जयपुर। जल जीवन मिशन से जुड़े चर्चित कथित घोटाले में गिरफ्तार आरोपियों को राजस्थान हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने मामले में गिरफ्तार किए गए आरोपी महेश कुमार मित्तल, हेमंत मित्तल, पीयूष जैन, गोपाल लाल कुमावत और उमेश कुमार शर्मा को जमानत पर रिहा करने के आदेश दिए हैं।
जस्टिस चन्द्रप्रकाश श्रीमाली की एकलपीठ ने इन आरोपियों की ओर से दायर याचिकाओं को स्वीकार करते हुए यह आदेश दिया हैं.
हाईकोर्ट ने कहा कि मामले में आरोप पत्र पहले ही पेश किया जा चुका है और मुख्य आरोपियों को पूर्व में जमानत दी जा चुकी है। ऐसे में सह-आरोपियों को लंबे समय तक हिरासत में रखना उचित नहीं हैं.
क्या है मामला?
एसीबी द्वारा दर्ज एफआईआर में आरोप लगाया गया था कि जल जीवन मिशन के तहत टेंडर प्राप्त करने के लिए फर्जी दस्तावेजों का उपयोग किया गया।
प्रकरण में भ्रष्टाचार निवारण (संशोधित) अधिनियम 2018 की धाराएं 7, 7A और 8 के साथ-साथ भारतीय दंड संहिता की धारा 120B के तहत अपराध दर्ज किया गया।
मामले के अनुसार, जलदाय विभाग और ठेका फर्मों—श्री श्याम ट्यूबवेल कंपनी तथा श्री गणपति ट्यूबवेल कंपनी—के बीच कार्य आवंटन और भुगतान को लेकर विवाद था।
एसीबी का आरोप था कि टेंडर प्रक्रिया में अनियमितता बरती गई और कथित रूप से रिश्वत की मांग एवं लेन-देन हुआ।
जांच के दौरान पदमचंद जैन की कार से 2 लाख 20 हजार रुपये बरामद किए जाने का उल्लेख भी किया गया।
बचाव पक्ष की दलीलें
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ब्रह्मानंद सांधु, अधिवक्ता अभिमन्यु सिंह सांधु और अधिवक्ता सुधीर जैन ने पक्ष रखा।
उन्होंने अदालत को बताया कि मुख्य आरोपी पदमचंद जैन व अन्य को पहले ही जमानत का लाभ मिल चुका है।
उनके अनुसार, वर्तमान याचिकाकर्ता संबंधित फर्मों के कर्मचारी हैं और उनके विरुद्ध रिश्वत मांगने या लेने का कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं है।
बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि याचिकाकर्ताओं का नाम प्रारंभिक एफआईआर में नहीं था और उन्हें एफआईआर दर्ज होने के लगभग दो वर्ष बाद गिरफ्तार किया गया।
मामले में आरोप पत्र पेश हो चुका है और सुनवाई में समय लगेगा, ऐसे में उन्हें अनावश्यक रूप से हिरासत में रखना न्यायसंगत नहीं है।
अभियोजन पक्ष का विरोध
सरकारी वकील ने जमानत याचिकाओं का विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्ताओं और फर्म मालिकों के बीच हुई बातचीत से यह संकेत मिलता है कि उनकी भूमिका संदिग्ध है।
अभियोजन ने दलील दी कि भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में गंभीरता को देखते हुए जमानत नहीं दी जानी चाहिए।
अदालत की टिप्पणी
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने माना कि मुख्य आरोपियों को पहले ही जमानत दी जा चुकी है और वर्तमान याचिकाकर्ताओं की भूमिका उनसे अधिक गंभीर नहीं है। साथ ही, आरोप पत्र दाखिल हो चुका है और ट्रायल पूरा होने में पर्याप्त समय लग सकता है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जमानत का अर्थ आरोपों से मुक्ति नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि आरोपी ट्रायल के दौरान उपलब्ध रहें।
हाईकोर्ट ने प्रत्येक आरोपी को एक लाख रुपये के निजी मुचलके और 50-50 हजार रुपये की दो जमानतें प्रस्तुत करने की शर्त पर रिहा करने का आदेश दिया