जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर मुख्यपीठ ने चोरी के एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी को दोषी घोषित करने की दोषसिद्धि को बरकरार रखा, लेकिन सजा में राहत देते हुए उसे सशर्त रिहा करने का आदेश दिया है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि अगले 2 साल तक याचिकाकर्ता आरोपी अच्छे आचरण और शांति बनाए रखने का वचन देगा।
सशर्त दी बड़ी राहत
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में दोषी याचिकाकर्ता भाकरराम को स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि आरोपी इस अवधि के दौरान किसी भी शर्त का उल्लंघन करता है, तो उसे पुनः सजा भुगतनी पड़ सकती है।
साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ट्रायल कोर्ट द्वारा लगाया गया जुर्माना निर्धारित समय में जमा करना अनिवार्य होगा।
जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि न्याय व्यवस्था का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं बल्कि अपराधी के सुधार की संभावना को भी महत्व देना है।
कोर्ट ने कहा कि यदि परिस्थितियां यह संकेत देती हैं कि आरोपी का पुनर्वास संभव है और वह आदतन अपराधी नहीं है, तो ऐसे मामलों में सुधारात्मक दृष्टिकोण अपनाया जाना न्याय के हित में है।
क्या है मामला
नागौर जिले के रायका बाग निवासी भाकर राम के खिलाफ मेड़ता के सहायक पोस्ट मास्टर शिकायतकर्ता इकबाल मोहम्मद ने पुलिस थाना मेड़ता में रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि उन्होंने अपनी मोटरसाइकिल कार्यालय परिसर के पार्किंग स्थल पर खड़ी की थी।
ड्यूटी समाप्त होने के बाद जब वे वापस लौटे तो मोटरसाइकिल वहां से गायब मिली। इस घटना के बाद पुलिस ने आईपीसी की धारा 379 के तहत मामला दर्ज कर जांच प्रारंभ की।
जांच के दौरान पुलिस ने विभिन्न साक्ष्य जुटाए और आरोपी को गिरफ्तार कर उसके खिलाफ धारा 379, 411 और 413 आईपीसी के तहत चार्जशीट पेश की।
ट्रायल कोर्ट ने मामले में याचिकाकर्ता भाकर राम को धारा 379 के तहत चोरी के अपराध में दोषी पाते हुए तीन वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई। साथ ही 10 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया।
इसी फैसले के खिलाफ आरोपी ने राजस्थान हाईकोर्ट में अपील दायर कर चुनौती दी।
हाईकोर्ट में अपील और दलीलें
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान आरोपी के अधिवक्ता ने दोषसिद्धि को चुनौती नहीं दी, बल्कि सजा में राहत देने की मांग की।
अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि आरोपी परिवार का एकमात्र कमाने वाला सदस्य है और उसके खिलाफ पहले कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है। यह उसका पहला अपराध है और उसे सुधार का अवसर दिया जाना चाहिए।
दूसरी ओर, सरकारी पक्ष ने ट्रायल कोर्ट के निर्णय का समर्थन किया और कहा कि दोषसिद्धि साक्ष्यों के आधार पर उचित है।
हालांकि सरकारी पक्ष ने इस तथ्य का खंडन नहीं किया कि आरोपी का कोई पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और वह कुछ समय तक जेल में रह चुका है।
हाईकोर्ट का फैसला
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि रिकॉर्ड का अवलोकन करने पर यह स्पष्ट है कि ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई दोषसिद्धि साक्ष्यों पर आधारित है और इसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। इसलिए हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि को बरकरार रखा।
सजा के प्रश्न पर अदालत ने कहा कि न्यायालयों को प्रत्येक मामले में परिस्थितियों का समग्र रूप से मूल्यांकन करना चाहिए। यदि आरोपी आदतन अपराधी नहीं है, उसका आपराधिक इतिहास नहीं है और उसके सुधार की संभावना दिखाई देती है, तो सुधारात्मक दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए।
अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि आरोपी जमानत अवधि के दौरान किसी भी अनुचित गतिविधि में शामिल नहीं पाया गया और उसके खिलाफ अन्य किसी आपराधिक मामले का रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। इन तथ्यों को अदालत ने सजा में नरमी बरतने के लिए महत्वपूर्ण माना।
क्या है प्रोबेशन का आदेश
इन सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने आरोपी को प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट, 1958 की धारा 4 के तहत राहत प्रदान की। अदालत ने आदेश दिया कि आरोपी 25 हजार रुपये का निजी मुचलका और समान राशि का जमानती प्रस्तुत करेगा तथा दो वर्षों तक अच्छे आचरण और शांति बनाए रखने का वचन देगा।
प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट
प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट, 1958 की धारा 4 पर जोर देते हुए कहा कि यह धारा अदालत को व्यापक और कल्याणकारी अधिकार देती है कि यदि अपराध मृत्यु दंड या आजीवन कारावास से दंडनीय नहीं है, तो आरोपी को अच्छे आचरण पर प्रोबेशन पर छोड़ा जा सकता है।
इस प्रावधान के तहत अदालत को अपराध की प्रकृति, आरोपी का चरित्र, उसकी उम्र, पूर्व आचरण और सुधार की संभावना जैसे कारकों पर विचार करना अनिवार्य है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट एक सामाजिक कल्याण कानून है, जिसका उद्देश्य युवाओं या पहली बार अपराध करने वालों को कठोर दंड के माध्यम से आदतन अपराधी बनने से रोकना है।
जहां यह कानून लागू होता है, वहां इसका उदारतापूर्वक उपयोग किया जाना चाहिए।