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सरकारी ड्यूटी में की गई कार्रवाई पर बिना मंजूरी केस दर्ज नहीं किया जा सकता: राजस्थान हाईकोर्ट ने तत्कालिन JDA अधिकारी राजीव दत्ता के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द की

Rajasthan High Court Quashes Criminal Proceedings Against JDA Officer Rajeev Dutta, Says Prosecution Requires Prior Sanction

अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई को लेकर दर्ज FIR पर हाईकोर्ट सख्त; कहा-धारा 197 CrPC की मंजूरी के बिना कोर्ट संज्ञान नहीं ले सकती

जयपुर। सरकारी अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाने से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में राजस्थान हाईकोर्ट, जयपुर पीठ ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी सरकारी अधिकारी ने अपने आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान कार्रवाई की है, तो उसके खिलाफ मुकदमा चलाने से पहले सक्षम प्राधिकरण की मंजूरी अनिवार्य है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिना सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के उस पर मुकदमा चलाना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जा सकता है।

हाईकोर्ट ने जयपुर विकास प्राधिकरण (JDA) के एक तत्कालीन प्रवर्तन अधिकारी (Enforcement Officer) राजीव दत्ता के खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही को रद्द करते हुए कहा कि बिना पूर्व स्वीकृति के अदालत द्वारा संज्ञान लेना कानूनन सही नहीं था।

जस्टिस प्रमिल कुमार माथुर की एकलपीठ ने राजीव दत्ता द्वारा दायर आपराधिक याचिका पर सुनवाई करते हुए उनके खिलाफ ट्रायल कोर्ट और रिविजनल कोर्ट द्वारा दिए गए आदेशों को रद्द कर दिया है।

क्या है पूरा मामला

मामले की शुरुआत वर्ष 2002 में जयपुर के बजाज नगर थाना क्षेत्र में दर्ज एक शिकायत से हुई थी।

शिकायतकर्ता विजय शर्मा ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराते हुए आरोप लगाया था कि 6 मार्च 2002 की सुबह लगभग 5 से 6 बजे के बीच करीब 50 से 60 लोग कई वाहनों के साथ मौके पर पहुंचे और परिसर में घुसकर दीवार और गेट को तोड़ दिया।

शिकायत में कहा गया कि इस दौरान संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया और मौके पर मौजूद लोगों को चोटें भी आईं।

यह भी आरोप लगाया गया कि यह कार्रवाई तत्कालीन अधिकारियों के निर्देश पर की गई थी।

इस शिकायत के आधार पर पुलिस ने IPC की धारा 147, 451, 323 और 427 के तहत FIR दर्ज कर जांच शुरू की।

हालांकि पुलिस जांच के बाद अदालत में नेगेटिव फाइनल रिपोर्ट पेश कर दी गई।

लेकिन शिकायतकर्ता ने इसके खिलाफ प्रोटेस्ट पिटीशन दायर की, जिस पर विचार करते हुए मजिस्ट्रेट ने 10 फरवरी 2009 को राजीव दत्ता के खिलाफ संज्ञान ले लिया।

बाद में 21 मई 2018 को रिविजनल कोर्ट ने भी इस आदेश को बरकरार रखा।

इसी आदेश को चुनौती देते हुए राजीव दत्ता ने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।

याचिकाकर्ता की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विभूति भूषण शर्मा ने अदालत में दलील दी कि उस समय राजीव दत्ता जयपुर विकास प्राधिकरण में Enforcement Officer के पद पर कार्यरत थे और उन्होंने जो कार्रवाई की थी, वह सार्वजनिक भूमि से अतिक्रमण हटाने के लिए की गई आधिकारिक कार्रवाई थी।

अधिवक्ता ने कहा कि यदि कोई सरकारी अधिकारी अपने आधिकारिक कर्तव्यों का पालन करते हुए कार्रवाई करता है, तो उसके खिलाफ मुकदमा चलाने से पहले CrPC की धारा 197 के तहत सक्षम प्राधिकारी की पूर्व मंजूरी आवश्यक होती है।

लेकिन इस मामले में न तो ऐसी कोई मंजूरी ली गई और न ही अदालतों ने इस कानूनी प्रावधान पर विचार किया। इसलिए ट्रायल कोर्ट और रिविजनल कोर्ट द्वारा पारित आदेश कानून के विपरीत हैं और उन्हें रद्द किया जाना चाहिए।

याचिकाकर्ता की ओर से सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए यह भी कहा गया कि सरकारी अधिकारियों को अनावश्यक आपराधिक मुकदमों से बचाने के लिए धारा 197 का प्रावधान बनाया गया है।

अधिवक्ता ने यह भी तर्क दिया कि यदि कोई अधिकारी अपने कर्तव्य के दौरान कार्रवाई करता है, तो भले ही उसमें प्रक्रिया संबंधी कोई त्रुटि या अधिकार से अधिक कार्रवाई का आरोप हो, फिर भी जब तक वह कार्रवाई आधिकारिक कर्तव्यों से जुड़ी है, तब तक अभियोजन चलाने से पहले सरकार की मंजूरी लेना अनिवार्य है।

इसके अलावा यह भी कहा गया कि जयपुर विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1982 की धारा 78 भी अधिकारियों को संरक्षण प्रदान करती है। इस प्रावधान के अनुसार यदि कोई अधिकारी कानून के तहत और सद्भावना में कार्रवाई करता है, तो उसके खिलाफ मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।

इन सभी तथ्यों के आधार पर याचिकाकर्ता ने अदालत से अनुरोध किया कि ट्रायल कोर्ट और रिविजनल कोर्ट के आदेशों को रद्द करते हुए उनके खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को समाप्त किया जाए।

राज्य/प्रतिवादी का पक्ष

दूसरी ओर राज्य सरकार की ओर से पेश लोक अभियोजक ने याचिकाकर्ता की दलीलों का विरोध किया और कहा कि ट्रायल कोर्ट तथा रिविजनल कोर्ट द्वारा पारित आदेश पूरी तरह से वैध और उचित हैं।

राज्य की ओर से यह कहा गया कि शिकायतकर्ता की रिपोर्ट के आधार पर पुलिस ने मामले की जांच की और घटना से जुड़े तथ्यों को देखते हुए अदालत ने संज्ञान लिया था। इसलिए यह कहना सही नहीं है कि अदालत ने बिना आधार के कार्रवाई की है।

हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले का मुख्य कानूनी प्रश्न यह है कि क्या किसी सरकारी अधिकारी के खिलाफ उसके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन से जुड़े कार्य के लिए धारा 197 CrPC के तहत पूर्व स्वीकृति आवश्यक थी या नहीं।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि यदि किसी सरकारी अधिकारी के खिलाफ आरोपित कार्य उसके आधिकारिक कर्तव्यों से सीधे तौर पर जुड़ा है, तो उसके खिलाफ मुकदमा चलाने से पहले सरकार की मंजूरी लेना अनिवार्य है।

कोर्ट ने कहा कि कानून का उद्देश्य यह है कि सरकारी अधिकारियों को उनके कर्तव्यों के पालन के दौरान अनुचित या दुर्भावनापूर्ण मुकदमों से बचाया जा सके।

अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई थी

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए पाया कि जिस घटना को लेकर शिकायत दर्ज हुई थी, वह सार्वजनिक भूमि से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई से जुड़ी थी।

अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि इसी घटना से जुड़े एक अन्य मामले में पहले ही यह पाया जा चुका है कि अतिक्रमण हटाने का प्रस्ताव JDA के सक्षम अधिकारियों द्वारा अनुमोदित किया गया था और कार्रवाई उनके निर्देशों के तहत की गई थी।

ऐसी स्थिति में यह स्पष्ट है कि संबंधित अधिकारी ने कार्रवाई अपने आधिकारिक कर्तव्यों के तहत और सक्षम प्राधिकारी के निर्देशों के अनुसार की थी।

JDA अधिनियम के तहत भी संरक्षण

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि JDA Act, 1982 की धारा 78 के तहत भी प्राधिकरण के अधिकारियों को संरक्षण दिया गया है।

इस प्रावधान के अनुसार यदि कोई अधिकारी कानून के तहत और सद्भावना में कोई कार्रवाई करता है, तो उसके खिलाफ मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।

अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो कि अधिकारी ने दुर्भावना या गलत उद्देश्य से कार्रवाई की थी।

हाईकोर्ट का अंतिम आदेश

इन सभी तथ्यों और कानूनी प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि बिना पूर्व स्वीकृति के मजिस्ट्रेट द्वारा संज्ञान लेना कानून के विरुद्ध था।

अदालत ने 10 फरवरी 2009 को ट्रायल कोर्ट द्वारा लिया गया संज्ञान और 21 मई 2018 को रिविजनल कोर्ट द्वारा पारित आदेश दोनों को रद्द कर दिया

इसके साथ ही अदालत ने आरोपी अधिकारी के खिलाफ चल रही सभी आपराधिक कार्यवाहियों को भी निरस्त कर दिया

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