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वाहन में मौजूद होना ही अपराध नहीं: गौ तस्करी मामले में राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, आरोपी बरी

Rajasthan High Court: Mere Presence in Vehicle Not Enough for Conviction in Cow Smuggling Case

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने गौवंश परिवहन से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि केवल वाहन में मौजूद होने के आधार पर किसी व्यक्ति को अपराधी नहीं ठहराया जा सकता।

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि उसके खिलाफ अपराध में सक्रिय भूमिका, जानकारी या संलिप्तता का कोई ठोस सबूत नहीं है, तो उसे दोषी नहीं माना जा सकता।

राजस्थान हाईकोर्ट ने गौवंश तस्करी के मामले में आरोपी को डूंगरपुर की जिला अदालत द्वारा सुनाई गई 1 साल की सजा को रद्द करते हुए सभी आरोपों से बरी कर दिया है।

जस्टिस फरजंद अली की एकल पीठ ने यह आदेश अपीलकर्ता आशिक की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई के बाद दिया है।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि आपराधिक कानून में केवल संदेह के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, बल्कि अपराध सिद्ध करने के लिए स्पष्ट और विश्वसनीय सबूत आवश्यक हैं।

क्या था मामला

मामले के अनुसार 10 अप्रैल 2014 को सुबह करीब 6:15 बजे बिछीवाड़ा पुलिस थाने को सूचना मिली थी कि एक ट्रक में बड़ी संख्या में गौवंश को गुजरात ले जाया जा रहा है।

सूचना मिलने के बाद पुलिस ने दो स्वतंत्र गवाहों के साथ राष्ट्रीय राजमार्ग-8 की ओर नाकाबंदी की।

करीब 7:45 बजे एक ट्रक तेज गति से आया और नाकाबंदी से बचने की कोशिश की। पुलिस ने पीछा कर ट्रक को रोक लिया।

ट्रक में चालक अकबर और क्लीनर आशिक मौजूद थे, जो मौके से भागने का प्रयास कर रहे थे।

तलाशी के दौरान ट्रक से कुल 58 पशु बरामद किए गए, जिनमें 30 बछड़े और 24 भैंसें शामिल थीं। इनमें से एक भैंस और दो बछड़े मृत पाए गए।

आरोपियों के पास पशुओं के परिवहन से संबंधित कोई वैध अनुमति पत्र नहीं था।

इसके आधार पर पुलिस ने राजस्थान गौवंश (वध निषेध एवं अस्थायी प्रवास या निर्यात का विनियमन) अधिनियम, 1995 की विभिन्न धाराओं में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की।

निचली अदालत ने सुनाई थी सजा

मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने 17 गवाह पेश किए और 33 दस्तावेज अदालत में प्रस्तुत किए। हालांकि बचाव पक्ष ने आरोपों को झूठा बताते हुए कहा कि आरोपी को गलत तरीके से फंसाया गया है।

डूंगरपुर की अतिरिक्त सत्र अदालत ने 22 अगस्त 2023 को आरोपी को अधिनियम की धारा 6/8 और 9 के तहत दोषी मानते हुए एक-एक वर्ष के कठोर कारावास और 1000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।

दोनों सजाएं साथ-साथ चलने का आदेश दिया गया था।

याचिकाकर्ता की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि आरोपी आशिक केवल ट्रक में मौजूद था और उसके खिलाफ ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि वह पशुओं के अवैध परिवहन में शामिल था।

उन्होंने दलील दी कि रिकॉर्ड में कहीं भी यह नहीं दर्शाया गया कि आरोपी वाहन का मालिक था, चालक था या पशुओं के परिवहन की व्यवस्था से उसका कोई संबंध था।

अभियोजन पक्ष यह भी साबित नहीं कर पाया कि आरोपी को कथित अवैध गतिविधि की जानकारी थी या उसने उसमें कोई सक्रिय भूमिका निभाई।

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि केवल वाहन में बैठे होने के आधार पर किसी व्यक्ति को अपराधी नहीं माना जा सकता। आपराधिक कानून के सिद्धांत के अनुसार अभियोजन को यह साबित करना आवश्यक होता है कि आरोपी ने जानबूझकर अपराध में भाग लिया या उसे उस गतिविधि की जानकारी थी।

अधिवक्ता ने यह भी तर्क दिया कि राजस्थान गौवंश अधिनियम की धारा 3 लागू करने के लिए यह साबित करना जरूरी है कि पशुओं को राज्य के भीतर से बाहर ले जाया जा रहा था और उनका उद्देश्य वध था। लेकिन इस मामले में अभियोजन ऐसा कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर पाया।

उन्होंने कहा कि यह भी संभव है कि पशुओं का परिवहन किसी वैध उद्देश्य जैसे कृषि, डेयरी या व्यापारिक गतिविधि के लिए किया जा रहा हो। इसलिए केवल संदेह के आधार पर आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

राज्य की ओर से दलीलें

राज्य की ओर से सरकारी अधिवक्ता ने निचली अदालत के फैसले का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि पुलिस को मिली सूचना के आधार पर नाकाबंदी की गई और ट्रक को रोका गया।

ट्रक से बड़ी संख्या में पशु बरामद हुए और आरोपियों के पास परिवहन के लिए कोई वैध परमिट नहीं था।

राज्य की ओर से यह भी कहा गया कि ट्रक में अत्यधिक संख्या में पशुओं को भरा गया था और कुछ पशु मृत भी पाए गए, जिससे स्पष्ट होता है कि पशुओं के साथ अमानवीय व्यवहार किया गया था।

सरकारी पक्ष ने यह तर्क दिया कि आरोपी ट्रक में मौजूद था और पुलिस द्वारा पकड़े जाने पर भागने का प्रयास भी किया गया। इसलिए परिस्थितियां यह दर्शाती हैं कि आरोपी को पूरे मामले की जानकारी थी और वह अवैध परिवहन में शामिल था।

हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी

अपील की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि आरोपी आशिक के खिलाफ कोई प्रत्यक्ष सबूत नहीं है।

हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि वह पशुओं के परिवहन में सक्रिय रूप से शामिल था या उसे इस कथित अवैध गतिविधि की जानकारी थी।

कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल वाहन में बैठे होने से यह साबित नहीं होता कि व्यक्ति अपराध में सहभागी है। जब तक अभियोजन पक्ष यह साबित न कर दे कि आरोपी को अपराध की जानकारी थी या उसने उसमें सक्रिय भूमिका निभाई, तब तक उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

कानून की शर्तें पूरी नहीं हुईं

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि राजस्थान गौवंश अधिनियम की धारा 3 लागू करने के लिए अभियोजन को तीन महत्वपूर्ण तथ्य साबित करने होते हैं—

पशुओं को राज्य के भीतर से ले जाया जा रहा था,
उनका गंतव्य राज्य के बाहर था,
और उन्हें वध के उद्देश्य से ले जाया जा रहा था।

हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में इन तीनों तथ्यों को साबित करने के लिए कोई ठोस साक्ष्य पेश नहीं किया गया। यह भी संभव है कि पशुओं का परिवहन किसी वैध कृषि, डेयरी या व्यापारिक उद्देश्य से हो रहा हो। केवल अनुमान या शक के आधार पर दोष सिद्ध नहीं किया जा सकता।

संदेह के आधार पर नहीं हो सकती सजा

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि

आपराधिक न्यायशास्त्र में “गंभीर संदेह भी प्रमाण का स्थान नहीं ले सकता।” अभियोजन को पहले अपराध के मूल तथ्यों को संदेह से परे साबित करना होता है, तभी आरोपी के खिलाफ कोई धारणा बन सकती है।

चूंकि इस मामले में ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला, इसलिए निचली अदालत का फैसला कानून की कसौटी पर टिक नहीं पाया।

आरोपी को किया बरी

इन सभी तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए निचली अदालत का फैसला रद्द कर दिया और आरोपी आशिक को सभी आरोपों से बरी कर दिया।

हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपी पहले से जमानत पर है, इसलिए उसे आत्मसमर्पण करने की आवश्यकता नहीं है।

यह फैसला गौवंश परिवहन से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इसमें अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल वाहन में मौजूद होने के आधार पर किसी व्यक्ति को अपराधी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक उसके खिलाफ ठोस और प्रत्यक्ष सबूत मौजूद न हों।

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