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“माइट बी डेंजरस” या “संभवतः जानलेवा” जैसे अनुमान नहीं-ठोस वैज्ञानिक राय दें डॉक्टर, राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्यभर में एक समान मेडिको-लीगल रिपोर्ट जारी करने के दिए आदेश

Rajasthan High Court Orders Uniform Medico-Legal Guidelines, Criticizes Vague Medical Reports in Criminal Cases

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि आपराधिक मामलों में डॉक्टरों द्वारा तैयार की जाने वाली मेडिको-लीगल रिपोर्ट (MLR) यदि अस्पष्ट, अधूरी या अनुमान आधारित हो तो इससे न्याय प्रक्रिया गंभीर रूप से प्रभावित होती है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने अनुमान आधारित मेडिकल रिपोर्ट को न्याय व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा बताते हुए चेतावनी दी कि यदि चिकित्सकीय राय स्पष्ट, वैज्ञानिक और ठोस आधार पर नहीं होगी तो इससे निर्दोष व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई या अपराधी के बच निकलने की संभावना बढ़ जाती है।

जस्टिस चंद्र प्रकाश श्रीमाली ने एक जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए राजस्थान सरकार को आदेश दिया है कि राजस्थान के सभी सरकारी डॉक्टरों के लिए एक समान और स्पष्ट मेडिको-लीगल गाइडलाइन तैयार की जाए, ताकि अदालतों को भविष्य में सटीक और विश्वसनीय मेडिकल राय मिल सके।

हाईकोर्ट ने करौली जिले के श्रीमहावीरजी थाने में दर्ज एक आपराधिक मामले में आरोपी गौतम की जमानत याचिका को मंजूर करते हुए रिहा करने का आदेश दिया है।

याचिका में दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता स्वप्निल सिंह पटेल ने पैरवी करते हुए दलीलें दी कि अभियुक्त गौतम के विरुद्ध लगाए गए आरोप तथ्यात्मक रूप से संदिग्ध हैं और जांच के दौरान कई महत्वपूर्ण विरोधाभास सामने आए हैं, जिनसे अभियोजन की कहानी कमजोर प्रतीत होती है।

अधिवक्ता ने दलील दी कि गवाहों और स्वयं घायल के धारा 180 BNSS के तहत दर्ज बयानों में चोट लाठी से लगने की बात सामने आयी हैं जबकि एफआईआर में फावड़े से लिखा गया हैं.

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि चिकित्सकीय रिपोर्ट में डॉक्टर राय अस्पष्ट और अनुमान आधारित है, सामान्य टिप्पणी को गंभीर अपराध सिद्ध करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।

अधिवक्ता ने यह भी आरोप लगाया कि जांच अधिकारी ने चिकित्सकीय रिपोर्ट को स्थापित चिकित्सा सिद्धांतों के विपरीत प्रस्तुत किया है, जिससे शिकायतकर्ता पक्ष को अनुचित लाभ मिल सके।

“माइट बी डेंजरस” जैसी भाषा स्वीकार नहीं: कोर्ट

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि डॉक्टरों द्वारा रिपोर्ट में अक्सर ऐसी भाषा लिख दी जाती है, जैसे “चोट जानलेवा हो सकती है” या “समय पर इलाज न मिलता तो मौत हो सकती थी”।

हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसी संभावनाओं पर आधारित राय न्यायिक प्रक्रिया के लिए पर्याप्त नहीं है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विशेषज्ञ की राय स्पष्ट, निश्चित और वैज्ञानिक आधार पर होनी चाहिए। केवल अनुमान या संभावना पर आधारित रिपोर्ट को विशेषज्ञ राय नहीं माना जा सकता।

जमानत मामले की सुनवाई में उठे बड़े सवाल

दरअसल यह मामला करौली जिले के श्रीमहावीरजी थाना क्षेत्र में दर्ज एक आपराधिक प्रकरण से जुड़ा है। आरोप था कि आरोपी गौतम ने अमर सिंह पर हमला कर उसे गंभीर चोट पहुंचाई।

एफआईआर में आरोप लगाया गया था कि आरोपी ने फावड़े से सिर पर वार किया, लेकिन जांच के दौरान गवाहों और घायल के बयान में कहा गया कि हमला लाठी से किया गया था।

हाईकोर्ट ने इस विरोधाभास को भी महत्वपूर्ण माना और कहा कि जांच के दौरान हथियार के संबंध में स्पष्टता जरूरी है।

मेडिकल रिपोर्ट को लेकर कोर्ट की कड़ी टिप्पणी

सुनवाई के दौरान अदालत के सामने जो मेडिकल रिपोर्ट पेश की गई, उसमें कहा गया कि एक चोट गंभीर है और समय पर इलाज न मिलता तो मृत्यु हो सकती थी।

लेकिन अदालत ने पाया कि रिपोर्ट में:

  • चोट की लंबाई, चौड़ाई और गहराई का स्पष्ट उल्लेख नहीं है
  • चोट किस प्रकार के हथियार से लगी, इसका स्पष्ट विवरण नहीं है
  • यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि चोट सामान्य परिस्थितियों में मृत्यु का कारण बन सकती थी या नहीं

हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसी अधूरी रिपोर्ट न्यायिक प्रक्रिया को भ्रमित कर सकती है।

डॉक्टर की राय अदालत के लिए महत्वपूर्ण

हाईकोर्ट ने कहा कि आपराधिक मामलों में डॉक्टरों की राय अक्सर सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य बन जाती है।

अदालतें कई बार चिकित्सकीय राय को विशेषज्ञ मत मानते हुए उस पर भरोसा करती हैं।

लेकिन यदि यह राय अस्पष्ट, अपूर्ण या अनुमान आधारित हो तो न्याय प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है और गलत निर्णय की संभावना बढ़ जाती है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हवाला

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी उल्लेख किया और कहा कि यदि विशेषज्ञ की रिपोर्ट अधूरी या सतही हो तो उसका कोई विशेष महत्व नहीं रह जाता।

हाईकोर्ट ने कहा कि विशेषज्ञ राय तभी उपयोगी होती है, जब उसमें तथ्यों का विश्लेषण, वैज्ञानिक आधार और स्पष्ट निष्कर्ष मौजूद हों।

संविधान के अधिकारों का भी सवाल

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि अस्पष्ट मेडिकल रिपोर्ट केवल तकनीकी कमी नहीं, बल्कि यह संवैधानिक अधिकारों से भी जुड़ा मामला है।

अदालत ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को निष्पक्ष न्याय प्रक्रिया का अधिकार देता है।

यदि मेडिकल रिपोर्ट अस्पष्ट होगी तो:

  • आरोपी को गलत तरीके से दोषी ठहराया जा सकता है
  • पीड़ित को न्याय मिलने में कठिनाई हो सकती है

इसी प्रकार अनुच्छेद 14 के तहत सभी को कानून के समक्ष समानता का अधिकार है, लेकिन अलग-अलग मामलों में अलग गुणवत्ता की मेडिकल रिपोर्ट से न्याय में असमानता पैदा हो सकती है।

राजस्थान सरकार को दिए सख्त निर्देश

हाईकोर्ट ने इस समस्या को गंभीर मानते हुए राज्य सरकार को कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए।

अदालत ने राजस्थान के मुख्य सचिव को आदेश दिया कि स्वास्थ्य विभाग के माध्यम से राज्य के सभी सरकारी डॉक्टरों के लिए मानकीकृत मेडिको-लीगल दिशानिर्देश तैयार किए जाएं।

इन दिशानिर्देशों में यह सुनिश्चित किया जाए कि हर मेडिकल रिपोर्ट में निम्नलिखित विवरण अनिवार्य रूप से हों:

  • चोट की प्रकृति और प्रकार
  • शरीर के किस हिस्से पर चोट लगी
  • चोट का आकार, लंबाई और गहराई
  • संभावित हथियार या उपकरण
  • चोट के तत्काल और दीर्घकालिक प्रभाव

पुलिस विभाग को भी चेतावनी

हाईकोर्ट ने पुलिस विभाग को भी आदेश दिया कि जांच अधिकारी डॉक्टर से प्राप्त मेडिकल रिपोर्ट को बिना जांचे स्वीकार न करें।

पुलिस को यह सुनिश्चित करना होगा कि रिपोर्ट में हर चोट को स्पष्ट रूप से साधारण, गंभीर या जानलेवा के रूप में वर्गीकृत किया गया हो।

अदालत ने कहा कि “माइट बी डेंजरस” या “संभवतः जानलेवा” जैसे शब्दों से बचना चाहिए, जब तक कि उसके पीछे स्पष्ट चिकित्सा आधार न दिया गया हो।

लापरवाही पर कार्रवाई की चेतावनी

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि यदि कोई अधिकारी या डॉक्टर मेडिको-लीगल रिपोर्ट तैयार करने में लापरवाही करता है तो उसके खिलाफ प्रशासनिक या अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है।

अदालत ने कहा कि गलत या अस्पष्ट रिपोर्ट से अपराधी बच सकते हैं और न्याय व्यवस्था कमजोर हो सकती है।

आरोपी को मिली जमानत

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि आरोपी करीब चार महीने से जेल में है और मामले की चार्जशीट भी दाखिल हो चुकी है।

साथ ही सह-आरोपी को पहले ही जमानत मिल चुकी है और आरोपी के खिलाफ कोई अन्य आपराधिक मामला भी लंबित नहीं है।

इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने आरोपी को 1 लाख रुपये के निजी मुचलके और 50-50 हजार रुपये के दो जमानती पर जमानत देने का आदेश दिया।

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