जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर पीठ ने निजी शिक्षण संस्थान में सेवा समाप्ति से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि निजी अनुबंध से उत्पन्न सेवा विवादों को सीधे रिट याचिका के माध्यम से चुनौती नहीं दी जा सकती।
हाईकोर्ट ने कहा कि जब तक किसी मामले में स्पष्ट रूप से ‘पब्लिक लॉ एलिमेंट’ या वैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन न हो, तब तक अनुच्छेद 226 के तहत हस्तक्षेप संभव नहीं है।
जस्टिस प्रवीर भटनागर की एकल पीठ ने यह रिपोर्टेबल जजमेंट Atal Khandelwal की ओर से दायर याचिका को खारिज करते हुए दिया है।
क्या था मामला
याचिकाकर्ता अतुल खंडेलवाल ने 19 जुलाई 2008 को जारी सेवा समाप्ति आदेश को चुनौती देते हुए पुनर्बहाली (reinstatement) और समस्त परिणामी लाभ देने की मांग की थी।
उनका तर्क था कि प्रतिवादी संस्था—इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ मैनेजमेंट रिसर्च—सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रबंधन के क्षेत्र में कार्य करती है और सार्वजनिक दायित्व निभाती है, इसलिए इसे संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत ‘स्टेट’ या ‘अन्य प्राधिकरण’ की श्रेणी में माना जाना चाहिए।
याचिकाकर्ता की दलील
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि Institute of Health Management Research सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रबंधन और नीति समर्थन के क्षेत्र में कार्यरत है। अतः यह केवल एक निजी संस्था नहीं बल्कि सार्वजनिक दायित्व (public duty) निभाने वाली संस्था है।
अधिवक्ता ने कहा कि जब कोई संस्था सार्वजनिक कार्य करती है, तो उसे संविधान के अनुच्छेद 12 के अंतर्गत ‘State’ या ‘Other Authority’ माना जा सकता है और वह रिट अधिकार क्षेत्र के अधीन आती है।
याचिकाकर्ता ने कहा कि अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट का अधिकार क्षेत्र अनुच्छेद 32 से अधिक व्यापक है। हाईकोर्ट ‘किसी भी व्यक्ति या प्राधिकरण’ के विरुद्ध रिट जारी कर सकता है—सिर्फ मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन हेतु ही नहीं, बल्कि ‘किसी अन्य उद्देश्य’ के लिए भी।
याचिकाकर्ता ने Andi Mukta Sadguru, Janet Jeyapaul, Zee Telefilms और Federal Bank जैसे मामलों का हवाला देते हुए कहा कि यदि संस्था सार्वजनिक कार्य कर रही हो तो उसके विरुद्ध रिट याचिका विचारणीय है।
याचिकाकर्ता ने 19.07.2008 के सेवा समाप्ति आदेश को मनमाना बताते हुए पुनर्बहाली (reinstatement) और समस्त परिणामी लाभ दिलाने की मांग की।
संस्था की दलील
प्रतिवादी संस्था की ओर से कहा गया कि संस्था सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत पंजीकृत है, न कि कोई वैधानिक (statutory) निकाय। अतः यह अनुच्छेद 12 के तहत ‘State’ नहीं है।
अधिवक्ता ने दलील दी कि केवल सार्वजनिक कार्य करना पर्याप्त नहीं है; जब तक संस्था पर सरकार का प्रभावी नियंत्रण या वैधानिक सृजन न हो, उसे ‘State’ नहीं माना जा सकता।
संस्था की ओर से कहा गया कि यह विवाद पूर्णतः निजी सेवा अनुबंध (private contract of employment) से संबंधित है, जिसमें कोई सार्वजनिक कानून तत्व (public law element) नहीं है।
अधिवक्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के Thalappalam Service Coop. Bank Ltd. v. State of Kerala तथा अन्य निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि सोसाइटी स्वतः ‘State’ नहीं बन जाती।
अधिवक्ताओं ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता को सेवा संबंधी शिकायत है तो वह उपयुक्त मंच (जैसे सिविल कोर्ट या अन्य वैधानिक प्राधिकरण) का सहारा ले सकता है।
हाईकोर्ट का फैसला
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने सबसे पहले रिट याचिका की मेंटेनबिलिटी पर सवाल करते हुए इसे ‘foundational issue’ मानते हुए प्राथमिक स्तर पर तय किया।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले Army Welfare Education Society v. Sunil Kumar Sharma (2024) और St. Mary’s Education Society v. Rajendra Prasad Bhargava (2023) का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि भले ही कोई संस्था शिक्षा या स्वास्थ्य जैसे सार्वजनिक महत्व के क्षेत्र में कार्य करती हो, परंतु उसके कर्मचारियों के साथ संबंध एक निजी अनुबंध (private contract) पर आधारित होता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि सेवा समाप्ति निजी अनुबंध के उल्लंघन से जुड़ी है और उसमें कोई वैधानिक प्रावधान या सार्वजनिक कानून तत्व शामिल नहीं है, तो वह रिट अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत नहीं आएगी।
कोर्ट ने माना कि अनुच्छेद 226 का दायरा व्यापक है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर निजी विवाद को रिट के माध्यम से उठाया जा सकता है।
हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता और प्रतिवादी के बीच विवाद पूर्णतः निजी सेवा संबंध से उत्पन्न हुआ है और इसमें कोई सार्वजनिक कानून तत्व नहीं है। अतः रिट याचिका विचारणीय नहीं है।
कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता की सेवा समाप्ति एक नियोक्ता और कर्मचारी के बीच निजी सेवा संबंध से जुड़ी है। इसमें कोई ऐसा तथ्य प्रस्तुत नहीं किया गया जिससे यह सिद्ध हो कि मामला सार्वजनिक कानून के तत्व से जुड़ा है या किसी वैधानिक प्रावधान का उल्लंघन हुआ है।
अंतिम आदेश
हाईकोर्ट ने मामले में दायर याचिका को प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज (dismissed in limine) करने का आदेश दिया है।