कोटा में सैकड़ों किसानों के साथ धोखाधड़ी के मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने एक्सिस बैंक को लगाई फटकार, कहा-कोर्ट के आदेश सभी पर समान रूप से लागू
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने एक रिपोर्टेबल फैसले के जरिए नज़ीर कायम करते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि “कोई भी व्यक्ति या संस्था, चाहे वह कितनी ही बड़ी क्यों न हो, कानून और अदालत के आदेशों से ऊपर नहीं है।”
जस्टिस अनूप कुमार ढंड की एकलपीठ ने एक्सिस बैंक लिमिटेड द्वारा दायर आपराधिक याचिका को खारिज करते हुए निचली अदालत के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें बैंक को किसानों की राशि से जुड़ी फिक्स्ड डिपॉजिट की रकम वापस जमा कराने के आदेश दिए गए थे।
सैकड़ों किसानों से धोखाधड़ी का मामला
यह मामला कोटा जिले के बापावर क्षेत्र से जुड़ा है, जहां वर्ष 2011 में सैकड़ों किसानों के साथ बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी का आरोप सामने आया था।
किसानों ने शिकायत की थी कि कुछ व्यापारियों ने उनके अनाज और कृषि उपज को ऊंचे दामों पर बेचने का लालच देकर गोदामों में रखवाया, लेकिन बाद में कच्ची रसीदें देकर फरार हो गए।
जांच में सामने आया कि किसानों की उपज को कागजों में अपनी फर्मों के नाम पर दिखाकर, उसी स्टॉक को गिरवी रखकर एक्सिस बैंक से लगभग 9 करोड़ रुपये का ऋण ले लिया गया।
मामले में पुलिस ने करीब 418 से अधिक किसानों की शिकायतों के आधार पर एफआईआर दर्ज की।
ट्रायल कोर्ट का आदेश
जांच के दौरान यह भी पाया गया कि लगभग 57,911 क्विंटल कृषि उपज चार गोदामों में रखी गई थी।
चूंकि यह उपज नाशवान थी, इसलिए ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 2012 में इसे नीलाम कराने का आदेश दिया और नीलामी से प्राप्त राशि को एक्सिस बैंक में कोर्ट के नाम पर फिक्स्ड डिपॉजिट (FDR) में जमा कराने के आदेश दिए।
इस आदेश को चुनौती दी गई, लेकिन हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट तक से इसे बरकरार रखा गया।
इसके बावजूद, एक्सिस बैंक ने बाद में ऋण वसूली अधिकरण (DRT) से मिले एक आदेश के आधार पर एफडीआर की बड़ी राशि—करीब 8.20 करोड़ रुपये—अपने खाते में समायोजित कर ली।
निचली अदालत ने इसे कोर्ट के आदेशों की अवहेलना मानते हुए 16 अक्टूबर 2025 को बैंक को आदेश दिया कि वह पूरी राशि ब्याज सहित वापस जमा करे, अन्यथा बैंक के सीईओ और संबंधित शाखा प्रबंधक के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
अधीनस्थ अदालत के इसी आदेश को बैंक की ओर से राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
बैंक की दलील
एक्सिस बैंक की ओर से हाईकोर्ट में दलील दी गई कि डीआरटी ने उसे अस्थायी रूप से राशि समायोजित करने की अनुमति दी थी और इसलिए निचली अदालत का आदेश डीआरटी के आदेश के विपरीत है।
याचिकाकर्ता बैंक के अधिवक्ता ने कहा कि डीआरटी, जयपुर द्वारा 20 अप्रैल 2018 को दिए गए आदेश को ऋणी द्वारा ऋण वसूली अपीलीय अधिकरण में चुनौती दी गई थी, किंतु वह अपील खारिज हो गई।
अधिवक्ता ने कहा कि डीआरटी द्वारा दी गई अनुमति के आधार पर बैंक ने एफडीआर की राशि का समायोजन किया।
सरकार का जवाब
वहीं राज्य सरकार और अन्य पक्षों ने दलील दी कि एफडीआर कोर्ट की संपत्ति थी और बिना अदालत की अनुमति उसे भुनाना अवैध है।
अन्य पक्षकारों ने अदालत को बताया कि एक्सिस बैंक ने डीआरटी के समक्ष तथ्यों को छुपाकर आदेश प्राप्त किया है।
विरोध में कहा गया कि बैंक ने डीआरटी को यह नहीं बताया कि ट्रायल कोर्ट के बाद हाईकोर्ट भी इस मामले में आदेश दे चुका है।
सरकार ने कहा कि कोर्ट द्वारा पारित आदेशों को डीआरटी के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया, जिसके कारण डीआरटी ने अज्ञानतावश दिनांक 20.04.2018 का आदेश पारित किया। यदि ये तथ्य प्रस्तुत किए जाते, तो उक्त आदेश पारित ही नहीं होता।
हाईकोर्ट का आदेश
जस्टिस अनूप कुमार ढंड ने अपने विस्तृत फैसले में कहा कि बैंक ने डीआरटी के समक्ष यह तथ्य छिपाया कि ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट पहले ही इस राशि से संबंधित स्पष्ट आदेश पारित कर चुके हैं।
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि ये तथ्य डीआरटी के सामने रखे जाते, तो ऐसा आदेश पारित ही नहीं होता।
कोर्ट ने सख्त शब्दों में कहा कि अदालतों के आदेशों का पालन करना हर संस्था की जिम्मेदारी है और उनका उल्लंघन लोकतंत्र की बुनियाद—Rule of Law—पर सीधा हमला है।
अदालत संयम बरत रही…
फैसले में यह भी कहा गया कि बैंक जैसे कानूनी निकाय से यह अपेक्षा की जाती है कि वह कानून का पालन उदाहरण के रूप में करे, न कि आदेशों की अवहेलना करे।
हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वह इस मामले में संयम बरत रही है, लेकिन यह संदेश देना आवश्यक है कि “कोई भी, चाहे वह कितना ही ऊंचे पद पर क्यों न हो, कानून से ऊपर नहीं है।”
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में माना कि निचली अदालत का आदेश पूरी तरह वैध है, उसमें किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है और एक्सिस बैंक की याचिका को खारिज कर दिया।