जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने बीकानेर जिले की नोक्हा नगर पालिका के वार्ड पुनर्गठन को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट कर दिया कि चुनावी प्रक्रिया से जुड़े परिसीमन मामलों में अदालत का हस्तक्षेप बेहद सीमित है।
हाईकोर्ट ने कहा कि एक बार वार्डों के पुनर्गठन की प्रक्रिया कानून के तहत पूरी हो जाए और अंतिम अधिसूचना जारी हो जाए, तो उसे अदालत में चुनौती देना संवैधानिक प्रावधानों के विपरीत माना जाएगा।
डॉ. जस्टिस पुष्पेन्द्र सिंह भाटी और जस्टिस संदीप शाह की खंडपीठ ने विकास मंच और सुखाराम भादू की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला दिया है।
हाईकोर्ट ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 243ZG नगर निकाय चुनावों से जुड़े परिसीमन मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप पर स्पष्ट रोक लगाता है।
ये है मामला
मामला बीकानेर जिले की नगर पालिका नोक्हा के वार्डों के पुनर्गठन से जुड़ा हुआ था।
विकास मंच नामक पंजीकृत राजनीतिक दल और सामाजिक कार्यकर्ता सुखाराम भादू ने याचिका दायर कर राज्य सरकार द्वारा 1 सितंबर 2025 को जारी अधिसूचना को चुनौती दी थी, जिसे 15 सितंबर 2025 को राजपत्र में प्रकाशित किया गया था।
इस अधिसूचना के जरिए नोक्हा नगर पालिका के वार्डों का पुनर्गठन और सीमांकन किया गया था।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि यह पूरी प्रक्रिया राजस्थान नगरपालिकाएं अधिनियम, 2009 के प्रावधानों के खिलाफ है और इसमें जनसंख्या के आधार पर संतुलन नहीं रखा गया।
नोक्हा नगर पालिका में 45 वार्ड
रिकॉर्ड के अनुसार नोक्हा नगर पालिका की स्थापना वर्ष 1952 में हुई थी। पहले यहां 35 वार्ड थे, लेकिन वर्ष 2019–2020 में परिसीमन प्रक्रिया के बाद वार्डों की संख्या बढ़ाकर 45 कर दी गई।
इसके बाद वर्ष 2021 में नगर पालिका चुनाव भी इसी व्यवस्था के तहत कराए गए थे।
बाद में राज्य सरकार ने फरवरी 2025 में नगर निकायों के वार्ड पुनर्गठन के लिए नए दिशा-निर्देश जारी किए थे, जिसके बाद यह नया सीमांकन किया गया।
याचिकाकर्ताओं की दलील
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में कहा गया कि वार्डों का पुनर्गठन मनमाने तरीके से किया गया है और इसमें कई गंभीर खामियां हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि वार्डों का सीमांकन जनसंख्या संतुलन के आधार पर नहीं किया गया और कई क्षेत्रों को बिना स्पष्ट कारण अलग-अलग वार्डों में शामिल कर दिया गया।
दलील दी गई कि अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ा वर्ग और महिलाओं के लिए आरक्षण तय करते समय निर्धारित नियमों का पालन नहीं किया गया।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि इससे चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है।
राज्य सरकार का पक्ष
राज्य सरकार की ओर से अदालत में कहा गया कि यह याचिका सुनवाई योग्य ही नहीं है, क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 243ZG के तहत वार्ड परिसीमन से जुड़े मामलों में अदालत हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
सरकार ने तर्क दिया कि चुनावी प्रक्रिया को बाधित होने से बचाने के लिए संविधान में यह प्रावधान किया गया है।
सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि वार्डों के पुनर्गठन की प्रक्रिया पूरी तरह राजस्थान नगरपालिकाएं अधिनियम, 2009 के प्रावधानों के तहत की गई है।
धारा 6 और धारा 10 पर कोर्ट की बड़ी व्याख्या
मामले में राजस्थान नगरपालिकाएं अधिनियम, 2009 की धारा 6 और धारा 10 की व्याख्या भी अहम रही।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 6 नगर पालिका में वार्डों की संख्या और संरचना तय करने से संबंधित है।
जबकि धारा 10 उन वार्डों की सीमाएं और क्षेत्रीय संरचना तय करने का अधिकार देती है।
कोर्ट ने कहा कि धारा 10 के तहत वार्डों की सीमाएं तय करने के लिए नई जनगणना का इंतजार करना जरूरी नहीं है और सरकार प्रशासनिक जरूरतों के अनुसार यह फैसला ले सकती है।
पहले की अधिसूचना को चुनौती नहीं
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि 22 नवंबर 2024 को जारी अधिसूचना के जरिए नगर पालिका के वार्डों की संरचना पहले ही तय कर दी गई थी।
याचिकाकर्ताओं ने उस अधिसूचना को चुनौती नहीं दी थी और वह अंतिम रूप ले चुकी है। ऐसे में बाद में वार्डों की सीमाएं तय करने वाली अधिसूचना को चुनौती देना कानूनन उचित नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट का अंतिम फैसला
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि वार्ड पुनर्गठन की प्रक्रिया कानून के तहत की गई है और इसमें कोई स्पष्ट अवैधता या अधिकार क्षेत्र से बाहर कार्रवाई नहीं दिखाई देती।
कोर्ट ने कहा कि चुनावी प्रक्रिया से जुड़े मामलों में न्यायालय को संयम बरतना चाहिए।
हाईकोर्ट ने मामले में दायर याचिका को खारिज कर दिया।