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499 कार्टन अवैध शराब तस्करी के मामले में हाईकोर्ट ने माना दोषी, फिर भी हाईकोर्ट ने दिया रिहा करने का आदेश, जानिए प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट

Rajasthan High Court Grants Probation in 499 Cartons Illegal Liquor Smuggling Case, Conviction Upheld

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर मुख्यपीठ ने अवैध शराब तस्करी से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी को दोषी घोषित करने की दोषसिद्धि को बरकरार रखा, लेकिन सजा में राहत देते हुए उसे सशर्त रिहा करने का आदेश दिया है।

जस्टिस फरजंद अली की एकल पीठ ने मामले में याचिकाकर्ता केसर सिंह का पूर्व में कोई आपराधिक इतिहास नहीं होने और 32 वर्ष की आयु के चलते प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट का लाभ देते हुए सजा में संशोधन करते हुए भुगती हुई सजा के आधार पर रिहा करने का आदेश दिया है।

मामला क्या था

डूंगरपुर क्षेत्र के राजपुर घाटी में पुलिस ने सूचना के आधार पर नाकाबंदी कर एक ट्रक को पकड़ा, जिसकी तलाशी लेने पर उसमें विदेशी शराब के 499 कार्टन बरामद हुए।

आरोपी के पास शराब परिवहन के लिए कोई वैध लाइसेंस या परमिट नहीं था। इसके बाद पुलिस ने राजस्थान आबकारी अधिनियम की धारा 19/54 के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू की।

जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने आरोपी के खिलाफ आरोप पत्र न्यायालय में पेश किया और मामला न्यायिक मजिस्ट्रेट सीमलवाड़ा (डूंगरपुर) की अदालत में चला।

ट्रायल कोर्ट और अपील में क्या हुआ

ट्रायल के दौरान अभियोजन पक्ष ने अपने आरोप साबित करने के लिए 18 गवाहों के बयान दर्ज कराए और कई दस्तावेज पेश किए। वहीं आरोपी ने अपने बयान में आरोपों से इनकार करते हुए खुद को निर्दोष बताया और बचाव पक्ष की ओर से कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया।

सभी तथ्यों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को राजस्थान आबकारी अधिनियम की धारा 19/54 के तहत दोषी मानते हुए तीन वर्ष के साधारण कारावास और 20 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई।

इस फैसले के खिलाफ आरोपी ने डूंगरपुर के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश की अदालत में अपील दायर की। अपीलीय अदालत ने भी ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए सजा को कायम रखा। इसके बाद आरोपी ने राजस्थान हाईकोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दायर की।

हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता की दलील

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान आरोपी की ओर से पेश अधिवक्ता ने दोषसिद्धि को चुनौती नहीं दी और केवल सजा में राहत देने की मांग की।

बचाव पक्ष ने अदालत को बताया कि आरोपी की उम्र 32 वर्ष है और उसके खिलाफ यह पहला आपराधिक मामला है। वह गरीब व्यक्ति है और उसके खिलाफ कोई पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड भी नहीं है।

वकील ने यह भी कहा कि आरोपी कुछ समय तक ट्रायल के दौरान जेल में रह चुका है और वर्तमान में भी सजा काट रहा है। इसलिए अदालत उससे सुधार की उम्मीद करते हुए उसे प्रोबेशन का लाभ दे सकती है।

वहीं राज्य की ओर से लोक अभियोजक ने मामले के तथ्यों का बचाव किया, हालांकि उन्होंने इस बात का विरोध नहीं किया कि आरोपी का कोई पूर्व आपराधिक इतिहास नहीं है और वह पहले भी कुछ समय जेल में रह चुका है।

हाईकोर्ट का फैसला

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए कहा कि निचली अदालतों द्वारा दी गई दोषसिद्धि में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है। इसलिए आरोपी की दोषसिद्धि को बरकरार रखा जाता है।

हालांकि सजा के प्रश्न पर अदालत ने कई महत्वपूर्ण परिस्थितियों पर ध्यान दिया। अदालत ने माना कि आरोपी अपेक्षाकृत युवा है, उसके खिलाफ कोई पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और जेल या जमानत अवधि के दौरान उसके व्यवहार के संबंध में कोई प्रतिकूल रिपोर्ट भी नहीं है।

इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने कहा कि इस मामले में सुधारात्मक दृष्टिकोण अपनाना उचित होगा।

अदालत का अंतिम आदेश

हाईकोर्ट ने आंशिक रूप से पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए आरोपी की दोषसिद्धि को बरकरार रखा, लेकिन सजा में संशोधन कर दिया। अदालत ने आदेश दिया कि आरोपी को प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट, 1958 की धारा 4 के तहत रिहाई दी जाए।

अदालत ने आरोपी को निर्देश दिया कि वह 25 हजार रुपये का निजी मुचलका और इतनी ही राशि का एक जमानती पेश करे। साथ ही उसे एक वर्ष तक शांति बनाए रखने और अच्छा व्यवहार करने की शर्तों का पालन करना होगा।

अदालत ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा लगाया गया 20 हजार रुपये का जुर्माना 90 दिनों के भीतर जमा करना होगा। यदि आरोपी किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है, तो आवश्यक औपचारिकताएं पूरी होने के बाद उसे तुरंत रिहा किया जाएगा।

क्या है प्रोबेशन का आदेश

इन सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने आरोपी को प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट, 1958 की धारा 4 के तहत राहत प्रदान की। अदालत ने आदेश दिया कि आरोपी 25 हजार रुपये का निजी मुचलका और समान राशि का जमानती प्रस्तुत करेगा तथा दो वर्षों तक अच्छे आचरण और शांति बनाए रखने का वचन देगा।

प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट

प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट, 1958 की धारा 4 पर जोर देते हुए कहा गया कि यह धारा अदालत को व्यापक और कल्याणकारी अधिकार देती है कि यदि अपराध मृत्यु दंड या आजीवन कारावास से दंडनीय नहीं है, तो आरोपी को अच्छे आचरण पर प्रोबेशन पर छोड़ा जा सकता है।

इस प्रावधान के तहत अदालत को अपराध की प्रकृति, आरोपी का चरित्र, उसकी उम्र, पूर्व आचरण और सुधार की संभावना जैसे कारकों पर विचार करना अनिवार्य है।

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