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चीफ जस्टिस मास्टर ऑफ रोस्टर, लेकिन रोस्टर का अधिकार नियमों को खत्म नहीं कर सकता-राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: क्रिमिनल रिट याचिकाओं की अलग रजिस्ट्रेशन व्यवस्था फिर बहाल

Rajasthan High Court Restores Separate Registration of Criminal Writ Petitions, Overrules July 2026 Verdict
पूर्व कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा की खंडपीठ का फैसला पलटा; फुल बेंच ने Rule 315(1)(h) को माना अनिवार्य, दो सप्ताह में लंबित आपराधिक रिट याचिकाओं का दोबारा पंजीकरण करने के आदेश

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने आपराधिक मामलों से जुड़ी रिट याचिकाओं के रजिस्ट्रेशन को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए क्रिमिनल रिट पिटीशन की अलग रजिस्ट्रेशन व्यवस्था को फिर से बहाल कर दिया है।

क्रिमिनल रिट पिटीशन के अलग पंजीकरण को लेकर चल रहे कानूनी विवाद पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए राजस्थान हाईकोर्ट की फुल बेंच ने 7 जुलाई 2026 में तत्कालीन कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा की अध्यक्षता वाली खंडपीठ द्वारा दिए गए फैसले को ओवररूल कर दिया है।

फूल बेंच ने कहा कि संविधान में ‘क्रिमिनल रिट पिटीशन’ नाम से कोई अलग संवैधानिक अधिकार क्षेत्र नहीं है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि हाईकोर्ट अपने वैधानिक नियमों के तहत ऐसी याचिकाओं का अलग वर्गीकरण नहीं कर सकता।

अब आपराधिक मामलों से उत्पन्न होने वाली रिट याचिकाएं राजस्थान हाईकोर्ट रूल्स के नियम 315(1)(h) के तहत अलग से ‘क्रिमिनल रिट पिटीशन’ के रूप में दर्ज की जाएंगी।

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजय के. अग्रवाल, जस्टिस समीर जैन और जस्टिस अनरूप सिंघी की फुल बेंच ने रविकुमार की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया हैं.

फूल बेंच ने स्पष्ट किया कि राजस्थान हाईकोर्ट के नियम 315(1)(h) में आपराधिक मामलों से संबंधित रिट याचिकाओं के अलग रजिस्ट्रेशन का प्रावधान है।

फूल बेंच ने कहा कि जुलाई 2026 में दिए गए पूर्व फैसले में इस महत्वपूर्ण नियम पर विचार नहीं किया गया था। इसलिए उस फैसले का यह निष्कर्ष कि ऐसी याचिकाओं को अलग से क्रिमिनल रिट पिटीशन के रूप में दर्ज नहीं किया जा सकता, कानून के प्रासंगिक प्रावधान की अनदेखी के कारण प्रभावी नहीं रह सकता।

पूर्व कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की डिवीजन बेंच का फैसला पलटा

दरअसल, जुलाई 2026 में तत्कालीन कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस मनीष शर्मा की खंडपीठ ने एक फैसले में कहा था कि संविधान में ‘क्रिमिनल रिट पिटीशन’ नाम से कोई अलग संवैधानिक श्रेणी मान्यता प्राप्त नहीं है।

खंडपीठ ने रजिस्ट्री को आदेश दिया था कि आपराधिक मामलों से जुड़ी याचिकाओं को अलग से ‘क्रिमिनल रिट पिटीशन’ के नाम से दर्ज करना बंद किया जाए और उन्हें सामान्य रिट याचिकाओं के रूप में पंजीकृत किया जाए।

इस फैसले के बाद आपराधिक मामलों से संबंधित रिट याचिकाओं के पंजीकरण की प्रक्रिया को लेकर कानूनी स्थिति पर सवाल उठे।

इसके बाद जस्टिस आनंद शर्मा ने इस मुद्दे पर संदर्भ (Reference) फुल बेंच के समक्ष भेजा था।

चीफ जस्टिस मास्टर ऑफ रोस्टर, लेकिन रोस्टर का अधिकार नियमों को खत्म नहीं कर सकता

फुल बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले State of Rajasthan v. Prakash Chand, (1998) 1 SCC 1 का हवाला देते हुए कहा कि मुख्य न्यायाधीश मास्टर ऑफ रोस्टर होते हैं और जजों को मुख्य न्यायाधीश द्वारा आवंटित कार्य के अनुसार ही न्यायिक कार्य करना होता है।

हालांकि, कोर्ट ने इसके साथ यह भी स्पष्ट किया कि मुख्य न्यायाधीश का रोस्टर आवंटित करने का अधिकार और हाईकोर्ट का नियम बनाने का अधिकार अलग-अलग हैं।

किसी रोस्टर संबंधी निर्देश से कोई वैधानिक प्रक्रियात्मक नियम अपने आप समाप्त या अमान्य नहीं हो जाता।

जब तक कोई नियम लागू है, तब तक उसे केवल न्यायिक आदेश के आधार पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

यदि किसी नियम को अमान्य घोषित करना है, तो उसके लिए उचित कानूनी आधार आवश्यक है।

कोर्ट ने कहा कि न्यायिक आदेश और वैधानिक नियमों के बीच सामंजस्यपूर्ण व्याख्या की जानी चाहिए, ताकि दोनों को प्रभावी बनाया जा सके।

जुलाई के फैसले को Per Incuriam क्यों माना?

फुल बेंच ने कहा कि Jiya मामले में 7 जुलाई 2026 को दिए गए फैसले में राजस्थान हाईकोर्ट रूल्स के नियम 315(1)(h) के स्पष्ट प्रावधान पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया।

इस नियम में आपराधिक मामलों से संबंधित अनुच्छेद 226 की रिट याचिकाओं को क्रिमिनल मिसलेनियस केस के रूप में दर्ज करने का स्पष्ट प्रावधान मौजूद है।

ऐसे में केवल यह कहकर कि संविधान में ‘Criminal Writ Petition’ नाम की कोई अलग श्रेणी नहीं है, इस वैधानिक प्रावधान को निष्प्रभावी नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने State of U.P. v. Synthetics and Chemicals Ltd., (1991) 4 SCC 139 का उल्लेख करते हुए Per Incuriam के सिद्धांत को भी समझाया।

फुल बेंच ने कहा कि जुलाई के फैसले का वह हिस्सा, जिसमें आपराधिक रिट याचिकाओं का क्रिमिनल साइड में पंजीकरण रोक दिया गया था, संबंधित वैधानिक नियम पर विचार किए बिना दिया गया था।

इसलिए वह निष्कर्ष Per Incuriam है और नियम 315(1)(h) के स्पष्ट प्रावधान के विरुद्ध बाध्यकारी नहीं रह सकता।

क्या था पूरा विवाद?

विवाद राजस्थान हाईकोर्ट में आपराधिक मामलों से संबंधित रिट याचिकाओं के पंजीकरण और उनकी सुनवाई के लिए उचित बेंच निर्धारित करने को लेकर था।

दरअसल, राजस्थान हाईकोर्ट में लंबे समय से आपराधिक मामलों से संबंधित रिट याचिकाओं को ‘Criminal Writ Petition’ के रूप में दर्ज करने की परंपरा रही है।

इसके तहत ऐसी याचिकाओं को क्रिमिनल साइड की प्रक्रिया के अनुसार पंजीकृत किया जाता था और संबंधित रोस्टर के अनुसार बेंच के सामने सूचीबद्ध किया जाता था।

हालांकि, 7 जुलाई 2026 को जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस मनीष शर्मा की डिवीजन बेंच ने Jiya & Others v. Government of Rajasthan & Others मामले में इस व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा था कि संविधान में क्रिमिनल रिट पिटीशन नाम की कोई अलग श्रेणी नहीं है।

डिवीजन बेंच ने आदेश दिया था कि रजिस्ट्री भविष्य में किसी भी मामले को ‘Criminal Writ Petition’ के रूप में दर्ज नहीं करे।

ऐसी याचिकाओं को सामान्य रिट पिटीशन के रूप में ही पंजीकृत किया जाए और संबंधित रोस्टर के अनुसार सुनवाई के लिए रखा जाए।

बेंच ने उस मामले में पहले से दर्ज डिवीजन बेंच क्रिमिनल रिट पिटीशन को भी डिवीजन बेंच सिविल रिट पिटीशन में बदलने का निर्देश दिया था।

इस फैसले के बाद राजस्थान हाईकोर्ट के नियम 315(1)(h) और डिवीजन बेंच के निर्देशों के बीच कानूनी विरोधाभास की स्थिति पैदा हो गई।

जस्टिस आनंद शर्मा ने फुल बेंच को भेजा था रेफरेंस

इस विवाद ने तब नया मोड़ लिया, जब जस्टिस आनंद शर्मा एक सिविल रिट पिटीशन की सुनवाई कर रहे थे और उनके सामने 7 जुलाई के डिवीजन बेंच के आदेश तथा राजस्थान हाईकोर्ट रूल्स के नियम 315(1)(h) के बीच विरोधाभास का प्रश्न सामने आया।

इसके बाद जस्टिस आनंद शर्मा ने इस कानूनी प्रश्न को फुल बेंच के समक्ष रेफर किया।

फुल बेंच के सामने मुख्य रूप से पांच कानूनी सवाल रखे गए थे:

  1. क्या संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत आपराधिक मामले से संबंधित रिट याचिका को अलग से सिंगल बेंच क्रिमिनल रिट पिटीशन के रूप में दर्ज किया जा सकता है या उसे सिविल रिट पिटीशन के रूप में ही दर्ज करना होगा?
  2. क्या ‘Criminal Writ Petition’ केवल रजिस्ट्री का प्रशासनिक वर्गीकरण है या यह याचिका की वास्तविक आपराधिक प्रकृति को भी दर्शाता है?
  3. क्या राजस्थान हाईकोर्ट रूल्स के नियम 315(1)(h) को किसी न्यायिक निर्देश के माध्यम से निष्प्रभावी किया जा सकता है, जबकि उस नियम को असंवैधानिक या अवैध घोषित नहीं किया गया हो?
  4. क्या 7 जुलाई 2026 को Jiya मामले में दिया गया डिवीजन बेंच का फैसला नियम 315(1)(h) के अनुरूप है?
  5. यदि दोनों के बीच विरोधाभास है, तो क्या पूर्व फैसले पर पुनर्विचार के लिए मामले को बड़ी बेंच के पास भेजना आवश्यक है?

नियम 315(1)(h) की अनदेखी को माना अहम कानूनी चूक

फुल बेंच ने पूर्व फैसले पर विचार करते हुए कहा कि उसमें राजस्थान हाईकोर्ट रूल्स के नियम 315(1)(h) के वैधानिक प्रावधान पर ध्यान नहीं दिया गया था।

कोर्ट ने कहा कि पूर्व फैसले में इस नियम के प्रभाव और उसके तहत निर्धारित प्रक्रिया को लागू नहीं किया गया। इसलिए उस फैसले का संबंधित निष्कर्ष Per Incuriam की श्रेणी में आता है।

Per Incuriam का अर्थ है ऐसा न्यायिक निर्णय, जो किसी प्रासंगिक वैधानिक प्रावधान या बाध्यकारी कानूनी स्थिति पर विचार किए बिना दिया गया हो।

फुल बेंच ने स्पष्ट किया कि आपराधिक रिट याचिकाओं का अलग पंजीकरण संविधान के तहत कोई नया या स्वतंत्र अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) स्थापित नहीं करता है।

यह केवल हाईकोर्ट के नियमों के तहत एक प्रक्रियात्मक वर्गीकरण है, जिससे आपराधिक कार्यवाही से उत्पन्न होने वाली रिट याचिकाओं की पहचान की जा सके और उन्हें संबंधित रोस्टर के अनुसार उचित बेंच के समक्ष सूचीबद्ध किया जा सके।

दो सप्ताह में लंबित याचिकाओं का दोबारा होगा पंजीकरण

फुल बेंच ने हाईकोर्ट रजिस्ट्री को महत्वपूर्ण आदेश देते हुए कहा कि वर्तमान में लंबित वे सभी क्रिमिनल रिट याचिकाएं, जिन्हें किसी अन्य नाम या सामान्य रिट पिटीशन के रूप में दर्ज किया गया है, उन्हें दोबारा ‘क्रिमिनल रिट पिटीशन’ के रूप में रजिस्टर किया जाए।

कोर्ट ने इसके लिए दो सप्ताह की समयसीमा निर्धारित की है। साथ ही निर्देश दिया कि पुनः पंजीकरण और वर्गीकरण की प्रक्रिया शीघ्र पूरी की जाए, ताकि इन याचिकाओं की सुनवाई प्रभावित न हो।

भविष्य में दाखिल होने वाली याचिकाओं के लिए भी स्पष्ट निर्देश

कोर्ट ने भविष्य में दाखिल होने वाली याचिकाओं के संबंध में भी स्थिति स्पष्ट कर दी है।

फुल बेंच ने निर्देश दिया कि इस फैसले के बाद दाखिल होने वाली वे सभी रिट याचिकाएं, जो आपराधिक मामलों से उत्पन्न होती हैं और नियम 315(1)(h) के दायरे में आती हैं, उन्हें अनिवार्य रूप से ‘क्रिमिनल रिट पिटीशन’ के रूप में वर्गीकृत और पंजीकृत किया जाएगा।

ऐसी याचिकाओं को हाईकोर्ट के लागू नियमों और रोस्टर के अनुसार संबंधित बेंच के समक्ष सूचीबद्ध किया जाएगा।

2 नवंबर 2026 से लागू होगा फैसला, पुराने अंतिम आदेश प्रभावित नहीं होंगे

फुल बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि उसका फैसला 2 नवंबर 2026 से प्रभावी होगा।

हालांकि, इस तारीख से पहले अलग नाम से पंजीकृत याचिकाओं में पारित हो चुके फैसलों और अंतिम आदेशों पर इसका कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।

केवल इस आधार पर कि किसी याचिका का पंजीकरण अलग नाम से किया गया था, पहले से पारित निर्णयों या अंतिम आदेशों को दोबारा नहीं खोला जा सकेगा।

याचिकाकर्ता और प्रतिवादी पक्ष की ओर से कौन-कौन हुए पेश?

इस मामले में याचिकाकर्ता रवि कुमार की ओर से एडवोकेट नितिन जैन, एडवोकेट कृति कलावाटिया, एडवोकेट वैभव पारीक और एडवोकेट राजीव भूषण बंसल पेश हुए।

इसके अलावा राजस्थान हाईकोर्ट बार एसोसिएशन, जयपुर और जोधपुर के कई अधिवक्ताओं ने भी इस संदर्भ में अपने तर्क पेश किए.

राज्य सरकार की ओर से एडवोकेट जनरल राजेंद्र प्रसाद, उनके साथ एडवोकेट शीतांशु शर्मा और एडवोकेट धृति लड्ढा पेश हुए।

वहीं, गवर्नमेंट एडवोकेट कम एडिशनल एडवोकेट जनरल राजेश चौधरी के साथ एडवोकेट नेहा गोयल और एडवोकेट अमन अग्रवाल भी उपस्थित रहे।

इसके अलावा सीनियर एडवोकेट राजेश जोशी, सीनियर एडवोकेट विकास बालिया और अन्य अधिवक्ताओं ने भी सुनवाई में भाग लिया।

हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी: नियम 315(1)(h) में स्पष्ट है अलग पंजीकरण का प्रावधान

फुल बेंच ने राजस्थान हाईकोर्ट रूल्स, 1952 के नियम 315 का विस्तार से परीक्षण किया।

नियम 315(1) में उन आवेदनों का उल्लेख है, जिन्हें पेश किए जाने के बाद क्रिमिनल मिसलेनियस केस के रूप में पंजीकृत और नंबर दिया जाना है।

इसके उपनियम (h) में स्पष्ट रूप से प्रावधान है:

Application for the issue of a writ under Article 226 of the Constitution in a criminal matter.

अर्थात आपराधिक मामले में संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट जारी करने के लिए प्रस्तुत आवेदन भी इस नियम के अंतर्गत आते हैं।

कोर्ट ने कहा कि नियम 315(1)(h) आपराधिक मामलों से संबंधित रिट आवेदनों को क्रिमिनल मिसलेनियस मामलों की श्रेणी में रखने का स्पष्ट प्रावधान करता है। ऐसे में इस प्रावधान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने यह भी बताया कि नियम 315(1) के तहत जमानत, जमानत
निरस्तीकरण, किसी मामले को ट्रांसफर करने, दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 491 के तहत आवेदन और आपराधिक मामलों में रिट जारी करने के आवेदन को क्रिमिनल मिसलेनियस केस के रूप में दर्ज करने की व्यवस्था है।

इसलिए आपराधिक मामले से उत्पन्न रिट याचिका को सामान्य सिविल रिट के रूप में दर्ज करना नियम की मूल भावना के विपरीत होगा।

नियम 123(1) और 307 का भी किया उल्लेख

फुल बेंच ने अपने फैसले में राजस्थान हाईकोर्ट रूल्स के नियम 123(1) और नियम 307 का भी उल्लेख किया।

नियम 123(1) के अनुसार, यदि नियमों के भाग III, IV, V या VII में मौजूद किसी प्रावधान का दूसरे भाग के किसी नियम से विरोधाभास होता है, तो संबंधित भाग का प्रावधान प्रभावी रहेगा।

वहीं नियम 307 के तहत आपराधिक मामलों से संबंधित अपील, रिवीजन और अन्य आवेदन प्रस्तुत करने की प्रक्रिया निर्धारित है।

कोर्ट ने कहा कि नियम 315(1)(h) के तहत आपराधिक मामले में रिट याचिका को क्रिमिनल मिसलेनियस केस के रूप में दर्ज किया जाना चाहिए, न कि सामान्य रिट केस के रूप में।

क्रिमिनल और सिविल कार्यवाही में क्या है अंतर? सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी लिया आधार

फुल बेंच ने सिविल और क्रिमिनल कार्यवाही के बीच अंतर समझाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले Ram Kishan Fauji v. State of Haryana, (2017) 5 SCC 533 का उल्लेख किया।

इस फैसले के अनुसार, सिविल कार्यवाही वह होती है, जिसमें कोई व्यक्ति अपने नागरिक या वैधानिक अधिकार को लागू कराने के लिए न्यायालय से राहत मांगता है। इसमें अधिकारों की घोषणा, धन की वसूली, क्षतिपूर्ति, संपत्ति का कब्जा या व्यक्तिगत अधिकारों का निर्धारण शामिल हो सकता है।

इसके विपरीत, क्रिमिनल कार्यवाही वह होती है, जिसके परिणामस्वरूप दोष सिद्ध होने पर कारावास, जुर्माना, संपत्ति की जब्ती या अन्य आपराधिक दंड दिया जा सकता है।

कोर्ट ने कहा कि किसी कार्यवाही का स्वरूप केवल इस बात से तय नहीं होता कि राहत देने वाला न्यायाधिकरण कौन-सा है, बल्कि यह भी देखा जाना चाहिए कि किस अधिकार का उल्लंघन हुआ है और किस प्रकार की राहत मांगी गई है।

फुल बेंच ने यह भी उल्लेख किया कि Ram Kishan Fauji फैसले की शुद्धता पर सुप्रीम कोर्ट ने Sanjay Prasad v. Madhusudan Dwivedi & Others, 2026 INSC 1128 में सवाल उठाते हुए मामले को बड़ी बेंच के पास भेजा है। हालांकि, वर्तमान में Ram Kishan Fauji का निर्णय बाध्यकारी न्यायिक मिसाल बना हुआ है और हाईकोर्ट उससे बंधा हुआ है।

बॉम्बे हाईकोर्ट और केरल हाईकोर्ट के फैसलों का हवाला

फुल बेंच ने बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले M/s Nagpur Cable Operators’ Association v. Commissioner of Police, Nagpur का भी हवाला दिया.

इस फैसले में कहा गया था कि यदि अनुच्छेद 226 या 227 के तहत दायर याचिका ऐसी कार्यवाही से संबंधित है, जिसके परिणामस्वरूप कारावास, जुर्माना, मृत्युदंड या संपत्ति की जब्ती जैसे आपराधिक परिणाम हो सकते हैं, तो उसे क्रिमिनल रिट पिटीशन के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है।

इसमें आपराधिक जांच, पूछताछ, ट्रायल, अवैध हिरासत, शांति भंग की आशंका और सार्वजनिक शांति बनाए रखने से संबंधित मामलों को भी शामिल किया गया था।

फुल बेंच ने Ambalal Parihar v. State of Rajasthan में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हवाला दिया।

इसमें आपराधिक कार्यवाही से उत्पन्न याचिका को केवल किसी ऐसी बेंच के समक्ष सुनवाई प्राप्त करने के लिए सिविल रिट पिटीशन के रूप में पेश करने पर आपत्ति जताई गई थी, जिसे क्रिमिनल रिट मामलों की सुनवाई का रोस्टर आवंटित नहीं था।

इसके अतिरिक्त केरल हाईकोर्ट के N. Prakash v. Manoj Kumar फैसले का भी संदर्भ लिया गया।

जजों की सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणी: अलग वर्गीकरण का मतलब अलग संवैधानिक अधिकार क्षेत्र नहीं

फुल बेंच ने इस विवाद में एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर स्पष्ट किया।

कोर्ट ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 226 हाईकोर्ट को रिट जारी करने का अधिकार देता है।

संविधान अलग से ‘Civil Writ Jurisdiction’ और ‘Criminal Writ Jurisdiction’ नाम से दो स्वतंत्र संवैधानिक अधिकार क्षेत्र नहीं बनाता।

लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं है कि हाईकोर्ट अपने नियमों के तहत सिविल और क्रिमिनल मामलों से संबंधित रिट याचिकाओं का अलग-अलग वर्गीकरण नहीं कर सकता।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘Criminal Writ Petition’ की संज्ञा के दो पहलू हैं।

पहला, औपचारिक पहलू: याचिका का नाम, रजिस्ट्रेशन कोड और नंबरिंग व्यवस्था हाईकोर्ट की रजिस्ट्री और उसके नियमों से संबंधित प्रशासनिक प्रक्रिया है।

दूसरा, वास्तविक पहलू: याचिका की प्रकृति, विवाद का विषय और मांगी गई राहत यह तय करने में महत्वपूर्ण हो सकते हैं कि उसे किस रोस्टर वाली बेंच के सामने सुनवाई के लिए रखा जाना चाहिए।

इसलिए क्रिमिनल रिट पिटीशन का अलग वर्गीकरण केवल सांख्यिकीय या क्लेरिकल प्रक्रिया नहीं है। इसका न्यायिक कार्यवाही और मामलों के उचित आवंटन पर भी प्रभाव पड़ता है।

फुल बेंच ने दिए चार बड़े आदेश

फुल बेंच ने अपने फैसले के पैरा 48 में रजिस्ट्री और भविष्य की याचिकाओं के लिए चार प्रमुख आदेश जारी किए हैं।

  1. फैसला भविष्यलक्षी प्रभाव से लागू होगा

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसके द्वारा घोषित कानूनी स्थिति फैसले की तारीख यानी 2 नवंबर 2026 से प्रभावी होगी।

इससे पहले जिन मामलों में फैसले और अंतिम आदेश पारित हो चुके हैं, वे प्रभावित नहीं होंगे।

केवल पंजीकरण के अलग नाम के आधार पर उन मामलों को दोबारा नहीं खोला जाएगा।

  1. रजिस्ट्री सभी क्रिमिनल रिट याचिकाएं अलग से दर्ज करेगी

हाईकोर्ट रजिस्ट्री को आदेश दिया गया कि आपराधिक मामलों से संबंधित रिट याचिकाओं को राजस्थान हाईकोर्ट रूल्स के नियम 315(1)(h) और अन्य लागू नियमों के तहत ‘Criminal Writ Petition’ के नाम से स्वीकार, पंजीकृत और प्रोसेस किया जाए।

  1. लंबित याचिकाओं का दो सप्ताह में होगा पुनः पंजीकरण

जो आपराधिक रिट याचिकाएं वर्तमान में लंबित हैं, लेकिन किसी दूसरे नाम से दर्ज की गई हैं, उन्हें दो सप्ताह के भीतर दोबारा ‘Criminal Writ Petition’ के रूप में पंजीकृत किया जाएगा।

इसके बाद उन्हें संबंधित रोस्टर के अनुसार उचित बेंच के सामने रखा जाएगा।

कोर्ट ने यह भी कहा कि पुनर्वर्गीकरण की प्रक्रिया इतनी तेजी से पूरी हो कि लंबित मामलों की सुनवाई प्रभावित न हो।

  1. रजिस्ट्रार न्यायिक जारी करेंगे प्रशासनिक आदेश

रजिस्ट्रार (ज्यूडिशियल) को निर्देश दिया गया कि इन आदेशों के एकसमान क्रियान्वयन के लिए आवश्यक प्रशासनिक निर्देश जारी किए जाएं, ताकि क्रिमिनल रिट पिटीशन के पंजीकरण, वर्गीकरण और सूचीबद्ध करने में भविष्य में कोई अस्पष्टता न रहे।

2 नवंबर से नई व्यवस्था लागू, पुराने फैसले सुरक्षित

फुल बेंच ने अपने फैसले के पैरा 49 में स्पष्ट किया कि निर्णय को भविष्यलक्षी प्रभाव से लागू करने का उद्देश्य पहले से तय हो चुके मामलों की अंतिमता को सुरक्षित रखना है।

इसलिए 2 नवंबर 2026 से पहले पारित अंतिम निर्णयों और आदेशों को केवल इस आधार पर प्रभावित नहीं किया जाएगा कि संबंधित याचिका को पहले किसी अन्य नाम से पंजीकृत किया गया था।

वहीं लंबित मामलों और भविष्य में दाखिल होने वाली याचिकाओं पर नई व्यवस्था के अनुसार कार्रवाई होगी।

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