के लिए दुकान की आवश्यकता है, ताकि वे अपना व्यवसाय शुरू कर सकें।

उनकी ओर से अधिवक्ता संग्राम सिंह सोलंकी ने अदालत में दलील दी कि परिवार की जरूरत को ध्यान में रखते हुए दुकान खाली कराना आवश्यक है।

वहीं, किरायेदार की ओर से अधिवक्ता सरांश सैनी और विनोद कुमार शर्मा ने इसका विरोध करते हुए कहा कि यह आवश्यकता वास्तविक नहीं है और मकान मालिक के पास पहले से ही वैकल्पिक व्यवस्था मौजूद है।

ट्रिब्यूनल से हाईकोर्ट तक का सफर

इस मामले में पहले रेंट ट्रिब्यूनल ने मकान मालिक के पक्ष में फैसला देते हुए बेदखली का आदेश दिया था।

हालांकि, अपीलीय रेंट ट्रिब्यूनल ने इस फैसले को पलटते हुए कहा कि मकान मालिक ‘बोनाफाइड आवश्यकता’ साबित करने में असफल रहा है और याचिका खारिज कर दी।

इसके बाद मकान मालिक ने हाईकोर्ट में इस आदेश को चुनौती दी।

हाईकोर्ट में क्या हुआ

मकान मालिक प्रताप सिंह हाड़ा की ओर से अधिवक्ता संग्राम सिंह सोलंकी ने अदालत में यह तर्क रखा कि विवादित दुकान की आवश्यकता पूरी तरह से वास्तविक (Bona Fide) है।

उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता के दो बेटे हैं, जो अपना व्यवसाय शुरू करना चाहते हैं। दुकान की आवश्यकता विशेष रूप से ऑटो पार्ट्स और अन्य व्यापारिक गतिविधियों के लिए है।

अधिवक्ता ने कहा कि रेंट ट्रिब्यूनल ने साक्ष्यों के आधार पर इस आवश्यकता को सही माना था और बेदखली का आदेश दिया था।

अपीलीय ट्रिब्यूनल ने तथ्यों को गलत तरीके से समझते हुए उस आदेश को पलट दिया, जो कि कानून के विपरीत है।

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि पहले बेची गई दुकानों का वर्तमान आवश्यकता से कोई संबंध नहीं है, क्योंकि वे लेन-देन पुराने समय के हैं।

एक बेटे की आवश्यकता पूरी हो जाने से दूसरे बेटे की जरूरत समाप्त नहीं हो जाती।

मकान मालिक को यह अधिकार है कि वह अपनी संपत्ति का उपयोग अपनी सुविधा और जरूरत के अनुसार करे, इसमें किरायेदार हस्तक्षेप नहीं कर सकता।

किरायेदार का पक्ष

किरायेदार राजकुमार झांब की ओर से अधिवक्ता सरांश सैनी और विनोद कुमार शर्मा ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि मकान मालिक की बताई गई आवश्यकता वास्तविक नहीं है, बल्कि केवल बहाना है।

अधिवक्ता ने कहा कि मकान मालिक के पास पहले से ही अन्य दुकानें और वैकल्पिक स्थान उपलब्ध हैं। एक दुकान पहले ही खाली कराकर बेटे को दे दी गई, जहां वह व्यवसाय (आइसक्रीम पार्लर) चला रहा है।

इससे स्पष्ट होता है कि अतिरिक्त दुकान की कोई तत्काल आवश्यकता नहीं है।

अधिवक्ता ने यह भी दलील दी कि मकान मालिक ने पहले कुछ दुकानों को बेच दिया, जिससे उसकी ‘तत्काल जरूरत’ पर संदेह उत्पन्न होता है।

अन्य किरायेदारों के साथ समझौते किए गए, जो यह दर्शाते हैं कि आवश्यकता उतनी गंभीर नहीं थी।

अधिवक्ता ने कहा कि ‘बोनाफाइड आवश्यकता’ साबित करने के लिए केवल दावा पर्याप्त नहीं है, बल्कि ठोस साक्ष्य जरूरी हैं।

अपीलीय रेंट ट्रिब्यूनल ने साक्ष्यों का सही मूल्यांकन करते हुए ही मकान मालिक की याचिका खारिज की थी।

हाईकोर्ट का फैसला

हाईकोर्ट ने अपीलीय ट्रिब्यूनल के फैसले को “विकृत” (perverse) और कानून के खिलाफ बताया। अदालत ने कहा कि अपीलीय ट्रिब्यूनल ने साक्ष्यों का गलत आकलन किया और तथ्यों को गलत तरीके से पढ़ा।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि एक बेटे की आवश्यकता पूरी हो जाती है, तो इसका मतलब यह नहीं कि दूसरे बेटे की जरूरत समाप्त हो गई

रेंट ट्रिब्यूनल आदेश पुनः बहाल

न्यायालय ने पाया कि रेंट ट्रिब्यूनल ने साक्ष्यों के आधार पर याचिकाकर्ता के पुत्र की व्यवसाय शुरू करने की जरूरत को सही माना था और उसी आधार पर बेदखली का आदेश दिया था।

लेकिन अपीलीय रेंट ट्रिब्यूनल ने तथ्यों का गलत मूल्यांकन करते हुए इस आदेश को पलट दिया, जो कि गंभीर त्रुटि थी।

हाईकोर्ट ने अपीलीय रेंट ट्रिब्यूनल के आदेश को गलत ठहराते हुए रद्द कर दिया और रेंट ट्रिब्यूनल द्वारा पारित बेदखली आदेश को पुनः बहाल कर दिया।हाईकोर्ट ने कहा कि अपीलीय ट्रिब्यूनल का निर्णय न केवल तथ्यों के विपरीत है, बल्कि विधि के भी खिलाफ है और इसे “विकृत” (perverse) माना गया। ऐसे में संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हस्तक्षेप करना आवश्यक था।

इसी आधार पर कोर्ट ने 06 अक्टूबर 2016 के अपीलीय आदेश को निरस्त करते हुए 22 सितंबर 2015 के रेंट ट्रिब्यूनल के आदेश को बहाल कर दिया।

किरायेदार को 6 माह का समय

हालांकि, न्यायालय ने संतुलन बनाते हुए किरायेदार को राहत भी दी और उसे दुकान खाली करने के लिए 6 महीने का समय प्रदान किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह प्रावधान राजस्थान रेंट कंट्रोल एक्ट, 2001 की धारा 15(8) के अनुरूप है, जिसमें वाणिज्यिक संपत्तियों के मामलों में बेदखली आदेश के निष्पादन पर 6 माह की मोहलत दी जाती है।

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