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पीड़ित और दोषी का एक ही गांव में रहना पैरोल से इनकार का आधार नहीं हो सकता- राजस्थान हाईकोर्ट

Rajasthan High Court Grants Parole, Rules Living in Same Village as Victim Not Valid Ground for Denial

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने पैरोल से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि केवल इस आधार पर कि दोषी और पीड़िता एक ही गांव में रहते हैं, पैरोल देने से इनकार नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसी सामान्य आशंकाओं के आधार पर पैरोल को रोकना कानून के सुधारात्मक उद्देश्य को विफल कर देगा।

यह फैसला जस्टिस फरजंद अली और जस्टिस संदीप शाह की खंडपीठ ने आरोपी-याचिकाकर्ता नारायण उर्फ रामनारायण की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है।

मामला क्या था

अजमेर सेंट्रल जेल में बंद याचिकाकर्ता नारायण उर्फ राम नारायण ने 30 दिनों की दूसरी पैरोल के लिए आवेदन किया था। लेकिन भीलवाड़ा जिला कलेक्टर ने 14 जनवरी 2026 को याचिकाकर्ता के आवेदन को खारिज कर दिया।

प्रशासन की ओर से यह तर्क दिया गया कि दोषी और पीड़िता एक ही गांव में रहते हैं, ऐसे में पैरोल मिलने पर पीड़िता और उसके परिवार की सुरक्षा को खतरा हो सकता है।

याचिकाकर्ता की दलीलें

याचिकाकर्ता नारायण उर्फ राम नारायण की ओर से पेश अधिवक्ताओं ने हाईकोर्ट में दलील दी कि जिला कलेक्टर, भीलवाड़ा द्वारा 14 जनवरी 2026 को पारित आदेश पूरी तरह से मनमाना, यांत्रिक और गैर-कानूनी है।

अधिवक्ता ने कहा कि पैरोल आवेदन को बिना उचित आधार के खारिज किया गया, जबकि याचिकाकर्ता सभी निर्धारित पात्रता मानदंडों को पूरा करता है।

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी तर्क रखा गया कि जेल प्रशासन की रिपोर्ट के अनुसार उसका आचरण संतोषजनक रहा है। उसने जेल में अनुशासन बनाए रखा है और किसी भी प्रकार की अनुचित गतिविधि में शामिल नहीं रहा। ऐसे में उसे सुधार और पुनर्वास के अवसर से वंचित करना न्यायसंगत नहीं है।

अधिवक्ता ने यह भी कहा कि पैरोल का उद्देश्य केवल अस्थायी रिहाई देना नहीं है, बल्कि एक कैदी को अपने परिवार और समाज से जुड़े रहने का अवसर प्रदान करना है, जिससे वह मानसिक और सामाजिक रूप से संतुलित रह सके।

पुलिस और प्रशासन द्वारा व्यक्त की गई आशंकाओं को याचिकाकर्ता पक्ष ने निराधार और अस्पष्ट बताया। उनका कहना था कि केवल इस आधार पर कि पीड़िता और दोषी एक ही गांव में रहते हैं, यह मान लेना कि पैरोल मिलने पर खतरा उत्पन्न होगा, पूरी तरह से अनुमान पर आधारित है।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ताओं ने जोर देकर कहा कि कानून केवल ठोस और वास्तविक तथ्यों के आधार पर निर्णय लेने की अनुमति देता है, न कि काल्पनिक या सामान्य आशंकाओं के आधार पर। उन्होंने यह भी कहा कि यदि इस प्रकार की आशंकाओं को मान लिया जाए, तो अधिकांश मामलों में पैरोल देना असंभव हो जाएगा, क्योंकि भारत में अधिकतर अपराधों में आरोपी और पीड़ित एक ही क्षेत्र या समुदाय से होते हैं।

राज्य सरकार ने किया विरोध

राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) ने याचिकाकर्ता की पैरोल का विरोध करते हुए हाईकोर्ट में दलील दी कि याचिकाकर्ता और पीड़िता एक ही गांव में रहते हैं और उनके घरों की दूरी भी काफी कम है।

ऐसी स्थिति में यदि याचिकाकर्ता को पैरोल पर रिहा किया जाता है, तो इससे पीड़िता और उसके परिवार की सुरक्षा को गंभीर खतरा हो सकता है।

राज्य ने यह भी आशंका जताई कि दोषी की उपस्थिति से पीड़िता के मन में भय और असुरक्षा की भावना उत्पन्न हो सकती है, जिससे उसके सामान्य जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

सरकार ने कहा कि इसके अतिरिक्त, सामाजिक तनाव या विवाद की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है, जिससे कानून-व्यवस्था प्रभावित होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

सरकार ने यह भी कहा कि प्रशासन का दायित्व केवल दोषी के अधिकारों की रक्षा करना ही नहीं है, बल्कि पीड़िता की सुरक्षा, सम्मान और मानसिक शांति सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

राज्य के वकील ने यह तर्क दिया कि पैरोल एक अधिकार नहीं, बल्कि एक विशेषाधिकार है, जिसे परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए दिया जाता है।

यदि किसी मामले में यह संभावना हो कि पैरोल देने से किसी की सुरक्षा या सार्वजनिक शांति को खतरा हो सकता है, तो प्रशासन को इसे अस्वीकार करने का अधिकार है।

सरकार ने कहा कि जिला कलेक्टर ने उपलब्ध रिपोर्ट्स और स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ही यह निर्णय लिया था, इसलिए इसमें न्यायालय को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

दोनों पक्षों की दलीलें और बहस सुनने के बाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि यह तर्क कि पीड़िता और दोषी एक ही गांव में रहते हैं, अपने आप में पैरोल से इनकार करने का ठोस आधार नहीं हो सकता। यदि इस आधार को सार्वभौमिक नियम मान लिया जाए, तो पैरोल की संपूर्ण अवधारणा ही निष्प्रभावी हो जाएगी।

हाईकोर्ट ने कहा कि पैरोल केवल प्रशासनिक दया नहीं है, बल्कि आधुनिक दंड व्यवस्था (Penology) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

गांधीजी के विचारों का उल्लेख

फैसले में महात्मा गांधी के प्रसिद्ध सिद्धांत—“पाप से घृणा करो, पापी से नहीं”—का भी उल्लेख किया गया।

कोर्ट ने कहा कि यह विचार सुधारात्मक न्याय की मूल भावना को दर्शाता है, जिसमें व्यक्ति को अपने अपराध से सीखकर बेहतर बनने का अवसर दिया जाता है।

कोर्ट ने कहा कि पैरोल का उद्देश्य दोषी को परिवार और समाज से जोड़े रखना, उसे सामाजिक जीवन में पुनः स्थापित करना और आत्मचिंतन तथा सुधार का अवसर देना है।

हाईकोर्ट ने कहा कि अपराध करने के बावजूद व्यक्ति समाज का हिस्सा बना रहता है और कानून उसे स्थायी रूप से अलग करने का समर्थन नहीं करता।

आशंकाएं ठोस आधार पर होनी चाहिए, केवल अनुमान नहीं

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि केवल यह मान लेना कि दोषी की उपस्थिति से खतरा होगा, पर्याप्त नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि आपराधिक न्याय प्रणाली अनुमान या कल्पना पर नहीं चल सकती और पैरोल से इनकार तभी उचित है जब वास्तविक और ठोस खतरे के प्रमाण हों।

हाईकोर्ट ने कहा कि पैरोल का उद्देश्य ही यह है कि दोषी अपने घर और सामाजिक वातावरण में वापस जाए। यदि उसे अपने गांव या घर जाने से रोका जाए, तो पैरोल का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा।

कोर्ट ने कहा कि किसी अनजान स्थान पर रहने का निर्देश देना अव्यावहारिक और निरर्थक होगा।

कोर्ट ने कहा कि जब दोषी अपने परिवार और समाज के बीच जाता है, तो उसमें जिम्मेदारी और सुधार की भावना विकसित होती है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला दिया, जिसमें Asfaq v. State of Rajasthan (2017)—पैरोल का उद्देश्य सामाजिक और पारिवारिक संबंधों को बनाए रखना है, तथा Inder Singh v. State (1978)—सुधार, पुनर्वास और मानवीय व्यवहार की आवश्यकता पर जोर—शामिल हैं।

पीड़िता की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि पीड़िता की सुरक्षा, गरिमा और मानसिक शांति सर्वोपरि है। इन चिंताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन इन्हें सख्त शर्तों के माध्यम से संतुलित किया जा सकता है।

हाईकोर्ट ने कहा कि

एक ओर दोषी के सुधार का अधिकार है, दूसरी ओर पीड़िता की सुरक्षा का अधिकार।

इन दोनों के बीच संतुलन बनाते हुए ही पैरोल दी जानी चाहिए।

अंतिम फैसला

हाईकोर्ट ने कहा कि केवल एक ही गांव में रहने के आधार पर पैरोल से इनकार करना अनुचित है और बिना ठोस सबूत के आशंका के आधार पर पैरोल नहीं रोकी जा सकती।

उचित शर्तों के साथ पैरोल देना न्यायसंगत और कानून के अनुरूप है।

याचिकाकर्ता को ₹50,000/- के निजी मुचलके और ₹25,000/- के दो जमानतदार पेश करने पर हाईकोर्ट ने दोषी-याचिकाकर्ता को सशर्त 30 दिनों की दूसरी पैरोल पर रिहा करने का आदेश दिया

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