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We The People (हम लोग) NGO पर 5 लाख रुपये का जुर्माना, विश्व प्रसिद्ध जाडन ओम आश्रम विवाद में दखल देने वाली याचिका खारिज

Rajasthan High Court Dismisses NGO Plea in Jadan Om Ashram Dispute, Imposes ₹5 Lakh Cost

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक अहम और सख्त फैसले में देश और दुनिया में प्रसिद्ध हुए पाली जिले के जाडन स्थित ओम आश्रम के संपत्ति विवाद से जुड़े मामले में दायर आपराधिक रिट याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता NGO पर 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने We The People (Ham Log) Sansthan द्वारा बिना ठोस आधार के लगाए गए गंभीर आरोप और तीसरे पक्ष द्वारा आपराधिक मामलों में हस्तक्षेप को न्याय प्रक्रिया के साथ खिलवाड़ बताते हुए एनजीओ को फटकार लगाई है।

जस्टिस मुनुरी लक्ष्मण की एकलपीठ ने यह आदेश संस्था की ओर से दायर याचिका को खारिज करते हुए दिया है।

यह मामला We The People (हम लोग) संस्थान द्वारा दायर किया गया था, जिसमें जाडन के ओम आश्रम में कथित रूप से विदेशी नागरिकों के अवैध निवास, दर्ज FIRs की सही जांच न होने और 81 वर्षीय संत स्वामी महेश्वरानंद की सुरक्षा व स्वास्थ्य को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए थे।

गौरतलब है कि We The People (हम लोग) संस्थान एक गैर-सरकारी संगठन है, जिसकी उपाध्यक्ष मंजू सुराना के जरिए राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी।

स्वामी को नशीले पदार्थ देने का आरोप

याचिकाकर्ता संस्था की ओर से अदालत में यह गंभीर आरोप लगाया गया कि स्वामी जी को नशीले पदार्थ दिए जा रहे हैं और आश्रम में अवैध गतिविधियों के कारण उनकी तबीयत बिगड़ रही है।

इन आरोपों को गंभीरता से लेते हुए हाईकोर्ट ने एक मेडिकल बोर्ड का गठन किया, ताकि स्वामी जी की वास्तविक स्थिति सामने आ सके।

मेडिकल रिपोर्ट ने तोड़े आरोपों के आधार

मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया कि स्वामी महेश्वरानंद उम्र से जुड़ी सामान्य बीमारियों से पीड़ित हैं और उन्हें नियमित चिकित्सा उपचार दिया जा रहा है।

रिपोर्ट में कहीं भी ‘ड्रगिंग’ या किसी प्रकार की संदिग्ध गतिविधि का कोई संकेत नहीं मिला।

हालांकि रिपोर्ट में यह जरूर उल्लेख किया गया कि स्वामी जी को expressive aphasia और cognitive dysfunction जैसी समस्याएं हैं, जो उम्र से संबंधित हैं, लेकिन कोई न्यूरोलॉजिकल या मानसिक असामान्यता नहीं पाई गई।

तीसरे पक्ष को हस्तक्षेप का अधिकार नहीं

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि जिन FIRs की जांच को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं, उनके वास्तविक शिकायतकर्ता कोर्ट के सामने उपस्थित नहीं हैं।

ऐसे में एक NGO, जो इस मामले की प्रत्यक्ष पक्षकार नहीं है, उसे आपराधिक कार्यवाही में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं दिया जा सकता।

अदालत ने कहा कि यदि जांच में किसी प्रकार की गड़बड़ी है, तो संबंधित शिकायतकर्ता को ही उचित मंच पर अपनी बात रखनी चाहिए, न कि कोई तीसरा पक्ष इसमें दखल दे।

अनियमितताओं के आरोप भी साबित नहीं

याचिका में आश्रम में वित्तीय अनियमितताओं का भी आरोप लगाया गया था, लेकिन कोर्ट ने पाया कि इन आरोपों के समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य रिकॉर्ड पर नहीं है।

उल्टा, याचिकाकर्ता के ही दस्तावेजों से यह स्पष्ट होता है कि आश्रम एक विधिवत ट्रस्ट के तहत संचालित हो रहा है।

कोर्ट ने लगाई 5 लाख की लागत

इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि यह याचिका misconceived यानी गलत आधार पर दायर की गई है और इसे खारिज किया जाता है।

साथ ही, याचिकाकर्ता संस्था पर 5 लाख रुपये की लागत (जुर्माना) लगाते हुए यह राशि राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, जोधपुर को जमा कराने का आदेश दिया गया।

मुख्य याचिका खारिज होने के साथ ही इस मामले में पक्षकार बनाए जाने के लिए दायर अन्य सभी आवेदन भी स्वतः निरस्त कर दिए गए।

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