हाईकोर्ट ने कहा-धारा 11ए के तहत चांसलर को कार्रवाई का अधिकार, जांच रिपोर्ट और सुनवाई के बाद ही हुई बर्खास्तगी, हस्तक्षेप का आधार नहीं
जयपुर। महाराजा सूरजमल बृज विश्वविद्यालय, भरतपुर के कुलपति पद से प्रोफेसर रमेश चंद्र को हटाने से जुड़े बहुचर्चित मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए राज्यपाल के आदेश को बरकरार रखा हैं.
राजस्थन हाईकोर्ट जयपुर पीठ में जस्टिस आनंद शर्मा की एकलपीठ ने कुलपति की बर्खास्तगी और निलंबन को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि कुलाधिपति (चांसलर) ने विधिसम्मत प्रक्रिया अपनाते हुए जांच समिति की रिपोर्ट और सुनवाई का अवसर देने के बाद ही कार्रवाई की थी।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि विश्वविद्यालय अधिनियम की धारा 11-ए के तहत कुलाधिपति को कुलपति को पद से हटाने की वैधानिक शक्ति प्राप्त है।
समीक्षा का दायरा प्रक्रिया की वैधता तक
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायिक समीक्षा का दायरा केवल निर्णय प्रक्रिया की वैधता तक सीमित होता है, न कि तथ्यों के पुनर्मूल्यांकन तक।
कोर्ट ने कहा कि चूंकि प्रक्रिया में कोई स्पष्ट अवैधता, पक्षपात या दुर्भावना सिद्ध नहीं हुई, इसलिए न्यायालय के हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।
हाईकोर्ट ने 28 मार्च 2025 को जारी निलंबन आदेश तथा 11 नवंबर 2025 को पारित बर्खास्तगी आदेश दोनों को वैध ठहराते हुए प्रोफेसर रमेश चंद्र की याचिका को खारिज कर दिया।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि कुलपति सामान्य कर्मचारी नहीं बल्कि एक वैधानिक पदाधिकारी होते हैं, जिनकी नियुक्ति और हटाने की प्रक्रिया विशेष अधिनियम द्वारा नियंत्रित होती है, इसलिए उनके मामले में लागू प्रक्रिया भी अलग होती है।
ये हैं मामला
अदालत के समक्ष प्रस्तुत तथ्यों के अनुसार प्रोफेसर रमेश चंद्र को 8 मार्च 2023 को महाराजा सूरजमल बृज विश्वविद्यालय, भरतपुर का कुलपति नियुक्त किया गया था।
बाद में शिकायतों और प्रारंभिक जांच के आधार पर 28 मार्च 2025 को उन्हें निलंबित किया गया और विस्तृत जांच के बाद 11 नवंबर 2025 को पद से हटा दिया गया।
सरकार की दलीलें
याचिका का विरोध करते हुए राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता राजेंद्र प्रसाद ने अदालत को बताया कि कुलपति के खिलाफ वित्तीय अनियमितताओं, अधिकारों के दुरुपयोग तथा प्रशासनिक लापरवाही से संबंधित गंभीर शिकायतें प्राप्त हुई थीं।
सरकार ने कहा कि प्रारंभिक जांच में आरोप प्रथम दृष्टया सही पाए जाने के बाद उन्हें निलंबित किया गया। इसके बाद एक विस्तृत जांच समिति गठित की गई, जिसने विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की। उसी रिपोर्ट के आधार पर कुलाधिपति ने उन्हें पद से हटाने का निर्णय लिया।
सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि पूरी प्रक्रिया महाराजा सूरजमल बृज विश्वविद्यालय अधिनियम-2012 की धारा 11-ए के तहत अपनाई गई थी और याचिकाकर्ता को विधिसम्मत अवसर प्रदान किया गया।
महाधिवक्ता ने कहा कि जांच रिपोर्ट की प्रति उन्हें दी गई, लिखित जवाब दाखिल करने का मौका दिया गया और व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर भी उपलब्ध कराया गया। इसलिए यह कहना सही नहीं है कि उन्हें बिना सुनवाई हटाया गया।
याचिकाकर्ता कुलपति की दलीलें
याचिकाकर्ता प्रोफेसर रमेश चंद्र ने अपनी याचिका में निलंबन और बर्खास्तगी दोनों आदेशों को अवैध, मनमाना और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध बताया था।
अधिवक्ता ने कहा कि उन्हें हटाने से पहले विधिसम्मत और पर्याप्त सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया तथा जांच प्रक्रिया में कई प्रक्रियात्मक त्रुटियां थीं।
याचिका में कहा गया कि अदालत से दोनों आदेशों को निरस्त कर उन्हें पद पर बहाल करने की मांग की थी।
हाईकोर्ट का फैसला
मामले में एकलपीठ ने दोनो पक्षों की बहस सुनने के बाद निष्कर्ष निकाला कि जांच प्रक्रिया विधिसम्मत थी और कुलाधिपति ने उपलब्ध सामग्री के आधार पर निर्णय लिया।
हाईकोर्ट ने कहा कि जब तक निर्णय प्रक्रिया में स्पष्ट कानूनी त्रुटि या दुर्भावना सिद्ध न हो, तब तक न्यायालय प्रशासनिक निर्णयों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता।