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वेटिंग लिस्ट से नियुक्त शिक्षकों को बड़ी राहत: राजस्थान हाईकोर्ट ने दिया नोशनल वरिष्ठता और वेतन निर्धारण का लाभ

Rajasthan High Court Grants Notional Seniority to Teachers Appointed from Waiting List in 2016 Recruitment

हाईकोर्ट ने कहा कि जब देरी का कारण स्वयं प्रशासनिक लापरवाही है, तो उसका नुकसान उम्मीदवारों को नहीं उठाना चाहिए।

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर पीठ ने शिक्षक भर्ती 2016 से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए प्रतीक्षा सूची (वेटिंग लिस्ट) से नियुक्त शिक्षकों को बड़ी राहत दी है।

जस्टिस आनंद शर्मा की एकलपीठ ने आदेश दिया कि शिक्षक ग्रेड-III (लेवल-II अंग्रेजी) के उन अभ्यर्थियों को नोशनल वरिष्ठता और वेतन निर्धारण का लाभ दिया जाए, जिनकी नियुक्ति प्रशासनिक देरी के कारण बाद में हुई थी।

हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उन्हें पिछली अवधि का वास्तविक वेतन नहीं मिलेगा।

यह आदेश जस्टिस आनंद शर्मा की एकलपीठ ने मनोज कुमार शर्मा व अन्य की ओर से दायर याचिकाओं पर दिया हैं.

सभी याचिकाओं में समान तथ्य और कानूनी प्रश्न होने के कारण अदालत ने एक ही आदेश के जरिए फैसला सुनाया।

2016 भर्ती से जुड़ा है मामला

मामला वर्ष 2016 में जारी उस विज्ञापन से जुड़ा है, जिसमें शिक्षक ग्रेड-III के करीब 4960 पदों पर भर्ती के लिए आवेदन मांगे गए थे।

भर्ती नियमों के अनुसार, चयन सूची के साथ-साथ विज्ञापित पदों के 50 प्रतिशत तक की प्रतीक्षा सूची तैयार करना अनिवार्य था।

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उस समय विभाग ने नियमों का पालन करते हुए वेटिंग लिस्ट तैयार नहीं की।

परिणामस्वरूप मुख्य चयन सूची में शामिल कुछ उम्मीदवारों के जॉइन नहीं करने के बावजूद अन्य योग्य अभ्यर्थियों को नियुक्ति नहीं मिल सकी। बाद में इस मुद्दे को लेकर अदालत का दरवाजा खटखटाया गया।

पहले भी कोर्ट दे चुका था निर्देश

याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता Dr. Abhinav Sharma, Puja Sharma, Akshaya Varma और Vishal Choudhary ने पैरवी करते हुए दलील दी कि उर्मिला देवी बनाम राज्य सरकार मामले में हाईकोर्ट की समन्वय पीठ ने विभाग को प्रतीक्षा सूची तैयार करने और उसे नियमों के अनुसार संचालित करने के निर्देश दिए थे।

इस आदेश को राज्य सरकार ने डिवीजन बेंच में चुनौती दी, लेकिन अपील खारिज हो गई। बाद में सुप्रीम कोर्ट में दायर विशेष अनुमति याचिका भी वापस ले ली गई।

विभाग ने वर्ष 2021 में प्रतीक्षा सूची बनाकर याचिकाकर्ताओं को नियुक्ति दी, लेकिन उन्हें वरिष्ठता और वेतन निर्धारण का लाभ केवल नियुक्ति की तारीख से दिया गया। इसी को चुनौती देते हुए शिक्षकों ने हाईकोर्ट में नई याचिकाएं दायर कीं।

हाईकोर्ट ने क्या कहा

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ता मुख्य चयन सूची में नहीं थे, बल्कि प्रतीक्षा सूची के उम्मीदवार थे, इसलिए उन्हें मुख्य सूची से नियुक्त उम्मीदवारों के बराबर लाभ नहीं दिया जा सकता।

लेकिन अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि भर्ती नियम 1971 के नियम-20 के तहत प्रतीक्षा सूची तैयार करना अनिवार्य था और विभाग ने इस नियम का पालन नहीं किया। यही कारण है कि याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति में देरी हुई।

अदालत ने कहा कि जब देरी का कारण स्वयं प्रशासनिक लापरवाही है, तो उसका नुकसान उम्मीदवारों को नहीं उठाना चाहिए।

समानता के सिद्धांत पर फैसला

कोर्ट ने कहा कि यदि याचिकाकर्ताओं को 2021 से ही वरिष्ठता दी जाती है, तो वे उसी भर्ती प्रक्रिया के बावजूद बाद में हुई अन्य भर्तियों के उम्मीदवारों से भी जूनियर हो जाएंगे।

यह स्थिति संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता के सिद्धांत का उल्लंघन होगी।

अदालत ने यह भी माना कि विभाग ने पहले भी ऐसे मामलों में नियुक्ति में देरी होने पर नोशनल वरिष्ठता और वेतन निर्धारण का लाभ दिया है, इसलिए वर्तमान याचिकाकर्ताओं के साथ अलग व्यवहार करने का कोई औचित्य नहीं है।

60 दिन में आदेश लागू करें

फैसले में कोर्ट ने कहा कि प्रतीक्षा सूची से नियुक्त शिक्षकों को उसी भर्ती प्रक्रिया के अन्य उम्मीदवारों के समान वरिष्ठता और वेतन निर्धारण दिया जाए।

हालांकि चूंकि उन्होंने उस अवधि में वास्तविक कार्य नहीं किया था, इसलिए उन्हें पिछली अवधि का वास्तविक वेतन या अन्य वित्तीय लाभ नहीं मिलेगा।

साथ ही अदालत ने राज्य सरकार और संबंधित विभागों को निर्देश दिया कि निर्णय की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने के 60 दिनों के भीतर आवश्यक आदेश जारी किए जाएं।

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