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RTI के नाम पर उत्तर पुस्तिका के लिए 1000 रुपये प्रोसेसिंग फीस वसूली गैरकानूनी: राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, यूनिवर्सिटी की गाइडलाइन रद्द

Rajasthan High Court: ₹1000 Processing Fee for Answer Sheet Copies Under RTI Illegal, RUHS Guidelines Quashed

कहा, RTI का उद्देश्य नागरिकों को सूचना तक आसान पहुंच बनाना, RTI कानून से अधिक शुल्क नहीं ले सकते विश्वविद्यालय

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा और सख्त फैसला सुनाते हुए कहा है कि किसी विश्वविद्यालय द्वारा छात्रों को उत्तर पुस्तिका (Answer Sheet) की कॉपी देने के लिए 1000 रुपये प्रोसेसिंग फीस वसूलना अवैध और मनमाना है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि RTI अधिनियम के तहत तय शुल्क से अधिक राशि नहीं ली जा सकती।

जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस संदीप शाह की खंडपीठ ने राजस्थान यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज (RUHS), जयपुर की उस गाइडलाइन को रद्द कर दिया, जिसमें उत्तर पुस्तिका की कॉपी देने के लिए 1000 रुपये प्रोसेसिंग फीस का प्रावधान किया गया था।

छात्रा ने RTI से मांगी थी उत्तर पुस्तिका

मामला जोधपुर निवासी विपिका नाम की छात्रा से जुड़ा है, जिसने राजस्थान यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज से बीएससी नर्सिंग की पढ़ाई की थी।

अंतिम वर्ष के परिणाम में वह दो विषयों में अनुत्तीर्ण हो गई थी।

परिणाम के बाद छात्रा ने RTI अधिनियम के तहत अपनी उत्तर पुस्तिकाओं की प्रमाणित प्रतियां मांगते हुए आवेदन किया और निर्धारित शुल्क जमा कराया।

लेकिन विश्वविद्यालय ने छात्रा को जवाब देते हुए कहा कि उत्तर पुस्तिका की कॉपी देने के लिए प्रति उत्तर पुस्तिका 1000 रुपये प्रोसेसिंग फीस, इसके अलावा 80 रुपये फोटोकॉपी शुल्क और 145 रुपये डाक खर्च जमा कराना होगा। यानी कुल 1225 रुपये की मांग की गई।

इस मांग को छात्रा ने RTI अधिनियम के खिलाफ बताते हुए राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी।

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि RTI अधिनियम और उसके तहत बनाए गए नियमों में सूचना प्राप्त करने के लिए शुल्क तय है और कोई भी सार्वजनिक प्राधिकरण उससे अधिक राशि नहीं ले सकता।

हाईकोर्ट ने कहा कि RTI का उद्देश्य पारदर्शिता बढ़ाना है, न कि भारी शुल्क लगाकर नागरिकों को जानकारी मांगने से रोकना।

कोर्ट ने यह भी कहा कि जब कोई आवेदन RTI अधिनियम के तहत किया जाता है, तो उस पर केवल वही शुल्क लागू होगा जो RTI नियमों में निर्धारित है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी हवाला

हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के कई अहम फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि परीक्षार्थियों को अपनी उत्तर पुस्तिका देखने और उसकी कॉपी प्राप्त करने का अधिकार है।

सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि RTI अधिनियम को व्यापक रूप से लागू किया जाना चाहिए और कोई भी संस्थान अपने नियम बनाकर इस अधिकार को सीमित नहीं कर सकता।

याचिकाकर्ता का पक्ष

याचिकाकर्ता विपिका की ओर से अधिवक्ता रज्जाक खान और सरवर खान ने पैरवी करते हुए दलील दी कि RTI अधिनियम के तहत आवेदन शुल्क मात्र 10 रुपये निर्धारित है और सूचना की प्रति देने के लिए 2 रुपये प्रति पेज का शुल्क तय है।

अधिवक्ताओं ने कहा कि विश्वविद्यालय द्वारा 1000 रुपये प्रोसेसिंग फीस लेना RTI अधिनियम और उससे संबंधित नियमों का स्पष्ट उल्लंघन है।

याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि इतनी अधिक फीस तय करना RTI अधिनियम की भावना के विपरीत है, क्योंकि इससे छात्रों और नागरिकों को जानकारी मांगने से हतोत्साहित किया जाता है।

याचिकाकर्ता के वकीलों ने अदालत के समक्ष यह भी दलील दी कि राजस्थान हाईकोर्ट पहले भी एक मामले में यह स्पष्ट कर चुका है कि RTI के तहत उत्तर पुस्तिका देने के लिए अतिरिक्त प्रोसेसिंग फीस नहीं ली जा सकती।

विश्वविद्यालय का जवाब

प्रतिवादी विश्वविद्यालय की ओर से अदालत में कहा गया कि RTI अधिनियम की धारा 7 के तहत सूचना उपलब्ध कराने के लिए अतिरिक्त शुल्क लिया जा सकता है, जो सूचना उपलब्ध कराने की वास्तविक लागत को दर्शाता है।

विश्वविद्यालय ने यह भी बताया कि बड़ी संख्या में उत्तर पुस्तिकाओं को सुरक्षित रखने और उनकी प्रतियां उपलब्ध कराने के लिए अतिरिक्त व्यवस्था करनी पड़ती है।

विश्वविद्यालय के अनुसार उसके पास लगभग 6.5 लाख उत्तर पुस्तिकाएं संग्रहित हैं और हर वर्ष लगभग 350 आवेदन प्राप्त होते हैं, जिनमें उत्तर पुस्तिकाओं की प्रमाणित प्रतियां मांगी जाती हैं।

इन आवेदनों का निपटारा करने और रिकॉर्ड प्रबंधन के लिए विश्वविद्यालय ने तीन कर्मचारियों को अनुबंध के आधार पर नियुक्त किया है। इन कर्मचारियों के वेतन और प्रशासनिक खर्च को ध्यान में रखते हुए प्रोसेसिंग फीस तय की गई थी।

विश्वविद्यालय ने अदालत को बताया कि पहले यह फीस 2000 रुपये थी, जिसे बाद में बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट की बैठक में घटाकर 1000 रुपये कर दिया गया था।

विश्वविद्यालय ने यह भी कहा कि यह शुल्क सूचना उपलब्ध कराने में होने वाले खर्च को ध्यान में रखकर तय किया गया है और इसमें कोई अवैधता नहीं है।

हाईकोर्ट का फैसला

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि RTI अधिनियम का मुख्य उद्देश्य नागरिकों को सूचना तक आसान पहुंच प्रदान करना और सरकारी संस्थाओं में पारदर्शिता सुनिश्चित करना है।

हाईकोर्ट ने कहा कि RTI अधिनियम और उसके तहत बनाए गए नियमों में आवेदन शुल्क और सूचना उपलब्ध कराने के शुल्क को स्पष्ट रूप से निर्धारित किया गया है।

कोर्ट ने कहा कि जब RTI अधिनियम के तहत नियमों में आवेदन शुल्क 10 रुपये और सूचना की कॉपी के लिए 2 रुपये प्रति पेज निर्धारित है, तो कोई भी सार्वजनिक प्राधिकरण इससे अलग या अतिरिक्त प्रोसेसिंग फीस नहीं ले सकता।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि RTI अधिनियम की धारा 22 के अनुसार इस कानून का अन्य सभी कानूनों या नियमों पर प्रभावी अधिकार है। इसलिए विश्वविद्यालय के नियम RTI अधिनियम से ऊपर नहीं हो सकते।

हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि परीक्षा संस्थानों को भी RTI अधिनियम के प्रावधानों का पालन करना होगा और परीक्षार्थियों को उनकी उत्तर पुस्तिकाओं की प्रतियां प्राप्त करने का अधिकार है।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि प्रशासनिक खर्च या अतिरिक्त कार्यभार को आधार बनाकर सूचना के अधिकार को सीमित नहीं किया जा सकता।

अंतिम आदेश

राजस्थान हाईकोर्ट ने राजस्थान यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज (RUHS) द्वारा 6 सितंबर 2012 की गाइडलाइन और उसके बाद किए गए संशोधनों को उस सीमा तक निरस्त कर दिया, जहां RTI आवेदन पर 1000 रुपये प्रोसेसिंग फीस लेने का प्रावधान था।

हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि विश्वविद्यालय अब केवल वही शुल्क ले सकेगा जो RTI अधिनियम और उसके नियमों में निर्धारित है और उससे अधिक शुल्क नहीं लिया जा सकता।

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