राजस्थान हाईकोर्ट ने NDPS मामलों में “बिना ठोस सबूत” लोगों को फंसाने पर उठाए सवाल, कहा चार्जशीट भेजने से पहले पर्याप्त विचार जरूरी
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने NDPS मामलों में जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा है कि किसी व्यक्ति को केवल मुख्य आरोपी के बयान के आधार पर आरोपी बना देना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।
राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्ति को ट्रायल के लिए भेजने से पहले उसके खिलाफ पर्याप्त और कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्य होना आवश्यक है।
यह महत्वपूर्ण टिप्पणी जस्टिस अशोक कुमार जैन की एकलपीठ ने NDPS Act के तहत दर्ज एक मामले में आरोपी को ज़मानत देते हुए की।
अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई प्रत्यक्ष बरामदगी नहीं हुई थी और उसे केवल मुख्य आरोपी द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर मामले में शामिल किया गया।
मुख्य आरोपी के बयान पर मामला
मामले में अभियोजन पक्ष का दावा था कि मुख्य आरोपी जवान सिंह के पास से बरामद नशीले पदार्थों की खेप का एक हिस्सा याचिकाकर्ता को दिया जाना था।
पुलिस ने इसी कथित सूचना के आधार पर याचिकाकर्ता को NDPS Act के तहत आरोपी बना दिया।
हालांकि, अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता से कोई भी नशीला पदार्थ बरामद नहीं हुआ और न ही ऐसा कोई स्वतंत्र साक्ष्य प्रस्तुत किया गया जिससे यह साबित हो सके कि वह प्रतिबंधित पदार्थों के कारोबार में शामिल था।
कोर्ट ने कहा कि केवल सह-आरोपी के बयान के आधार पर किसी व्यक्ति को लंबे समय तक हिरासत में रखना उचित नहीं माना जा सकता, विशेष रूप से तब जब जांच पूरी हो चुकी हो और आरोपी की आगे पूछताछ की आवश्यकता न हो।
“चार्जशीट भेजने से पहले पर्याप्त विचार जरूरी”
सुनवाई के दौरान अदालत के सामने सरकारी वकील की ओर से पेश पुलिस रिपोर्ट में यह उल्लेख किया गया कि किसी व्यक्ति के खिलाफ ट्रायल चलाने के लिए पर्याप्त साक्ष्य का मूल्यांकन करना पुलिस का कार्य नहीं है।
इस पर अदालत ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि यह दृष्टिकोण न्यायिक प्रक्रिया की मूल भावना के विपरीत है।
कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष को चार्जशीट दायर करने से पहले उपलब्ध साक्ष्यों का गंभीरता से परीक्षण करना चाहिए ताकि निर्दोष व्यक्तियों को अनावश्यक मुकदमों और हिरासत का सामना न करना पड़े।
अदालत ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को ट्रायल फेस करने के लिए भेजने से पहले यह देखना आवश्यक है कि उसके खिलाफ पर्याप्त सामग्री मौजूद है या नहीं।
यदि जांच या अभियोजन की प्रक्रिया में कोई कमी रह जाती है, तो इसका खामियाजा एक निर्दोष व्यक्ति को भुगतना पड़ सकता है।
ट्रायल कोर्ट को भी दिए महत्वपूर्ण निर्देश
कोर्ट ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट की जिम्मेदारी केवल चार्जशीट स्वीकार करना नहीं है, बल्कि आरोप तय करने के चरण में सभी तथ्यों और साक्ष्यों का स्वतंत्र रूप से परीक्षण करना भी है।
अदालत ने कहा कि यदि रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री आरोपी के खिलाफ प्रथमदृष्टया मामला स्थापित नहीं करती, तो ट्रायल कोर्ट को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
निर्दोष लोगों को मुआवज़ा देने की बात
अपने आदेश में अदालत ने BNSS की धारा 273 का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि किसी निर्दोष व्यक्ति को बिना पर्याप्त आधार के हिरासत में रखा जाता है या उसके खिलाफ अनावश्यक कानूनी कार्रवाई होती है, तो उसे मुआवज़ा देने की व्यवस्था पर भी विचार किया जाना चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि न्याय व्यवस्था का उद्देश्य केवल अपराधियों को दंडित करना नहीं, बल्कि निर्दोष लोगों की स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा करना भी है।
गृह विभाग और DGP को भेजे गए आदेश
मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने अपने आदेश की प्रति राजस्थान सरकार के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) और पुलिस महानिदेशक (DGP) को भेजने के निर्देश दिए।
कोर्ट ने कहा कि कई मामलों में “जमीनी स्तर पर उचित विचार नहीं किए जाने” के कारण निर्दोष लोगों को अनावश्यक परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
इसलिए जांच और अभियोजन की प्रक्रिया में अधिक संवेदनशीलता और कानूनी सतर्कता बरतना आवश्यक है।
आरोपी को मिली ज़मानत
सभी परिस्थितियों और उपलब्ध रिकॉर्ड पर विचार करने के बाद अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता अक्षय को आगे हिरासत में रखने का कोई औचित्य नहीं है। इसी आधार पर कोर्ट ने आरोपी को नियमित ज़मानत प्रदान कर दी।