बोर्ड ऑफ रेवेन्यू का आदेश रद्द करते हुए कोर्ट ने कहा- राजस्व मामलों में अपील की प्रक्रिया का सम्मान जरूरी, बिना मेरिट सुने फैसला देना न्याय के खिलाफ
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी पक्षकार को उसके वैधानिक अपील के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने साफ कहा—“जब पहली अपील में मामले की मेरिट पर सुनवाई ही नहीं हुई, तो उच्च प्राधिकरण खुद फैसला नहीं दे सकता।”
जस्टिस अनुरूप सिंघी ने रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए चुंकी देवी की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए बोर्ड ऑफ रेवेन्यू (BOR) द्वारा दिए गए आदेश को निरस्त कर दिया और मामले को पुनः राजस्व अपीलीय प्राधिकरण (RAA), सीकर को भेजने के आदेश दिए हैं।
मामला क्या है?
यह मामला सीकर जिले के सेवद छोटी गांव की भूमि से जुड़ा है, जहां लंबे समय से स्वामित्व और हिस्सेदारी को लेकर विवाद चल रहा था।
इस केस की शुरुआत वर्ष 2009 में हुई थी, जब प्रतिवादी पक्ष ने सहायक कलेक्टर-II, सीकर के समक्ष वाद दायर कर भूमि पर अपने अधिकारों की घोषणा, स्थायी निषेधाज्ञा और राजस्व रिकॉर्ड में संशोधन की मांग की।
सहायक कलेक्टर ने 4 सितंबर 2023 को फैसला देते हुए सेवद छोटी गांव की भूमि में प्रतिवादियों को कुछ खसरा नंबरों में हिस्सेदारी का अधिकार दे दिया।
इस फैसले से असंतुष्ट होकर याचिकाकर्ता चुंकी देवी ने राजस्व अपीलीय प्राधिकरण (RAA) में अपील दायर की।
RAA ने 31 जनवरी 2024 को इस फैसले को निरस्त करते हुए मामला दोबारा सुनवाई के लिए सहायक कलेक्टर को भेज दिया, लेकिन इस दौरान उसने मामले के मेरिट (तथ्यों) पर कोई निर्णय नहीं दिया।
बोर्ड ऑफ रेवेन्यू ने क्या किया?
RAA के इस आदेश के खिलाफ दोनों पक्षों ने बोर्ड ऑफ रेवेन्यू (BOR), अजमेर में अपील दायर की।
इस मामले में बोर्ड ऑफ रेवेन्यू ने 3 फरवरी 2026 को एक महत्वपूर्ण आदेश देते हुए याचिकाकर्ता चुंकी देवी की अपील खारिज कर दी और प्रतिवादियों की अपील स्वीकार करते हुए सीधे सहायक कलेक्टर के मूल फैसले को बहाल कर दिया।
यानी BOR ने खुद ही मामले के मेरिट पर फैसला सुना दिया, जबकि RAA ने पहले कभी मेरिट पर विचार ही नहीं किया था।
इस फैसले के खिलाफ चुंकी देवी ने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर कर चुनौती दी।
याचिकाकर्ता का पक्ष
याचिकाकर्ता चुंकी देवी के वकील ने हाईकोर्ट में दलील दी कि RAA ने मामले को मेरिट पर नहीं सुना था, ऐसे में BOR को केवल रिमांड आदेश की वैधता पर विचार करना चाहिए था।
अधिवक्ता ने कहा कि बोर्ड को खुद से अंतिम निर्णय देने का अधिकार नहीं था।
इससे याचिकाकर्ता का “पहली अपील” का अधिकार खत्म हो गया।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण P.E. Prasannakumari के फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि अपीलीय अधिकारों को छीना नहीं जा सकता।
प्रतिवादी का पक्ष
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान प्रतिवादियों की ओर से याचिका का जवाब देते हुए कहा गया कि बोर्ड ऑफ रेवेन्यू के पास पर्याप्त अधिकार हैं कि वह उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर खुद भी निर्णय दे सकता है।
अधिवक्ता ने कहा कि अनावश्यक रिमांड से बचना चाहिए, क्योंकि इससे मुकदमे लंबित रहते हैं।
उन्होंने CPC (सिविल प्रक्रिया संहिता) के विभिन्न प्रावधानों का हवाला देते हुए बोर्ड के आदेश को सही ठहराया।
हाईकोर्ट का फैसला
राजस्थान हाईकोर्ट की एकलपीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि कानून में अपील की जो व्यवस्था बनाई गई है, उसे दरकिनार नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब RAA ने मेरिट पर कोई निर्णय नहीं दिया था, तब BOR को केवल रिमांड आदेश की वैधता तक ही सीमित रहना चाहिए था।
कोर्ट ने कहा कि यदि BOR सीधे मेरिट पर फैसला दे देता है, तो संबंधित पक्ष “पहली अपील” के अधिकार से वंचित हो जाता है, जो कानून के खिलाफ है।
कोर्ट ने कहा कि अपीलीय न्यायालयों की एक निर्धारित श्रृंखला (Hierarchy) होती है, जिसे बनाए रखना जरूरी है, अन्यथा न्याय व्यवस्था प्रभावित होती है।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में बोर्ड ऑफ रेवेन्यू के 3 फरवरी 2026 के आदेश को रद्द करते हुए मामले को पुनः RAA, सीकर को भेज दिया।
हाईकोर्ट ने RAA को आदेश दिया कि वह इस केस को मेरिट के आधार पर निष्पक्ष तरीके से तय करे।
साथ ही, अदालत ने यह भी कहा कि चूंकि यह मामला वर्ष 2009 से लंबित है, इसलिए इसे 4 महीने के भीतर निपटाया जाए।
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