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पीटीआई भर्ती परीक्षा-2022 -फर्जी डिग्री घोटाले मामले में आरोपी अभ्य​र्थी को राजस्थान हाईकोर्ट से मिली राहत,

Poverty Cannot Be a Ground for Imprisonment: Rajasthan High Court Orders Immediate Release in Cheque Bounce Case

जोधपुर। राजस्थान में फर्जी डिग्री और पीटीआई भर्ती से जुड़े चर्चित मामले में राजस्थान हाईकोर्ट से एक आरोपी अभ्य​र्थी को राजस्थान हाईकोर्ट ने बड़ी राहत दी हैं.

जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने टोनी कुमार मेहता की याचिका पर सुनवाई करते हुए आदेश दिया कि मामले की अगली सुनवाई तक याचिकाकर्ताओं की गिरफ्तारी नहीं की जाएगी।

साथ ही याचिकाकर्ता को एसओजी के जांच अधिकारी के समक्ष उपस्थित होकर अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया है।

यह मामला ATS एवं SOG विशेष पुलिस थाना में दर्ज एफआईआर संख्या 12/2026 से जुड़ा है, जिसमें आईपीसी की धारा 420, 467, 468, 471 और 120-B के तहत धोखाधड़ी और जालसाजी के आरोप लगाए गए हैं।

इस एफआईआर में प्रदेशभर के कई अभ्यर्थियों पर आरोप है कि उन्होंने ओपीजेएस यूनिवर्सिटी, चूरू से कथित रूप से संदिग्ध तरीके से बी.पी.एड. डिग्री प्राप्त कर फिजिकल एजुकेशन टीचर भर्ती परीक्षा-2022 में चयन हासिल किया।

बाद में इनके रिकॉर्ड के जल जाने की बात सामने आयी थी.

छात्रों का दावा-फर्जीवाड़े में हमारी कोई भूमिका नहीं

याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता धीरेन्द्र सिंह सोढा और प्रियंका बोराणा ने अदालत में तर्क दिया कि छात्रों को केवल इसलिए आरोपी बना दिया गया क्योंकि उनके नाम एक सामूहिक सूची में शामिल कर दिए गए हैं।

याचिका में कहा गया कि न तो किसी याचिकाकर्ता ने कोई दस्तावेज तैयार किया, न ही किसी प्रकार की जालसाजी की।

डिग्री विश्वविद्यालय द्वारा जारी की गई थी और दस्तावेजों का सत्यापन भी संबंधित अधिकारियों ने किया था।

याचिकाकर्ताओं का यह भी कहना था कि विश्वविद्यालय में सीटों की संख्या, प्रवेश प्रक्रिया, काउंसलिंग या रिकॉर्ड प्रबंधन पर छात्रों का कोई नियंत्रण नहीं होता।

यदि विश्वविद्यालय स्तर पर कोई अनियमितता हुई है तो उसके लिए छात्रों को आपराधिक रूप से जिम्मेदार ठहराना न्यायसंगत नहीं है।

जांच में उठे थे कई सवाल

एटीएस-एसओजी की जांच में यह दावा किया गया था कि पीटीआई भर्ती परीक्षा-2022 में बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों ने ओपीजेएस यूनिवर्सिटी से बी.पी.एड. डिग्री लेकर आवेदन किया, जबकि विश्वविद्यालय को सीमित सीटों की ही मान्यता थी। जांच एजेंसी का कहना है कि उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार विश्वविद्यालय में जितनी सीटों की अनुमति थी, उससे कहीं अधिक डिग्रियां जारी की गईं, जिससे भर्ती प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी की आशंका पैदा हुई।

इसी आधार पर पुलिस ने कई अभ्यर्थियों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज कर जांच शुरू की थी।

हाईकोर्ट ने दिया अंतरिम संरक्षण

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अंतरिम आदेश जारी किया।

अदालत ने याचिकाकर्ताओं को निर्देश दिया कि वो 30 मार्च 2026 तक संबंधित जांच अधिकारी के समक्ष उपस्थित होकर मामले से जुड़े तथ्यों और दस्तावेजों के साथ अपना पक्ष रखें।

साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि जांच अधिकारी याचिकाकर्ताओं द्वारा प्रस्तुत तथ्यों को रिकॉर्ड पर लेकर जांच को आगे बढ़ा सकते हैं और विस्तृत रिपोर्ट न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करेंगे।

सबसे महत्वपूर्ण यह कि अदालत ने अगली सुनवाई तक याचिकाकर्ताओं को गिरफ्तारी से अंतरिम राहत प्रदान करते हुए आदेश दिया कि एफआईआर संख्या 12/2026 के संबंध में उनके खिलाफ कोई गिरफ्तारी नहीं की जाएगी।

अगली सुनवाई 7 अप्रैल को

हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 7 अप्रैल 2026 को निर्धारित की है। इस दौरान जांच अधिकारी की रिपोर्ट और प्रस्तुत दस्तावेजों के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी।

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